प्रशांत किशोर ने दिया पलटवार: मंत्री अशोक चौधरी के मानहानि नोटिस को बताया ‘निराधार और राजनीतिक चाल’

 

Patna Desk: जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने जेडीयू मंत्री अशोक चौधरी द्वारा भेजे गए 100 करोड़ रुपये की मानहानि नोटिस पर बड़ा जवाब दिया है। पीके की ओर से उनके अधिवक्ता देवाशीष गिरि ने शनिवार को भेजे गए विस्तृत जवाब में इस नोटिस को निराधार, तथ्यहीन और राजनीतिक रूप से प्रेरित करार दिया।

पार्टी का बयान

जन सुराज पार्टी के प्रदेश महासचिव किशोर कुमार ने जानकारी दी कि अशोक चौधरी के नोटिस का जवाब दस्तावेज़ी तथ्यों के साथ दिया गया है। उन्होंने कहा कि, “जनता के सवालों से बचने और सच्चाई को छिपाने के लिए मंत्री चौधरी ने कानूनी रास्ता अपनाने की कोशिश की है।”

जमीन सौदों पर सवाल

जवाब में 2021 में हुई एक जमीन डील का ज़िक्र किया गया है। इसमें बताया गया कि योगेंद्र दत्त द्वारा अशोक चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी को जो प्लॉट बेचा गया था, उसकी रजिस्ट्री (डीड संख्या 2705) में साफ लिखा है कि 34.14 लाख रुपये का पूरा भुगतान चेक, डिमांड ड्राफ्ट और नकद में हो चुका है। ऐसे में बाद में किसी तरह की मांग बेमानी है।

लेकिन पार्टी ने सवाल उठाया कि उस समय शांभवी की उम्र 23 वर्ष थी और वह किसी भी पेशे में नहीं थीं। सांसद बनने के बाद भी उनकी घोषित आय इतनी नहीं थी कि वे अप्रैल 2025 में अलग से 25 लाख रुपये का भुगतान कर पातीं।

संपत्ति खरीद और रजिस्ट्री में विसंगतियां

जन सुराज पार्टी का दावा है कि चौधरी परिवार ने कई संपत्तियां बाजार मूल्य से कम रकम दिखाकर रजिस्ट्री कराई है। इनमें मंत्री की पत्नी, सांसद बेटी और दामाद से जुड़े नामों का उपयोग किया गया। पार्टी ने इन सौदों को मंत्री चौधरी की कथित बेनामी संपत्ति बताया है।

राजनीतिक अवसरवाद पर भी निशाना

जवाब में यह भी कहा गया है कि अशोक चौधरी का राजनीतिक सफर हमेशा अवसरवाद से भरा रहा। 2000 में कांग्रेस से विधायक बनना, बाद में राजद को समर्थन देकर मंत्री पद पाना और फिर जेडीयू में शामिल होना, उनके चरित्र को उजागर करता है।

‘जनहित में उठाए गए सवाल’

प्रशांत किशोर की ओर से कहा गया है कि चौधरी के खिलाफ लगाए गए आरोप जनहित में उठाए गए मुद्दे हैं। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों के कामकाज पर सवाल उठाना जनता और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का अधिकार है। ऐसे में कानूनी नोटिस भेजना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया गया है।