परंपरा से प्रोफिट तक: बिहार में बांस बनेगा ‘ग्रीन गोल्ड’, किसानों की आय बढ़ाने की बड़ी तैयारी
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने कहा कि बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण और बाजार से जोड़ने की समुचित व्यवस्था की जाएगी। उनका कहना था कि बांस से तैयार उत्पाद किसानों और कारीगरों को बेहतर मूल्य दिलाने में सक्षम हैं, इसलिए सरकार इस क्षेत्र को विशेष प्रोत्साहन देगी।
प्राथमिक जिलों का होगा चयन
सम्मेलन में यह घोषणा की गई कि बांस उत्पादन के लिए राज्य के कुछ जिलों को प्राथमिकता के आधार पर चुना जाएगा। वहां नर्सरी, प्रसंस्करण इकाइयों और मार्केटिंग नेटवर्क की स्थापना की जाएगी।
सरकार की योजना है कि बिहार अब केवल कच्चा बांस बेचने वाला राज्य न रहे, बल्कि यहां से फर्नीचर, खिलौने, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और सजावटी उत्पाद तैयार होकर देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचें।
खेत की मेढ़ पर ‘अतिरिक्त कमाई’
कृषि विभाग के प्रधान सचिव नर्मदेश्वर लाल ने कहा कि बांस हमारी जीवनशैली का हिस्सा रहा है, लेकिन समय के साथ इसका उपयोग घटा है। अब जरूरत है इसे आधुनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित करने की।
नई दिल्ली से आए इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर रीसर्च (आईसीएआर) के उपनिदेशक डॉ. संजय कुमार सिंह ने बांस को किसानों के लिए “एटीएम” की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि खेत की मेढ़ पर बांस लगाकर किसान अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
प्रदर्शनी में दिखी संभावनाओं की झलक
सम्मेलन में बांस से बने फर्नीचर, सोफा, फूलदान, कलम स्टैंड, घरेलू डिब्बे और सजावटी वस्तुओं की प्रदर्शनी भी लगाई गई। इन उत्पादों ने यह संकेत दिया कि यदि सही प्रशिक्षण और बाजार मिले, तो बांस उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकता है।
रोजगार और हरित अर्थव्यवस्था की ओर कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि बांस की खेती पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ तेजी से बढ़ने वाली फसल है। ऐसे में यह किसानों के लिए कम लागत और अधिक लाभ का विकल्प बन सकती है।
बिहार में आयोजित इस शिखर सम्मेलन ने साफ संकेत दिया है कि आने वाले समय में बांस ‘ग्रीन गोल्ड’ के रूप में राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।