बंगाल में भाजपा ने एक भी मुस्लिम को नहीं दिया टिकट, 2021 के 8 प्रत्याशी से शून्य पर अंटका
पश्चिम बंगाल में पिछली बार विधानसभा चुनाव 2021 में हुए थे. तब भाजपा ने 294 सीटों में से सिर्फ 8 पर मुसलमान प्रत्याशी उतारे थे. ये ज्यादातर दिनाजपुर, मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में थे. लेकिन नतीजे चौंकाने वाले आए. 8 मुस्लिम प्रत्याशी में एक भी नहीं जीता. मुस्लिम बहुल 112 सीटें तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने जीतीं थीं. टीएमसी को 75% वोट मिले थे, जबकि भाजपा को सिर्फ 7% हासिल हुआ था. मालदा के सुजापुर में एक प्रत्याशी को 366 बूथों में से 244 पर सिंगल डिजिट वोट मिले, 19 बूथों पर 0 वोट. भाजपा ने पूरे बंगाल में 77 सीटें जीतीं, लेकिन मुस्लिम इलाकों में प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था.
सनद रहे कि इससे पहले 2016 में भाजपा ने सिर्फ 3 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से भी कोई कामयाब नहीं हुआ था. 2016 में भाजपा को सिर्फ 3 सीटें मिली थीं. यानी ट्रेंड साफ है कि हर बार संख्या घटती गई. बीते 10 सालों में बंगाल में भाजपा का एक भी मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव नहीं जीता है. अब भाजपा की रणनीति पूरी तरह 'जिताऊ प्रत्याशी' पर टिकी है. पार्टी को लगता है कि मुस्लिम उम्मीदवारों को भाजपा के टिकट पर मुस्लिम वोटरों का समर्थन नहीं मिलता है. बंगाल में मुस्लिम आबादी करीब 33% है, लेकिन मुस्लिम वोटरों का बड़ा हिस्सा टीएमसी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है.
भाजपा अब हिंदू वोट को 100% एकजुट करने पर फोकस कर रही है. 'अल्पसंख्यक तुष्टिकरण' का मुद्दा उठाकर और विकास, सुरक्षा, सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जोर देकर हिंदू आबादी को अपनी ओर आकर्षित करना चाहती है. अल्पसंख्यक मोर्चा के नेता भी कह रहे हैं कि समुदाय की सेवा प्रत्याशी उतारने से नहीं, बल्कि विकास और सुरक्षा से जुड़ी है. बंगाल भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष अली हुसैन ने साफ कहा कि पार्टी का मानना है कि किसी समुदाय के लिए जिम्मेदारी सिर्फ उस समुदाय से उम्मीदवार उतारने पर निर्भर नहीं करती है. 2021 में मुस्लिम उम्मीदवारों की हार के बाद पार्टी ने यह निष्कर्ष निकाला कि टिकट देककर भी वोट नहीं मिलता, इसलिए अब इस रास्ते से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया गया.
बहरहाल, भाजपा के मुकाबले अन्य सभी पार्टियों ने मुस्लिम प्रत्याशी पर दांव खेला है. कांग्रेस पार्टी सबसे ज्यादा 78 मुस्लिम प्रत्याशी, टीएमसी 47 मुस्लिम और लेफ्ट फ्रंट 26 मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव मैदान में उतारा है. एआईएमआईएम और एजेयूपी गठबंधन ने मुस्लिम बहुल इलाकों में 12 से ज्यादा प्रत्याशी उतारे हैं. भाजपा का शून्य होने से विपक्ष इसे 'मुस्लिम विरोधी' बता रहा है, लेकिन भाजपा का तर्क है कि जिम्मेदारी टिकट से नहीं, काम से निभाई जाती है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2021 में 75% मुस्लिम वोट टीएमसी को गया था. 2026 में भी ज्यादातर मुस्लिम वोट टीएमसी या कांग्रेस की ओर जा सकता है. एआईएमआईएम जैसे छोटे दलों से वोट बंट सकता है. ये भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष फायदा हो सकता है. कुल मिलाकर भाजपा का टारगेट हिंदू वोट को एकजुट करके 2021 का 38% वोट शेयर बढ़ाना है. भाजपा मुस्लिम बहुल सीटों पर भी हिंदू वोट पर ध्यान केन्द्रित कर लड़ाई लड़ना चाहती है. वहीं, टीएमसी का मुस्लिम वोट को और मजबूत करने पर जोर है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर मुस्लिम वोट बंटा तो भाजपा को फायदा हो सकता है, लेकिन अगर टीएमसी ने इसे एकजुट रखा तो मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण उसे और मजबूत करेगा. वर्ष 2026 का उक्त फैसला भाजपा की बंगाल रणनीति का सबसे साफ संकेत है कि 'जिताऊ पहले, समुदाय का प्रतिनिधित्व बाद में.' 2021 में 8 मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर भी कोई फायदा नहीं हुआ, इसलिए पार्टी ने अब इसे दरकिनार कर दिया. भाजपा के लिए ये सिर्फ प्रत्याशी सूची नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति की नई दिशा है. भाजपा का कहना है कि 2 लाख मुस्लिम सदस्यों की सेवा विकास से होगी, न कि टिकट से. लेकिन विपक्ष इसे 'मुस्लिमों को नजरअंदाज' बता रहा है. असली फैसला 4 मई 2026 को मतगणना के दिन होगा.