TMC में ऐतिहासिक बगावत! 20 सांसदों ने छोड़ा ममता का साथ, छोटी क्षेत्रीय पार्टी NCPI बनी सियासत का नया केंद्र
बागी खेमे की प्रमुख नेता काकोली घोष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि उनका गुट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ सहयोगात्मक भूमिका निभाएगा। सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय और शताब्दी रॉय ने भी दावा किया कि उनका समूह औपचारिक रूप से NCPI में शामिल हो चुका है।
आखिर NCPI क्या है और क्यों बनी बागी सांसदों की पसंद?
राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बागी सांसदों ने एक अपेक्षाकृत छोटी और कम चर्चित पार्टी NCPI को ही क्यों चुना। जानकारी के अनुसार, नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का गठन जनवरी 2023 में हुआ था। यह चुनाव आयोग में पंजीकृत तो है, लेकिन अभी तक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल नहीं है।
पार्टी का मुख्य आधार त्रिपुरा और पूर्वोत्तर क्षेत्र को माना जाता है, जबकि इसका पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में स्थित है। पार्टी का चुनाव चिन्ह ‘पेन निब’ (कलम की नोक) है। शुरुआती दौर में यह संगठन सीमित संसाधनों और कम जनाधार के कारण राष्ट्रीय राजनीति में कोई विशेष पहचान नहीं बना पाया था।
त्रिपुरा से शुरुआत, अब राष्ट्रीय सुर्खियों में
NCPI ने अपना पहला चुनावी दांव 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में खेला था। हालांकि पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और उसके उम्मीदवारों को बेहद सीमित वोट हासिल हुए। चुनाव के बाद संगठनात्मक गतिविधियां भी लगभग ठप पड़ गई थीं।
लेकिन अब हालात पूरी तरह बदलते नजर आ रहे हैं। टीएमसी के बागी सांसदों के समर्थन और विलय के दावे के बाद NCPI अचानक राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गई है। यदि बागी सांसदों के दावे सही साबित होते हैं, तो सांसदों की संख्या के आधार पर यह पार्टी संसद में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा सकती है।
लोकसभा अध्यक्ष के पास पहुंचा मामला
बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर संसद में अलग बैठने की मांग की है। उनका तर्क है कि उनके साथ पर्याप्त संख्या में सांसद हैं और उन्हें अलग संसदीय पहचान दी जानी चाहिए। अब इस पूरे मामले पर अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष के स्तर पर होना है।
TMC के लिए बड़ी चुनौती
इस घटनाक्रम ने ममता बनर्जी की पार्टी के सामने गंभीर राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। यदि बागी गुट अपने दावों को साबित करने में सफल रहता है, तो यह टीएमसी के इतिहास की सबसे बड़ी संसदीय बगावत मानी जाएगी। वहीं दूसरी ओर, इस घटनाक्रम ने एक लगभग निष्क्रिय क्षेत्रीय दल NCPI को अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।
अब सबकी नजरें लोकसभा अध्यक्ष के फैसले और टीएमसी नेतृत्व की अगली रणनीति पर टिकी हैं, क्योंकि यह विवाद आने वाले दिनों में संसद और पश्चिम बंगाल दोनों की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।