भिखारी ठाकुर की विरासत पर बड़ा सवाल: ‘भोजपुरी के शेक्सपियर’ के प्रपौत्र की बदहाली पर कौन देगा जवाब?

 

Bihar news: बिहार की पहचान सिर्फ उसकी ऐतिहासिक विरासत से नहीं, बल्कि उन कलाकारों और साहित्यकारों से भी बनी है, जिन्होंने समाज की सच्चाई को अपनी रचनाओं में जगह दी। ऐसे ही महान लोक कलाकार थे भिखारी ठाकुर, जिन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा जाता है। उन्होंने लोकनाट्य और गीतों के जरिए गरीबी, पलायन, सामाजिक भेदभाव, शोषण और आम लोगों की परेशानियों को आवाज दी।

आज उनकी विरासत को याद करने के लिए जयंती समारोह होते हैं, मंच सजते हैं और उनके योगदान को बिहार की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा जाता है। लेकिन इसी बीच उनके परिवार से जुड़ी एक तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

आर्थिक संकट से गुजर रहा परिवार

दावा है कि भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील कुमार फिलहाल बेहद कठिन आर्थिक परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। बताया जाता है कि उन्हें पटना राजभवन में नौकरी मिली थी, लेकिन बाद में उनकी सेवा समाप्त हो गई। नौकरी जाने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई।

हालात इतने मुश्किल बताए जा रहे हैं कि परिवार के सामने रहने और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने तक का संकट खड़ा हो गया है। हालांकि, नौकरी से संबंधित पूरे मामले और वर्तमान आर्थिक स्थिति की आधिकारिक तस्वीर सामने आना अभी बाकी है।

जयंती और समारोह से आगे कब होगी बात?

भिखारी ठाकुर का नाम बिहार में सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी जयंती पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं, उनकी तस्वीरों पर माल्यार्पण किया जाता है और उनकी कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की बातें कही जाती हैं।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या किसी महान कलाकार की विरासत को सम्मान देने की जिम्मेदारी केवल समारोहों और स्मारकों तक सीमित होनी चाहिए?

अगर उनके परिवार की कोई वास्तविक परेशानी है, तो क्या उसकी जानकारी लेना और जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध कराना भी समाज और सरकार की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए?

विरासत सिर्फ नाम नहीं, जिम्मेदारी भी है

भिखारी ठाकुर ने अपने जीवन और कला के जरिए उन लोगों की आवाज बनने की कोशिश की, जिनकी समस्याएं अक्सर मुख्यधारा से दूर रह जाती थीं। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों और आम आदमी की पीड़ा को मंच पर उतारा।

आज उनके ही परिवार का कोई सदस्य आर्थिक संकट से जूझ रहा हो, तो यह स्थिति निश्चित रूप से संवेदनशीलता के साथ जांच का विषय बनती है।

मामला किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नहीं है। सवाल यह है कि जिस कलाकार की विरासत पर पूरा बिहार गर्व करता है, उसके परिवार की वास्तविक स्थिति क्या है और क्या उसे किसी मदद की जरूरत है?

सरकार से जांच की उम्मीद

जरूरत है कि बिहार सरकार और संबंधित विभाग इस पूरे मामले की तथ्यात्मक जांच करें। सुशील कुमार की राजभवन में हुई नियुक्ति, सेवा समाप्त होने की वजह और वर्तमान परिस्थितियों की जानकारी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए।

यदि जांच में यह सामने आता है कि परिवार वास्तव में गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, तो नियमानुसार सहायता और पुनर्वास के विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

क्योंकि किसी महान कलाकार को याद करना सिर्फ उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी कला, विचार और विरासत को आगे बढ़ाने के साथ-साथ उनके परिवार की गरिमा और सम्मान की चिंता करना भी उसी विरासत का हिस्सा हो सकता है।

भिखारी ठाकुर की जयंती पर मंचों से उनकी विरासत की बातें होंगी, लेकिन असली सवाल यही रहेगा- क्या उनकी विरासत को केवल याद किया जाएगा या उससे जुड़े लोगों की सुध भी ली जाएगी?