दही-चूड़ा भोज में कांग्रेस विधायक गायब, बिहार की सियासत में टूट की बड़ी आहट

 

Bihar news: बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति का पर्व इस बार कांग्रेस के लिए सवालों की सौगात लेकर आया। सदाकत आश्रम में आयोजित परंपरागत दही-चूड़ा भोज में जहां कार्यकर्ताओं और कुछ वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी दिखी, वहीं पार्टी के सभी छह विधायक पूरी तरह गायब रहे। इसी गैरहाजिरी ने कांग्रेस के भीतर गहराते असंतोष और संभावित सियासी टूट की चर्चाओं को तेज कर दिया है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार के नेतृत्व में आयोजित इस भोज को संगठनात्मक एकजुटता का प्रतीक माना जा रहा था। अध्यक्ष ने खुद दही-चूड़ा परोसा और कार्यकर्ताओं के साथ बैठकर भोज में शामिल भी हुए, लेकिन जिन चेहरों पर सबकी नजरें टिकी थीं, वे दिखाई नहीं दिए। न महागठबंधन के किसी घटक दल को आमंत्रण दिया गया और न ही कांग्रेस के मौजूदा विधायक पहुंचे।

छह विधायकों की दूरी ने बढ़ाई बेचैनी

कार्यक्रम से जिन विधायकों की अनुपस्थिति सबसे ज्यादा चर्चा में रही, उनमें
मनोहर प्रसाद सिंह (मनिहारी), सुरेंद्र प्रसाद (वाल्मीकिनगर), आबिदुर रहमान (अररिया), अभिषेक रंजन (चनपटिया), मो. कमरूल होदा (किशनगंज) और मनोज विश्वास (फारबिसगंज) शामिल हैं। एक साथ सभी विधायकों का न आना पार्टी के लिए साधारण घटना नहीं मानी जा रही।

नेतृत्व चुप, कयास तेज

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व विधान परिषद सदस्य प्रेमचंद्र मिश्रा ने मंच से भाईचारे और सौहार्द का संदेश जरूर दिया, लेकिन विधायकों की गैरहाजिरी पर वे भी कोई स्पष्ट जवाब देने से बचते नजर आए। यही चुप्पी सियासी गलियारों में कई सवाल खड़े कर रही है।

क्या पाला बदलने की तैयारी?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधायकों की यह दूरी या तो संगठन से नाराजगी का संकेत है, या फिर किसी बड़े राजनीतिक फैसले की भूमिका। हाल के दिनों में एनडीए में शामिल होने की चर्चाएं और मंत्री संजय सिंह के दावे ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। अगर कांग्रेस के विधायक अलग राह चुनते हैं, तो यह बिहार में पार्टी के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है।

दही-चूड़ा और सियासत का गहरा रिश्ता

बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा भोज सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि सियासी संदेशों का मंच भी माना जाता है। इन्हीं आयोजनों में नए रिश्ते बनते और पुराने टूटते रहे हैं। ऐसे में मकर संक्रांति जैसे मौके पर कांग्रेस विधायकों का पूरी तरह गायब रहना शुभ संकेत नहीं माना जा रहा।

खरमास के बाद बदलेगी तस्वीर?

तेज प्रताप यादव, चिराग पासवान और अन्य नेताओं के दही-चूड़ा आयोजनों के बीच कांग्रेस का यह खालीपन साफ दिखा। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि खरमास के बाद बिहार की राजनीति में कौन सा नया मोड़ आता है।

फिलहाल इतना तय है कि सदाकत आश्रम में सजा दही-चूड़ा भोज कांग्रेस की एकजुटता से ज्यादा उसकी अंदरूनी दरारों की चर्चा का कारण बन गया है।