बिहार में बढ गया टैक्स का बोझ! महंगा होगा सफर, जमीन और घर - सरकार के नए फैसलों से आम आदमी पर बढ़ा दबाव
Patna News: बिहार में आने वाले दिनों में आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। राज्य सरकार ने राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिनका सीधा असर परिवहन, जमीन की खरीद-बिक्री और मकान निर्माण पर दिखाई देगा। सरकार का लक्ष्य करीब 16,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व जुटाना बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या चुनावी घोषणाओं और नई योजनाओं का आर्थिक भार अंततः आम जनता को ही उठाना पड़ेगा?
वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य के सभी स्टेट हाईवे और कई पुलों से टोल टैक्स समाप्त कर दिया था। लेकिन अब नई 'बिहार सड़क उपयोगकर्ता शुल्क नीति-2026' के तहत इस व्यवस्था को फिर से लागू करने की तैयारी है। इस प्रस्तावित नीति के अनुसार कार, जीप और वैन जैसे हल्के वाहनों से लगभग 1.25 रुपये प्रति किलोमीटर, जबकि भारी वाहनों से 8 रुपये प्रति किलोमीटर तक शुल्क लिया जा सकता है। सरकार का अनुमान है कि इससे हर वर्ष लगभग 500 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी। हालांकि इसका सीधा असर परिवहन लागत और आम लोगों की यात्रा पर पड़ना तय माना जा रहा है।
बिहार सरकार ने राज्य में जमीन के सर्किल रेट में कई स्थानों पर 1.6 से 2 गुना तक वृद्धि कर दी है। राजधानी पटना के प्रमुख इलाकों में जमीन की कीमतें पहले से कहीं अधिक हो गई हैं। इसके साथ ही रजिस्ट्री पर लगने वाली स्टांप ड्यूटी भी 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दी गई है। महिलाओं को कुछ रियायत जरूर दी गई है, लेकिन बढ़े हुए सर्किल रेट और स्टांप शुल्क के कारण संपत्ति खरीदने वालों पर कुल आर्थिक बोझ पहले की तुलना में काफी बढ़ सकता है।
सिर्फ जमीन ही नहीं, मकान निर्माण की लागत भी बढ़ने की संभावना है। खनन विभाग ने अपना राजस्व बढ़ाने का लक्ष्य तय करते हुए बालू और पत्थर पर लगने वाली रॉयल्टी में वृद्धि की है। इससे निर्माण सामग्री की कीमतों में इजाफा होने की आशंका है, जिसका असर सीधे मकान बनाने वाले लोगों पर पड़ेगा।
बिहार का बजट भले ही लाखों करोड़ रुपये का हो, लेकिन राज्य पर सार्वजनिक कर्ज भी लगातार बढ़ रहा है। सरकार को हर वर्ष बड़ी राशि केवल पुराने कर्ज के ब्याज के भुगतान पर खर्च करनी पड़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य की आय का बड़ा हिस्सा अभी भी केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता और अनुदान पर निर्भर है। ऐसे में यदि राज्य सरकार अपनी आय बढ़ाना चाहती है तो उसे नए राजस्व स्रोत तलाशने पड़ रहे हैं। इसी वजह से टैक्स और शुल्क बढ़ाने जैसे फैसले सामने आ रहे हैं।
सरकार द्वारा मुफ्त बिजली, सामाजिक सहायता और अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर होने वाले बड़े खर्च को लेकर भी आर्थिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष का आरोप है कि चुनावी वादों का वित्तीय बोझ अब जनता पर डाला जा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि विकास और कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखने के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाना जरूरी है। हाल के महीनों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन भुगतान में हुई देरी और विभिन्न विभागों के बकाया भुगतान को लेकर भी सरकार की वित्तीय स्थिति पर सवाल उठे हैं। जानकारी के अनुसार कई ठेकेदारों के भुगतान भी लंबे समय से लंबित हैं, जिससे विकास कार्यों की गति प्रभावित होने की बात कही जा रही है।
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सरकार पर आरोप लगाया है कि चुनावी घोषणाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय व्यवस्था नहीं की गई है और अब उसकी भरपाई आम लोगों से की जा रही है। वहीं सरकार का दावा है कि अतिरिक्त संसाधन जुटाकर विकास योजनाओं को गति दी जाएगी और राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या बढ़े हुए टैक्स, टोल और शुल्क वास्तव में बिहार के विकास को नई दिशा देंगे, या फिर इनका सबसे बड़ा असर आम नागरिक की जेब पर पड़ेगा? आने वाले समय में इसका जवाब सरकार के राजस्व संग्रह और विकास कार्यों के परिणाम तय करेंगे। फिलहाल इतना तय है कि बिहार में सफर, जमीन और मकान - तीनों पहले से अधिक महंगे होने की राह पर हैं।