कार्तिक माह तक चलेगा चतुर्मासा व्रतोपवास - स्वामी चिदात्मन जी महाराज
Begusarai: प्रत्येक वर्ष की भांति इस बार भी अखिल भारतीय सर्वमंगला अध्यात्मयोग विद्यापीठ सिद्धाश्रम एवं महर्षि चिदात्मन वेद विज्ञान अनुसंधान संस्थान न्यास परिसर में पुनित श्रावण माह से पुनित कार्तिक माह तक चतुर्मासा व्रतोपवास के साथ-साथ वेदयत्री का विवेचन चल रहा है. वेदयत्री जिसके ऋषि त्रिदेव हैं. उक्त बातें सर्वमंगला अध्यात्म योग विद्यापीठ सिमरियाधाम बेगूसराय के संस्थापक पूज्यपाद संत करपात्री अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन् जी महाराज ने ज्ञानमंच के समक्ष मौजूद भक्तों, श्रद्धालूओं और शुभचिंतकों को आशीष बचन देते हुए व्यक्त की. उन्होंने कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव (रुद्र) ये तीनों देव सर्वाभीष्ट सिद्ध कराने वालें हैं तथा कायित, वाचिक, मानसिक, सांसर्गिक, दोषों से मुक्ति दिलाने वाले हैं एवं चारों पदार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्रदान कराने वाले हैं.
स्वामी चिदात्मन् जी महाराज कहते हैं कि शास्त्रों के अनुसार चारों युगों (सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग) का प्राकट्य (आरंभ) अलग-अलग मास, पक्ष और तिथियों को हुआ है. इन चार युगों का प्रारंभ किस दिन से होता है. युगों के क्रम में सबसे पहले सत युग आता है; शेष तीनों युग क्रमश: आते हैं. आइए जानते हैं कि यह चारों युग कब से प्रारंभ होते हैं एवं कितने वर्षों बाद इनका प्रारंभ होता है.
सतयुग जिसे कृत युग भी कहा जाता है. सत युग में कुल 17,28,000 वर्ष होते हैं. शास्त्रानुसार सत युग का प्रारंभ अत्यंत पवित्र कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि से होता है. जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है. सत युग में धर्म अपने 4 चरणों से विद्यमान रहता है. सत्ययुग का तीर्थ- पुष्कर है. इस युग के अवतार- मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह (सभी अमानवीय अवतार हुए) हैं. अवतार होने का कारण- शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए ज्ञात है. इस युग की मुद्रा- रत्नमय है. इस युग के पात्र- स्वर्ण के हैं. इसी तरह त्रेतायुग में कुल 12,96,000 वर्ष होते हैं. शास्त्रानुसार त्रेता युग का प्रारंभ वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि से होता है. जिसे अक्षय तृतीया या आखा तीज भी कहा जाता है. त्रेता युग में धर्म अपने 3 चरणों से विद्यमान रहता है. त्रेतायुग का तीर्थ- नैमिषारण्य है. इस युग के अवतार- वामन, परशुराम, राम हैं. अवतार होने के कारण- बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए जाना जाता है. इस युग की मुद्रा- स्वर्ण है. इस युग के पात्र- चाँदी के है.
स्वामी चिदात्मन् जी महाराज कहते हैं कि शास्त्रों के अनुसार द्वापर युग में कुल 8,64,000 वर्ष होते हैं. शास्त्रानुसार द्वापर युग का प्रारंभ माघ मास की पूर्णिमा तिथि से होता है. द्वापर युग में धर्म अपने 2 चरणों से विद्यमान रहता है. द्वापरयुग का तीर्थ– कुरुक्षेत्र है. इस युग के अवतार- कृष्ण (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण) हैं. अवतार होने के कारण- कंसादि दुष्टों का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यों को मोहित करने के लिए जाना जाता है. इस युग की मुद्रा- चाँदी है. इस युग के पात्र- ताम्र के हैं. इसी तरह कलयुग में कुल 4,32,000 वर्ष होते हैं. शास्त्रानुसार कलियुग का प्रारंभ आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से होता है. कुछ ग्रंथों में भाद्रपद मास का भी संदर्भ मिलता है. कलियुग में धर्म अपने 1 चरण से विद्यमान रहता है. कलियुग का तीर्थ- गंगा हैं. इस युग के अवतार- कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर) हैं. अवतार होने के कारण- मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए जाना जा रहा है. इस युग की मुद्रा- लोहा है. इस युग के पात्र- मिट्टी के हैं. साथ ही यह भी बताया गया है कि कलियुग की शुरुआत भगवान कृष्ण के पृथ्वी से चले जाने से हुई थी. यह घटना ईसा पूर्व 3102 में घटी थी. चूंकि कलियुग की अवधि 432,000 पृथ्वी वर्ष बताई गई है, जिसमें से 5,000 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, इसलिए कलियुग लगभग 426,000 वर्ष और चलेगा. आशा है इससे यह बात स्पष्ट हो गई होगी जो कभी-कभी भ्रामक लगती है.
स्वामी चिदात्मन जी महाराज कहते हैं कि शास्त्रों के अनुसार द्वादश कुम्भ - द्वादश राशि पर द्वादश मास में सूर्य - चन्द्र - बृहस्पति के योग से महाकुंभ योग बनता है जो इस राशि पर पुन: बारह वर्षों के बाद आता है. यह ऋषियों महर्षियों का एक अद्भुत अन्वेषण है, जो राष्ट्र की एकता अखंडता और मिलनसारिता को दर्शाता है. इसी क्रमवार प्रति वर्ष चतुर्मास- श्रावण, भाद्र, आश्विन और कार्तिक माह में होता है. प्रत्येक वर्ष कल्पवास : सूर्य मेष राशि पर वैशाख मास में हरिद्वार, तुला राशि पर कार्तिक मास में सिमरिया धाम तथा मकर राशि पर माघ मास में प्रयागराज में होता है. वहीं प्रत्येक तीन वर्षों में मलमास (पुरुषोत्तम मास) राजगीर में कल्पवास होता है. स्वामी चिदात्मन जी महाराज कहते हैं कि प्रसन्नता है कि आपके आश्रम (सिद्धाश्रम) में चातुर्मास्य महात्म्य के साथ-साथ वेद वेदांग (विवेचन) कथामृत संध्या 6 बजे से 8:00 बजे से रात्रि तक चलता है. उसके बाद आरती और प्रसाद वितरण का कार्यक्रम होता है.