‘मुरेठा संकल्प’ से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक: सम्राट चौधरी की सियासी यात्रा ने रचा इतिहास
यह सफर सिर्फ एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि संघर्ष, रणनीति और आक्रामक सियासत का जीवंत उदाहरण भी है। महज 8 साल के भीतर भाजपा में उन्होंने ऐसा कद हासिल किया, जो उन्हें बिहार की सत्ता के शीर्ष तक ले आया।
16 नवंबर 1968 को खगड़िया में जन्मे सम्राट चौधरी एक मजबूत राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार के दिग्गज समाजवादी नेता रहे हैं, जबकि उनकी मां पार्वती देवी भी दो बार विधायक रह चुकी हैं। सम्राट चौधरी की निजी जिंदगी भी सादगी भरी है उनकी पत्नी ममता कुमारी हैं और उनके एक बेटा व एक बेटी हैं।
लालू से शुरू हुआ सियासी सफर
सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत लालू प्रसाद यादव की पार्टी RJD से की। साल 1999 में उन्हें राबड़ी देवी सरकार में कृषि राज्य मंत्री बनाया गया, हालांकि कम उम्र को लेकर विवाद के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
जदयू से भाजपा तक का सफर
सम्राट चौधरी 2000 और 2010 में विधायक बने और बाद में नीतीश कुमार सरकार में मंत्री भी रहे। जब जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने, तब भी उन्होंने सरकार में भूमिका निभाई।
साल 2018 में उन्होंने भाजपा का दामन थामा और यहीं से उनकी सियासी रफ्तार तेज हो गई। जल्द ही वे प्रदेश उपाध्यक्ष, फिर विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष और 2023 में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बने। इसके बाद उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली।
‘मुरेठा संकल्प’ से सत्ता तक
सम्राट चौधरी तब सुर्खियों में आए जब उन्होंने सार्वजनिक तौर पर मुरेठा बांधकर यह ऐलान किया कि जब तक नीतीश कुमार को सत्ता से नहीं हटाएंगे, तब तक इसे नहीं खोलेंगे। बाद में एनडीए में राजनीतिक बदलाव के बाद उन्होंने अयोध्या में सरयू नदी में मुरेठा विसर्जित कर अपने संकल्प के पूरा होने की घोषणा की।
नया अध्याय, नई सियासत
कोइरी (कुशवाहा) समाज से आने वाले सम्राट चौधरी को भाजपा का मजबूत ओबीसी चेहरा माना जाता है। उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही बिहार की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत मानी जा रही है।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सम्राट चौधरी अपनी आक्रामक शैली और राजनीतिक अनुभव के साथ बिहार को किस दिशा में लेकर जाते हैं।