बिहार में शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश, नई रिपोर्ट से छिड़ी बहस
Newshaat Dedk: नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) ने 'इंडिया पॉलिसी फोरम-2026' में बिहार में तेज आर्थिक विकास और राजस्व बढ़ाने के लिए पूर्ण शराबबंदी कानून को खत्म करने और आबकारी शुल्क दोबारा शुरू करने की सिफारिश की है. हालांकि, सत्तारूढ़ दल एनडीए गठबंधन में शामिल जदयू ने इस पर समीक्षा से इनकार किया है. शराबबंदी से पहले एक्साइज ड्यूटी राज्य की कुल कमाई का 14% थी, जिसके बंद होने से भारी वित्तीय नुकसान हुआ है. प्रतिबंध के बावजूद अवैध शराब की तस्करी और नशीले पदार्थों का उपयोग बढ़ा है.
हाल ही में उक्त शोध संस्थान की रिपोर्ट में बिहार में शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश की गई है. इस रिपोर्ट ने पटना के राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि शराबबंदी से राज्य को भारी राजस्व का नुकसान हुआ है और महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के अपने मुख्य उद्देश्य को भी यह नीति हासिल नहीं कर पाई है. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भाजपा पर शराबबंदी को सही ढंग से लागू ना कर पाने का आरोप लगाया है. वहीं एनडीए के सहयोगी दलों ने शराबबंदी को खत्म करने के बजाय इसे और सख्ती से लागू करने की मांग की है. हालांकि जनता दल (यूनाइटेड) के कम से कम एक नेता ने शराबबंदी वापस लेने के पक्ष में राय दी है.
सत्तारूढ़ भाजपा इस बात से वाकिफ है कि अगर शराब की बिक्री दोबारा शुरू होती है तो राज्य के राजस्व में बड़ा इजाफा हो सकता है. लेकिन पार्टी यह भी समझती है कि शराबबंदी नीति में बदलाव करने से पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भावनाएं आहत हो सकती हैं. ऐसे में फिलहाल भाजपा इस नीति की समीक्षा करने में जल्दबाजी नहीं करेगी. ध्यान रहे कि इस साल अप्रैल में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए 10 साल पूरे हो गए हैं. पिछले सप्ताह इंडिया पॉलिसी फोरम में पेश की गई नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की एक शोध रिपोर्ट में राज्य सरकार को पूर्ण शराबबंदी समाप्त करने की सिफारिश की गई है.
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों में कहा गया है कि शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने में सफल नहीं रही जबकि अप्रैल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसी उद्देश्य से राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी. राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुबोध कुमार मेहता ने कहा कि यह अध्ययन राज्य सरकार की ‘पूर्ण विफलता’ को उजागर करता है.
उन्होंने कहा, ”राज्य में शराबबंदी सभी राजनीतिक दलों की सर्वसम्मति से लागू की गई थी. हम आज भी शराबबंदी के पक्ष में हैं. यह अध्ययन सरकार की पूरी तरह विफलता दिखाता है. मामला सिर्फ हर साल होने वाले राजस्व नुकसान का नहीं है बल्कि शराब की समानांतर अवैध अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है. ऐसी रिपोर्टें संकेत देती हैं कि राज्य सरकार भविष्य में आंशिक या पूर्ण रूप से शराबबंदी से बाहर निकलने का रास्ता तलाश सकती है.
हालांकि जदयू का आधिकारिक रुख अब भी शराबबंदी के समर्थन में है. लेकिन पार्टी के सीतामढ़ी से सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने इस नीति की समीक्षा की मांग की. उन्होंने कहा, ”शराबबंदी कहीं भी सफल नहीं हुई है.” वहीं लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा, ”यह सही है कि राज्य का राजस्व बढ़ाने के उपाय खोजने होंगे लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि शराबबदी हटा दी जाए.” उधर, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि बिहार को गुजरात मॉडल अपनाना चाहिए जहां शराबबंदी को सख्ती से लागू किया जाता है. इससे पहले बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी साफ कर चुके हैं कि राज्य सरकार फिलहाल अपनी शराब नीति की समीक्षा नहीं करेगी.
हालांकि आधिकारिक बयानों से अलग सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर शराबबंदी को लेकर गंभीर चर्चा चल रही है. सूत्रों के मुताबिक, “शराबबंदी के बाद अवैध नशीले पदार्थों के इस्तेमाल में तेजी आई है और समानांतर अवैध शराब का कारोबार भी खड़ा हो गया है. इसके अलावा, अगर बिहार में होटल और पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देना है तो कम से कम आंशिक रूप से शराब की बिक्री की अनुमति देनी होगी.”
भाजपा सूत्र का कहना है कि फिलहाल राज्य सरकार शराब नीति की समीक्षा करने में जल्दबाजी नहीं करेगी. इस नीति में कोई भी बदलाव पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को असहज कर सकता है. इसलिए शराबबंदी हटाने का फैसला धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाली प्रक्रिया होगी.” रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार में अवैध नशीले पदार्थों के बाजार का तेजी से विस्तार हुआ है और लोग दूसरी तरह के नशे का ज्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ”कानूनी रूप से शराब पीने की व्यवस्था खत्म होने के बाद अवैध शराब की तस्करी बढ़ी है और वैकल्पिक नशीले पदार्थों का सेवन भी बढ़ गया है.”
शराबबंदी के कारण बिहार सरकार को हर साल भारी राजस्व का नुकसान हो रहा है. रिपोर्ट का अनुमान है कि यदि शराबबंदी हटाई जाती है तो राज्य की आय में 14 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है. वर्तमान में बिहार का वार्षिक राजस्व करीब 65000 करोड़ रुपये है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शराबबंदी लागू करने में कई बड़ी चुनौतियां सामने आई हैं जिनमें व्यवस्था में भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और बढ़ता दबाव और जहरीली अवैध से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम शामिल हैं. एनसीएईआर ने सुझाव दिया है कि बिहार को फिर से नियंत्रित (Regulated) शराब बिक्री और आबकारी कर (Excise Duty) की व्यवस्था लागू करनी चाहिए. रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा करने से कानून लागू कराने में लग रहे संसाधनों की बचत होगी और सरकार को अतिरिक्त टैक्स राजस्व मिलेगा, जिसे शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और रोजगार सृजन जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में खर्च किया जा सकेगा.
पश्चिम बंगाल भाजपा सरकार राज्य में तेजी से फैल रहे अवैध शराब और नशे के कारोबार पर पूरी तरह लगाम लगाने की तैयारी में है. हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल बिहार की तर्ज पर राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू करने की कोई योजना नहीं है. पश्चिम बंगाल की राज्य मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि सरकार का मकसद राजस्व या वैध कारोबार को नुकसान पहुंचाना नहीं है. लेकिन अवैध शराब, गांजा और अन्य मादक पदार्थों के कारोबार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने बताया कि पुलिस प्रशासन को साफ निर्देश दिए गए हैं कि इस तरह की गैरकानूनी गतिविधियों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.