बांकीपुर का सियासी रण: जहां से निकले कई मुख्यमंत्री, अब किसके सिर सजेगा जीत का ताज?
Bihar News: बिहार की सबसे चर्चित विधानसभा सीटों में शुमार बांकीपुर एक बार फिर राजनीतिक हलचल के केंद्र में है। भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर हुए उपचुनाव का मतदान 30 जुलाई को संपन्न हो चुका है। अब सभी की निगाहें 3 अगस्त को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं, जब यह तय होगा कि बांकीपुर की जनता इस बार किस उम्मीदवार पर भरोसा जताती है।
इस उपचुनाव में मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। भारतीय जनता पार्टी ने नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा है, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की ओर से रेखा गुप्ता चुनाव लड़ रही हैं। वहीं, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर भी पहली बार इस सीट से अपनी राजनीतिक परीक्षा दे रहे हैं। ऐसे में यह चुनाव केवल एक विधानसभा सीट का नहीं, बल्कि तीनों प्रमुख दलों की सियासी प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है।
मुख्यमंत्रियों को जन्म देने वाली रही है बांकीपुर सीट
बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। इस सीट ने बिहार को कई बड़े नेता और मुख्यमंत्री दिए हैं। वर्ष 1962 में के.बी. सहाय यहीं से जीतकर मुख्यमंत्री बने थे। इसके बाद 1967 में बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद ने भी इसी सीट से जीत दर्ज कर इतिहास रचा।
1977 में भाजपा के संस्थापक नेताओं में शामिल ठाकुर प्रसाद ने जनता पार्टी के टिकट पर इस सीट से जीत हासिल की थी। उनके पुत्र रविशंकर प्रसाद बाद में राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए और केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे।
तीन दशक से भाजपा का मजबूत गढ़
वर्ष 1995 में भाजपा के नवीन सिन्हा ने बांकीपुर से जीत दर्ज की थी। इसके बाद यह सीट लगातार भाजपा का मजबूत गढ़ बनी रही। वर्ष 2006 से नितिन नवीन लगातार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे और राज्य सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी संभाली।
हाल ही में नितिन नवीन के भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद इस सीट पर उपचुनाव की नौबत आई। उनकी नई जिम्मेदारी के बाद बांकीपुर की राजनीतिक अहमियत राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गई है।
3 अगस्त को आएगा जनता का फैसला
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बांकीपुर का जनादेश अक्सर बिहार की राजनीति को नई दिशा देता रहा है। यही वजह है कि इस बार भी इस सीट पर सबकी नजरें टिकी हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 3 अगस्त को मतगणना के बाद भाजपा अपना गढ़ बचाने में सफल होती है या फिर राजद अथवा जन सुराज कोई नया राजनीतिक इतिहास रचते हैं। बांकीपुर का फैसला केवल एक विधायक नहीं चुनेगा, बल्कि बिहार की बदलती सियासत का भी महत्वपूर्ण संकेत देगा।