पटना हाईकोर्ट का बड़ा प्रशासनिक फेरबदल: 6 जिला जजों का तबादला, नई जिम्मेदारियां तय

 
Bihar news: पटना हाई कोर्ट ने न्यायिक प्रशासन में व्यापक बदलाव करते हुए कई जिला एवं सत्र न्यायाधीशों के तबादले और नई तैनाती की अधिसूचना जारी की है। 20 फरवरी 2026 को जारी आदेश के तहत छह वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों को विभिन्न जिलों में स्थानांतरित किया गया है। यह तबादला ‘चेन ट्रांसफर’ के तहत किया गया है, ताकि प्रशासनिक निरंतरता बनी रहे।

कौन-कहां हुए तैनात?
    •    दीपंकर पांडेय, प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मधुबनी को भागलपुर स्थानांतरित किया गया है। वे वहां धर्मेंद्र कुमार सिंह का स्थान लेंगे।
    •    धर्मेंद्र कुमार सिंह, भागलपुर से स्थानांतरित होकर बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, पटना में सदस्य सचिव बनाए गए हैं।
    •    सुश्री अनामिका टी., रजिस्ट्रार (स्थापना), पटना हाईकोर्ट को पश्चिम चंपारण (बेतिया) का प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश नियुक्त किया गया है।
    •    प्रजेश कुमार, पश्चिम चंपारण से स्थानांतरित होकर पटना हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार (स्थापना) बनाए गए हैं।
    •    अखिलेश कुमार झा, सचिव, बिहार विधान परिषद को सीतामढ़ी का प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश बनाया गया है।
    •    दिनेश शर्मा, सीतामढ़ी से स्थानांतरित होकर सहरसा के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश होंगे।
    •    पवन कुमार पांडेय, सदस्य सचिव, बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को मधुबनी का प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश नियुक्त किया गया है।
    •    आशुतोष कुमार झा, सहरसा से नवादा स्थानांतरित किए गए हैं।

नवादा में यह पद पूर्व में कार्यरत जज सुश्री शिल्पी सोनिराज के 6 फरवरी 2026 को हुए निधन के कारण रिक्त हुआ था।

आदेश का अनुपालन तत्काल

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी अधिसूचना में सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने वर्तमान पद का प्रभार निर्धारित अधिकारी को सौंपकर शीघ्र नई तैनाती स्थल पर योगदान दें।

प्रशासनिक संतुलन की कोशिश

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फेरबदल न्यायिक व्यवस्था को सुचारू और प्रभावी बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया है। चेन ट्रांसफर के माध्यम से विभिन्न जिलों में अनुभव और प्रशासनिक संतुलन स्थापित करने की कोशिश की गई है।

इस बड़े प्रशासनिक बदलाव के बाद राज्य के कई जिलों में न्यायिक नेतृत्व में बदलाव देखने को मिलेगा, जिसका असर न्यायिक कामकाज की गति और व्यवस्था पर पड़ने की संभावना है।