सीट बंटवारे से पहले ही महागठबंधन में सियासी उबाल- पारस ने चिराग की तारीफ़ कर बढ़ाई गठबंधन की बेचैनी
Bihar politics: बिहार में महागठबंधन के भीतर सीटों की खींचतान ने सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है। चुनावी बिगुल बजने से पहले ही गठबंधन के अंदर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। सूत्रों के अनुसार, अगले सप्ताह- संभवतः मंगलवार तक- सीटों की औपचारिक घोषणा हो सकती है, लेकिन उससे पहले ही बयानबाज़ी और असहमति के सुर गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक महागठबंधन में सीटों का बंटवारा इस प्रारूप में तय हुआ है-
• राजद (RJD): 140 सीटें
• कांग्रेस: 52 से 56 सीटें
• लेफ्ट पार्टियां: 35 सीटें
• वीआईपी (मुकेश सहनी): 8 सीटें
• रालोजपा (पशुपति पारस गुट): 4 सीटें
• झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM): 4 सीटें
हालांकि यह तालमेल जितना सरल दिख रहा है, उतना है नहीं। अंदरखाने की राजनीति में असंतोष गहराने लगा है।
पारस का बयान बना सिरदर्द
राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) के प्रमुख पशुपति कुमार पारस ने अपने भतीजे चिराग पासवान को लेकर ऐसा बयान दे दिया है जिसने गठबंधन की रणनीति को झटका दे दिया। पारस ने कहा- “अगर चिराग बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे तो सबसे ज़्यादा खुशी मुझे होगी, वो हमारे परिवार के सदस्य हैं।”
गठबंधन के नेताओं का मानना है कि पारस का यह बयान स्पष्ट संकेत है कि वे एनडीए से दूरी बनाकर पूरी तरह सहज नहीं हैं और सीट बंटवारे को लेकर असंतोष में हैं।
मुकेश सहनी की चुप्पी बढ़ा रही बेचैनी
वीआईपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुकेश सहनी ने पहले मीडिया में 40 सीटों की मांग की थी, लेकिन सूत्रों के मुताबिक उन्हें सिर्फ 8 सीटें दी गई हैं। यही कारण है कि वे अब चुप्पी साधे हुए हैं। महागठबंधन के रणनीतिकार उनकी इस चुप्पी को “संभावित असंतोष” के संकेत के रूप में देख रहे हैं।
लेफ्ट और JMM में सहमति
वहीं JMM को 4 में से 3 सीटों पर सहमति मिल चुकी है। लेफ्ट पार्टियां भी 35 सीटों के फॉर्मूले पर तैयार हैं। कहा जा रहा है कि इन दोनों सहयोगियों के साथ बातचीत लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।
आंतरिक तनाव से बढ़ी मुश्किल
राजद और कांग्रेस के बीच कुछ सीटों पर भी मतभेद की खबरें हैं। सूत्रों का कहना है कि कुछ प्रमुख सीटों पर उम्मीदवारों के नाम को लेकर भी अंदरूनी खींचतान चल रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि गठबंधन सीट शेयरिंग पर समय से सहमति नहीं बना सका, तो इसका सीधा असर चुनावी मैदान में तालमेल और जनविश्वास पर पड़ सकता है।