बिहार में बेटियों की उड़ान: पॉलिटेक्निक में नामांकन 15% बढ़ा, सिविल ट्रेड बनी पहली पसंद

 
Bihar news: बिहार में तकनीकी शिक्षा की तस्वीर बदल रही है। पॉलिटेक्निक संस्थानों में बेटियों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है और इस साल नामांकन में करीब 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पहले जहां कुल नामांकन में छात्राओं की हिस्सेदारी 15-20 प्रतिशत के आसपास थी, अब यह बढ़कर 30-35 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

46 पॉलिटेक्निक संस्थानों में बढ़ी रफ्तार

राज्य के 46 सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेजों में हर साल औसतन 14 से 15 हजार छात्र-छात्राओं का नामांकन होता है। वर्षवार आंकड़ों पर नजर डालें तो:
    •    2023 में 3,170 छात्राओं ने दाखिला लिया
    •    2024 में यह संख्या बढ़कर 3,428 हुई
    •    2025 में 3,496 छात्राओं ने नामांकन कराया

तीन वर्षों में छात्राओं की कुल संख्या 35 हजार से अधिक पहुंच चुकी है, जो बदलाव का स्पष्ट संकेत है।

सिविल ट्रेड सबसे लोकप्रिय

तकनीकी शिक्षा में सिविल इंजीनियरिंग ट्रेड छात्राओं की पहली पसंद बनकर उभरी है। 2025 में 915 छात्राओं ने सिविल ट्रेड चुना। इसके अलावा कंप्यूटर साइंस, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेड में भी बड़ी संख्या में बेटियां आगे आ रही हैं।

2024 में 969 छात्राओं ने सिविल, 835 ने कंप्यूटर साइंस, 550 ने इलेक्ट्रिकल और 592 ने इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेड में दाखिला लिया था। वहीं 2025 में कंप्यूटर साइंस में 848, इलेक्ट्रिकल में 536 और इलेक्ट्रॉनिक्स में 608 छात्राओं ने नामांकन कराया।

सरकारी योजनाओं का असर

विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण, छात्र क्रेडिट कार्ड योजना और तकनीकी शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता ने इस बदलाव को गति दी है। पहले जहां लड़कियां मेडिकल और नर्सिंग जैसे क्षेत्रों तक सीमित थीं, अब वे इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा में भी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।

मेकैनिकल में भी बढ़ी रुचि

हर साल मेकैनिकल इंजीनियरिंग में 200 से अधिक छात्राएं दाखिला ले रही हैं। हालांकि ऑटोमोबाइल, केमिकल और अन्य इंजीनियरिंग ट्रेड में अभी संख्या अपेक्षाकृत कम है, लेकिन रुझान सकारात्मक है।

नई दिशा, नया आत्मविश्वास

बिहार में तकनीकी शिक्षा में बेटियों की बढ़ती भागीदारी न केवल रोजगार के अवसर बढ़ाएगी, बल्कि राज्य की आर्थिक और सामाजिक संरचना को भी मजबूत करेगी। पॉलिटेक्निक में बढ़ता नामांकन इस बात का संकेत है कि अब बेटियां केवल सपने नहीं देख रहीं, बल्कि उन्हें साकार करने की राह भी चुन रही हैं।