महागठबंधन की मीटिंग में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं पहुंचा, क्या कांग्रेस अब बिहार की राजनीति में अपनी अलग राह बनाने की तैयारी कर रही है?

Jharkhand Desk: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा रही, लेकिन प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा. पार्टी ने 61 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और सिर्फ 6 सीटें जीत पाई और वोट शेयर लगभग 8.71% प्रतिशत रह गया. राजनीति के जानकारों के मुताबिक कांग्रेस अपने वोट बैंक को बचाने में भी असफल रही.
 

Jharkhand Desk: बिहार विधानसभा का सत्र कल 1 दिसंबर से शुरू हो रहा है. इससे ठीक दो दिन पहले, 29 नवंबर को महागठबंधन की मीटिंग पटना में हुई. मीटिंग में जो हुआ वह बिहार की राजनीति में उभरती नई तस्वीर की कहानी कहता दिखा. दरअसल, मीटिंग में तेजस्वी यादव को विधानसभा में महागठबंधन का नेता चुन लिया गया. आरजेडी के सारे विधायक थे, लेफ्ट वाले भी शामिल हुए, लेकिन कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं पहुंचा. बस एक एमएलसी समीर कुमार सिंह आए, वो भी सिर्फ दिखाने के लिए. कांग्रेस ने कहा – हमारे सारे विधायक दिल्ली में अपनी अलग मीटिंग कर रहे हैं.आरजेडी वाले कह रहे हैं – कोई बात नहीं, तेजस्वी ही नेता हैं. लेकिन, सूत्रों से मिली अंदर की खबर तो यही है कि कांग्रेस ने साफ मना कर दिया है.

बता दें कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा रही, लेकिन प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा. पार्टी ने 61 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और सिर्फ 6 सीटें जीत पाई और वोट शेयर लगभग 8.71% प्रतिशत रह गया. राजनीति के जानकारों के मुताबिक कांग्रेस अपने वोट बैंक को बचाने में भी असफल रही. अब कांग्रेस के नेता इस का ठीकरा राजद नेतृत्व पर थोप रहे हैं. 29 नवंबर को तेजस्वी यादव को महागठबंधन का नेता चुने जाने वाली बैठक में कांग्रेस की अनुपस्थिति सिर्फ एक औपचारिक ग़ैरमौजूदगी नहीं थी. यह संकेत माना जा रहा है कि कांग्रेस महागठबंधन के निर्णय लेने की प्रक्रिया से खुद को अलग महसूस कर रही है. बिहार में पिछले कुछ महीनों से यह चर्चा है कि कांग्रेस अपने संगठन को मजबूत कर अगला चुनाव अकेले लड़ने का विकल्प रख सकती है.

साल दर साल  बिहार में नीचे जाती रही कांग्रेस

दरअसल, कांग्रेस बिहार में कभी मजबूत राजनीतिक ताकत रही है, लेकिन पिछले दो दशकों में पार्टी का जनाधार लगातार घटता गया है. वर्ष 2005 अक्टूबर चुनाव में कांग्रेस को 9 सीटें मिलीं और वोट शेयर 6.09% रहा.  उसके बाद तो कांग्रेस ने हिम्मत नहीं की. हां, वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 4 सीटें मिली थीं और उसका वोट शेयर करीब 8.37% था. जाहिर है यह प्रदर्शन कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था. इसके बाद पार्टी ने 2015 में राजद-जदयू गठबंधन और 2020 में महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा. 2015 में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा और उसे 27 सीटें मिलीं और वोट शेयर 6.7% मिला. उस चुनाव ने कांग्रेस को राहत दी थी, लेकिन यह स्पष्ट हुआ कि सफलता राजद-जदयू के साथ गठबंधन की वजह से थी. इसके बाद वर्ष 2020 में कांग्रेस ने 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और सिर्फ 19 सीटों पर जीत सकी. वोट प्रतिशत लगभग 9.5% रहा. जाहिर है यह प्रदर्शन फिर से पार्टी की स्थिति पर सवाल खड़े करने वाला था.

बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस का प्रदर्शन

  • 2005 (अक्तूबर)- कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा; 9 सीटें जीतीं, वोट-शेयर 6.09% रहा.
  • 2010- कांग्रेस ने अकेले ही हिस्सा लिया; 4 सीटें जीतीं, वोट-शेयर 8.37% रहा.
  • 2015- कांग्रेस ने महागठबंधन (RJD–JDU) अन्य) के साथ चुनाव लड़ा;27 सीटें जीतीं, वोट-शेयर 6.7% रहा.
  • 2020- कांग्रेस ने RJD-केंद्रित महागठबंधन के साथ लड़ा; 19 सीटें जीतीं, वोट-शेयर 9.5% रहा.
  • 2025- महागठबंधन के साथ लड़ने के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर रहा; महज 6 सीटें जीतीं, वोट-शेयर 8.71% रहा.

अब कांग्रेस क्यों अलग होना चाहती है?

जानकार बता रहे हैं कि 2025 में हार के बाद कांग्रेस को लग रहा है कि तेजस्वी यादव के साथ रहने से उसका कुछ बचा नहीं. तेजस्वी को सीएम फेस बनाया, फिर भी हार गए. कांग्रेस का वोट यादवों में गया, पर आरजेडी का वोट कांग्रेस को नहीं मिला, उल्टा कांग्रेस का वोट काट लिया. बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार राम तक अपनी सीट हार गए. दल नेता शकील अहमद खान भी हार गए. दिल्ली की समीक्षा बैठक में राहुल गांधी के सामने बिहार के नेताओं ने साफ-साफ कहा कि- बिहार में आरजेडी के साथ रहेंगे तो पार्टी खत्म हो जाएगी. अब या तो ज्यादा सीटें लेकर रहें या अलग हो जाएं.

कांग्रेस के सामने चुनौती क्या है?

हालांकि, राजनीति के जानकारों की नजर में अगर कांग्रेस अकेले चलने का फैसला करती है तो उसके सामने ये बड़ी चुनौतियां होंगी. पहला तो यह कि खोया हुआ वोट बैंक वापस पाना, दूसरा यह कि संगठन को जिला और ब्लॉक स्तर पर मजबूत करना, तीसरा यह कि युवा नेतृत्व और नई राजनीतिक लाइन तय करना. इन सबसे ऊपर तो यह कि पहले की गलतियों से सीखना. कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि पार्टी विकल्प तलाश रही है, लेकिन जल्दबाज़ी में फैसला नहीं होगा. मगर अब यह साफ दिख रहा है कि गठबंधन में उसकी भूमिका पहले जैसी नहीं रह गई है. कांग्रेस अगर अपनी पहचान वापस लाना चाहती है तो उसे सख्त और स्वतंत्र राजनीतिक लाइन लेनी होगी.

जानकार कहते हैं कि कांग्रेस के सामने दो ही रास्ते हैं- महागठबंधन में रहें, लेकिन अगले चुनाव में 100 के आसपास सीटें मांगें. पूरी तरह अलग हो जाएं और अकेले चुनाव लड़ें. पार्टी नेताओं का मानना है कि भले 10-15 सीटें आएं पर अपनी पार्टी बचेगी. बहरहाल, कल से 18वीं विधानसभा का सत्र शुरू हो रहा है. तेजस्वी यादव विपक्ष के नेता बनकर बोलेंगे, मगर कांग्रेस के 6 विधायक क्या करेंगे यह देखना दिलचस्प होगा. वहीं, जानकार कहते हैं कि सीधी बात इतनी है- कांग्रेस को लग गया है कि तेजस्वी की छाया में वह मर जाएगी, इसलिए अब वह अपना अलग रास्ता देख रही है!