Bihar news: बिहार हाऊसिंग बोर्ड के स्वार्थी सिस्टम के शिकार वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर अपनी व्यथा को रोक नहीं पाये, कहा आवास के लिए भूखंड दें गृह मंत्री
Bihar news: पद्म श्री सम्मान से सम्मानित बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने 46 सालों के बाद व्यथित होकर अपनी पीड़ा को फेसबुक के माध्यम से उजागर करते हुए बिहार राज्य हाऊसिंग बोर्ड की कार्यशील पर प्रश्चचिह्न खड़ा कर दिया है। वह कहते हैं कि ‘‘मैं जानता हूं कि यह पोस्ट लिखने के बाद भी मुझे बिहार सरकार, आवास बोर्ड या कहीं से भी न्याय नहीं मिलेगा। किंतु लोग और मेरे वंशज जानेंगे कि मुझे पटना से दूर एक गांव में जाकर क्यों बसना पड़ा।’’ बिहार राज्य आवास बोर्ड ने 4 दशक पहले लोगों से वादा किया कि हम पटना के दीघा में भूखंड देंगे। अग्र धन बोर्ड के नाम हमारे बैंक खाते में जमा कीजिए।
सनद रहे कि उक्त भूखंड के लिए सुरेन्द्र किशोर ने 15 अप्रैल, 1981 को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया स्थित आवास बोर्ड के खाते में 2000 रुपए जमा किये। पैसे नहीं थे तो कर्ज लिया था। उसकी रसीद लेेकर आज भी वह ‘टहल’ रहे हैं। क्योंकि बिहार सरकार, भूमि माफिया और अन्य संबंधित तत्वों ने मिलकर स्वार्थवश इस आवास योजना को फेल करवा दिया। उसके बाद आवास बोर्ड ने अग्रधन व अग्रिम जमा करने वालों से कहा कि आप अपने पैसे वापस ले लीजिए।
9 फरवारी 2011 को दैनिक राष्ट्रीय सहारा ने यह खबर दी कि दो हजार रुपए के एवज में एक लाख रुपए मिले हैं।फिर भी मैंने उसके लिए कोशिश नहीं की। क्योंकि मैं जानता हूं कि अपना ही पैसा प्राप्त करने के लिए किसी सरकारी ऑफिस में किसी नागरिक को कितना जलील होना पड़ता है। मेरा सम्मान एक लाख रुपए से अधिक है।कुछ ही साल पहले मुम्बई के 672 बेघरों के पुनर्वास में बाधा बनने के आरोप में राज्य सभा सदस्य संजय राउत जेल भेज दिए गये थे। पर, पटना के मेरे जैसे 11 हजार 260 बेघरों (जिन्होंने आवास बोर्ड में अग्रधन और अग्रिम जमा किए) के साथ धोखाधड़ी करने वालों को अब तक कोई सजा नहीं हुई।
जानकार लोग बताते हैं कि धोखाधड़ी करने वालों में बिहार राज्य आवास बोर्ड, बिहार पुलिस, राज्य के अनेक सत्ताधारी और प्रतिपक्षी नेतागण और भू माफिया शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि दीघा (पटना) की 1024 एकड़ भूमि आवास बोर्ड की है। सन 2002 में पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के उच्च अधिकारियों को कोर्ट में बुलाकर सख्त निदेश दिया था कि वे आवास बोर्ड की दीघा भूमि से अतिक्रमण हटाएं अन्यथा आप पर हम कार्रवाई करेंगे।(उस समय तो बिहार में जंगल राज चल रहा था। कोर्ट की भी कोई सुनवाई सरकार के यहां नहीं थी।)
उसके बाद अतिक्रमण हटाने के सवाल पर मुख्य सचिव और डीजीपी में मतभेद हो गया। डीजीपी अतिक्रमण हटाने के पक्ष में नहीं थे। जंगल राज का यही तो प्रमाण था। यहां तक कि तब उस पर मुख्य सचिव ने नौकरी से इस्तीफे की धमकी दे दी। फिर भी कुछ नहीं हुआ। बात आई-गई हो गई।
दीघा में भूखंड देने के लिए आवास बोर्ड ने सन 1981 में 11 हजार 260 लोगों से अग्रधन लिए थे। कुछ से अग्रिम भी लिये। पर, निहित स्वार्थी तत्वों ने किसी को भूखंड नहीं लेने दिया। उधर भू माफियाओं ने पुलिस, प्रशासन, आवास बोर्ड और पक्ष-विपक्ष के अनेक नेताओं की मदद से 1024 एकड़ में से अधिकांश जमीन नाजायज तरीके से बेच दी। उन 11260 आवेदकों से आवास बोर्ड ने कहा कि अब आप पैसे वापस ले लें। हम आपको जमीन नहीं दे सकते हैं।अधिकतर लोगों ने वापस ले लिये। कुछ लोगों ने पैसे वापस नहीं लिए जिनमें मैं (सुरेन्द्र किशोर) भी हूं।
लगता है कि आज की राज्य सरकार पटना हाईकोर्ट के निदेश का पालन करना चाहती है। पटना हाईकोर्ट भी अब काफी सख्त है। हाईकोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा है कि ‘‘आवास बोर्ड के अफसरों और स्थानीय थानेदारों ने रिश्वत लेकर अतिक्रमण करवाया है।’’ हाईकोर्ट के न्यायाधीश संदीप कुमार ने कह दिया था कि थानेदारों और आवास बोर्ड पर कार्रवाई नहीं हुई तो हाईकोर्ट उन्हें नहीं छोड़ेगा। अदालत को यह भी निर्देश देना चाहिए कि जिन लोगों ने 1981 में आवास बोर्ड में दीघा में जमीन के लिए जमा अपना अग्रधन वापस नहीं लिया है, उन्हें भूखंड देेने पर आवास बोर्ड विचार करे।
इधर, 19 फरवरी, 2026 को बिहार के उप मुख्यमंत्री सह गृह मंत्री सम्राट चैधरी ने बिहार विधान परिषद में कहा है कि डेढ़ माह में राजीव नगर और दीघा की 25 एकड़ जमीन डेढ़ माह में कब्जे से मुक्त होगी। सुरेन्द्र किशोर ने सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या गृह मंत्री सम्राट चौधरी आवास बोर्ड को यह आदेश देंगे कि जिन लोगों ने अपने अग्रधन वापस नहीं लिये हैं, उन्हें बोर्ड उस 25 एकड़ जमीन में से आवास के लिए भूखंड दे? उन्हें ‘‘अफसरशाही में परेशान’’ नहीं किया जाए?पता नहीं, ऐसी उम्मीद करना तो आज आकाश से तारे तोड़ कर लाने जैसा ही हो गया है।
दरअसल, दीघा भूमि अधिग्रहण में आई समस्या की जड़ में मुख्यतः बिहार सरकार के एक पूर्व मुख्य सचिव का निजी स्वार्थ रहा था। 1024 एकड़ अधिग्रहीत जमीन में उस मुख्य सचिव की निजी जमीन 4 एकड़ भी शामिल थी। उन्होंने अपने प्रभाव का प्रयोग करके अपनी जमीन को अधिग्रहण से मुक्त करा लिया। उसके बाद सामान्य किसान भड़क गये। तब किसानों ने कहा था कि बड़े लोगों की जमीन मुक्त हो जाएगी और हमारी जमीन अत्यंत सस्ती दर पर ले ली जाएगी? हम ऐसा नहीं होने देंगे। उसके बाद भू माफिया भी उन किसानों के साथ खेड़े होकर उनसे जमीन बिकवाने लगे।
भ्रष्ट तंत्र ने उन्हें पैसे लेकर मदद की। ऐसे में सुरेन्द्र किशोर जैसे हजारों लोग पिस गये। शहर छोड़ गांव में जाकर उन्हें बसना पड़ा। मुख्य शहर से कट जाने की पीड़ा उनका परिवार झेल रहा है। याद रहे कि तब अत्यंत सस्ती जमीन पटना के पास के गांवों में ही उपलब्ध थी जिसे मैं खरीदने की क्षमता रखता था।