56 साल का खगोलीय संयोग: अब 2080 तक 15 जनवरी को ही होगी मकर संक्रांति, जानिए शास्त्रीय वजह और परंपराएं

 

Bihar news: खगोलीय गणना के अनुसार मकर संक्रांति को लेकर एक बड़ा और दिलचस्प तथ्य सामने आया है। ग्रहों के राजा सूर्य 15 जनवरी को धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक अब लगातार 56 वर्षों तक, यानी वर्ष 2080 तक मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी। इसके बाद सूर्य के राशि परिवर्तन में और विलंब होने के कारण संक्रांति की तिथि एक दिन आगे बढ़कर 16 जनवरी हो जाएगी।

इस वर्ष सूर्य का राशि परिवर्तन सुबह 9 बजकर 13 मिनट पर हो रहा है। इसी के साथ खरमास की अवधि समाप्त हो जाएगी और विवाह, गृह प्रवेश सहित अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो सकेगी। इस बार मकर संक्रांति व्यतिपात योग, शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि और शतभिषा नक्षत्र में पड़ रही है, जिसे ज्योतिष की दृष्टि से विशेष फलदायी माना गया है।

72 साल में बदलती है तिथि, यही है खगोलीय कारण

ज्योतिषविदों के अनुसार सूर्य के राशि परिवर्तन में हर वर्ष लगभग 20 मिनट का विलंब होता है। तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का और करीब 72 वर्षों में पूरा एक दिन हो जाता है। सूर्य और चंद्रमा ग्रह मार्गीय होते हैं, यानी वे पीछे नहीं चलते, इसी कारण संक्रांति की तिथि धीरे-धीरे आगे खिसकती जाती है।
इतिहास पर नजर डालें तो 1936 से मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती रही, जबकि उससे पहले 1864 से 1936 तक 13 जनवरी और 1792 से 1864 तक 12 जनवरी को यह पर्व मनाया जाता था।

फिर 14 जनवरी को क्यों मनाई जा रही है संक्रांति?

हालांकि खगोलीय रूप से सूर्य का प्रवेश 15 जनवरी को हो रहा है, लेकिन वर्ष 2026 में मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को ही मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्य राजनाथ झा के अनुसार, शास्त्रों में यह स्पष्ट है कि यदि संक्रांति अर्धरात्रि से पहले हो, तो पूर्वदिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल माना जाता है। चूंकि इस वर्ष सूर्य का राशि परिवर्तन अर्धरात्रि से पूर्व हो रहा है, इसलिए 14 जनवरी का दिन धर्मसम्मत है। इसी आधार पर बिहार समेत देश के अधिकांश प्रामाणिक पंचांगों में संक्रांति की तिथि 14 जनवरी ही दर्ज है।

दान-पर्व के रूप में विशेष महत्व

धर्मशास्त्रों में मकर संक्रांति को महादान पर्व कहा गया है। इस दिन प्रातः स्नान, सूर्य को अर्घ्य, तिल-गुड़, अन्न और वस्त्र दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन साधारण नदी में किया गया स्नान भी गंगा स्नान के समान पुण्य प्रदान करता है।

मिथिला-बिहार की जीवंत परंपरा

बिहार और विशेषकर मिथिला क्षेत्र में मकर संक्रांति केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का उत्सव है। दही-चूड़ा, तिलकुट, बुजुर्गों से आशीर्वाद और पारिवारिक मेल-मिलाप इस पर्व की पहचान है, जिसे आज भी पूरे उल्लास के साथ निभाया जाता है।

इस दिन इन बातों से रखें परहेज

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन नशा, तामसिक भोजन, अपमानजनक व्यवहार और वृक्षों की कटाई से बचना चाहिए। तुलसी की पत्तियां भी इस दिन नहीं तोड़नी चाहिए।

राशि अनुसार दान से बढ़ता है पुण्य

धर्मशास्त्रों में अलग-अलग राशियों के अनुसार दान का भी उल्लेख है- मेष को लाल वस्त्र व मसूर, वृषभ को चावल व चीनी, मिथुन को हरी सब्जियां, कर्क को सफेद वस्त्र, सिंह को गुड़-शहद, कन्या को मूंग दाल की खिचड़ी, तुला को मखाना, वृश्चिक को मूंगफली, धनु को पीले वस्त्र, मकर को काले तिल व कंबल, कुंभ को ऊनी कपड़े और मीन राशि वालों को चने की दाल व मौसमी फल दान करने की सलाह दी जाती है।

खगोलीय गणना, शास्त्रीय परंपरा और सामाजिक आस्था-तीनों के संगम से मकर संक्रांति न केवल एक तिथि, बल्कि भारतीय संस्कृति की निरंतर बहती धारा बनकर सामने आती है।