'भोजपुरी के शेक्सपियर' भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील ठाकुर राजभवन से बर्खास्त
Newshaat Desk: लोकप्रिय भोजपुरी नाटककार और लोक-कलाकार भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र (परपोते) सुशील ठाकुर को राजभवन में आशुलिपिक के पद से सेवा समाप्त कर बर्खास्त कर दिया गया है. सुशील ठाकुर की शैक्षणिक योग्यता (हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर) और पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए उन्हें राजभवन में आशुलिपिक के पद पर नियुक्त किया गया था. हाल ही में राजभवन के आदेश पर उनकी सेवाएं रद्द कर दी गई. पूर्व राज्यपाल द्वारा सम्मान स्वरूप दी गई इस नौकरी पर कार्यकुशलता और दक्षता परीक्षा में शामिल न होने के कारण गाज गिरी है.
राजभवन प्रशासन ने सेवा समाप्ति का आधार एक दक्षता परीक्षा को बनाया है, जिसे लेकर सुशील कुमार ठाकुर ने सवाल उठाया है कि नियुक्ति के समय ऐसी कोई परीक्षा लागू नहीं थी और बाद में उन पर नई शर्तें थोपी गई. इस कार्रवाई को लेकर उन्होंने नाराजगी जताई है और कहा है कि एक तरफ महान विभूति भिखारी ठाकुर की सांस्कृतिक विरासत का गौरवगान किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ उनके ही परिवार को आर्थिक संकट में डाला जा रहा है.
सनद रहे कि कर्मचारियों के कौशल मूल्यांकन हेतु गठित तीन सदस्यीय समिति के निर्देश पर 22 जुलाई 2026 को दक्षता परीक्षा आयोजित की गई थी, लेकिन सुशील इसमें शामिल नहीं हुए. उनका तर्क था कि ऐसी परीक्षा नियुक्ति से पहले होनी चाहिए थी. इसके बाद राजभवन ने संवेदनशीलता दिखाते हुए 6 अगस्त 2026 को परीक्षा में शामिल होने का एक अंतिम मौका और दिया. इसके बावजूद वह पुनः अनुपस्थित रहे और परीक्षा से छूट की मांग पर अड़े रहे. राजभवन प्रशासन ने इसे स्पष्ट रूप से आदेश की अवहेलना और अनुशासनहीनता माना. हालांकि, प्रशासनिक नियमों, दक्षता की अनिवार्यता और कानूनी मर्यादा के कारण इस संवेदनशील पहल का अंत बर्खास्तगी के साथ हुआ.
राजभवन द्वारा जारी निष्कासन पत्र में 'बिहार सरकारी सेवक परिवीक्षा अवधि नियम- 2024' और सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध फैसले 'पुरुषोत्तम लाल ढींगरा बनाम भारत संघ' का हवाला दिया गया. इसके तहत यह स्पष्ट किया गया है कि एक वर्ष से कम की प्रोबेशन अवधि के दौरान यदि किसी कर्मचारी का कार्य संतोषजनक नहीं पाया जाता है या वह विभागीय निर्देशों का उल्लंघन करता है, तो बिना किसी लंबी जांच के उसकी सेवा समाप्त की जा सकती है. इसी आधार पर सक्षम प्राधिकार ने उनकी बर्खास्तगी का निर्णय लिया.
भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के परिवार को सम्मान देते हुए बिहार के राज्यपाल रहते डॉ आरिफ मोहम्मद खान ने उक्त सराहनीय पहल की थी. राज्यपाल ने छपरा जिले के कुतुबपुर दियारा निवासी भिखारी ठाकुर के परपोते सुशील ठाकुर को राजभवन में स्टेनोग्राफर के पद पर नियुक्ति प्रदान की थी. इस संबंध में खुद सुशील ठाकुर ने बताया कि राज्यपाल की कृपा से उन्हें राजभवन में नौकरी मिली है. उन्होंने कहा था कि यह उनके लिए गर्व और खुशी का क्षण है. वे राज्यपाल के प्रति आभार व्यक्त करते हैं.
भिखारी ठाकुर (1887–1971) भोजपुरी भाषा और लोक संस्कृति के निर्विवाद सिरमौर रहे हैं. अपनी नाटकों और रचनाओं जैसे 'बिदेसिया', 'गबरघिचोर', 'बेटी बेचवा' और 'विधवा विलाप' के माध्यम से उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया. उनके प्रपौत्र की यह नियुक्ति लोक कला और विरासत के प्रति आदर भाव का परिणाम थी. सुशील कुमार ठाकुर ने जेपी विश्वविद्यालय, छपरा से एमए तक की पढ़ाई पूरी की है और वे कंप्यूटर टाइपिंग में दक्ष हैं. वे भिखारी ठाकुर परिवार की चौथी पीढ़ी से संबंध रखते हैं और लंबे समय से भिखारी ठाकुर को भारत रत्न दिलाने के प्रयासों से भी जुड़े रहे हैं. भिखारी ठाकुर के पुत्र शीलानाथ ठाकुर थे, जिनके तीन पुत्र-राजेंद्र ठाकुर, हीरालाल ठाकुर और दिनकर ठाकुर हुए. राजेंद्र ठाकुर की दो पुत्रियां हैं, जबकि हीरालाल ठाकुर के दो पुत्र वर्तमान में नौकरी में हैं. दिनकर ठाकुर के इकलौते पुत्र सुशील ठाकुर अब तक बेरोजगार थे, जिन्हें राज्यपाल द्वारा नौकरी देकर आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्रदान किया गया था. उन्हें अब राज्यपाल के आदेश से सेवामुक्त कर दिया गया है.
बहरहाल, इस पूरे मामले की पटकथा पिछले वर्ष सारण जिले के डोरीगंज स्थित कुतुबपुर दियारा से लिखी गई थी, जो भिखारी ठाकुर की जन्मस्थली है. बिहार के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्मद खान ने 18 दिसंबर 2025 को उनके गांव का दौरा कर परिजनों का हाल-चाल जाना था. महान कलाकार के अतुलनीय योगदान को सम्मान देने और परिवार को आर्थिक सहारा देने के उद्देश्य से उन्होंने प्रपौत्र सुशील कुमार ठाकुर को नौकरी देने का ऐलान किया था. इसके बाद 23 जनवरी 2026 को आदेश जारी कर सुशील को राजभवन में आशुलिपिक (स्टेनोग्राफर) के पद पर परिवीक्षा (प्रोबेशन) पर नियुक्त किया गया था. तब राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्मद खान की इस पहल से भिखारी ठाकुर से जुड़ी संस्थाओं, कलाकारों और साहित्य प्रेमियों में खुशी की लहर थी. वहीं, कुतुबपुर दियारा गांव सहित पूरे सारण जिले में इस निर्णय की जमकर सराहना की गई थी.