PACS के सहारे बदलेगी गांव की तस्वीर! नीति आयोग की कार्यशाला से बिहार के किसानों को मिलेगा नया रास्ता

 
    •    पटना में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ, 10 राज्यों के प्रतिनिधि शामिल
    •    खेती के साथ कारोबार की ओर बढ़ेगा PACS मॉडल, बढ़ेगी किसानों की आय
    •    मखाना, लीची और ‘श्री अन्न’ पर खास फोकस, ग्रामीण रोजगार को मिलेगा बढ़ावा
Bihar news: पटना में नीति आयोग की पहल पर शुरू हुई दो दिवसीय कार्यशाला ने बिहार के सहकारिता और कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने की उम्मीद जगा दी है। ‘नीति राज्य कार्यशाला श्रृंखला’ के तहत आयोजित इस कार्यक्रम का उद्घाटन सहकारिता मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार ने किया।

इस कार्यशाला का मकसद साफ है-प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) को मजबूत बनाकर किसानों की आय बढ़ाना और गांवों में ही रोजगार के नए अवसर पैदा करना।

10 राज्यों की भागीदारी, राष्ट्रीय स्तर पर मंथन
इस बड़े आयोजन में अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, उड़ीसा, पंजाब, सिक्किम और त्रिपुरा समेत 10 राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए हैं। कृषि विशेषज्ञ, नीति-निर्माता और संस्थानों के प्रतिनिधि मिलकर PACS के भविष्य को लेकर रणनीति तैयार कर रहे हैं।

PACS को मिलेगा नया रोल-खेती से आगे कारोबार तक
कार्यशाला में यह साफ किया गया कि अब PACS को सिर्फ कृषि ऋण तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इन्हें बहुआयामी संस्थान बनाकर कृषि के साथ-साथ अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से भी जोड़ा जाएगा। इससे गांवों में ही रोजगार सृजन होगा और किसानों की आमदनी बढ़ेगी।

पारंपरिक खेती से आगे बढ़ने की सलाह
मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार ने किसानों से अपील की कि वे सिर्फ धान-गेहूं तक सीमित न रहें, बल्कि मखाना, लीची, सब्जी, दुग्ध, शहद और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में भी कदम बढ़ाएं। साथ ही ‘श्री अन्न’ यानी बाजरा और मड़ुआ जैसी फसलों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया, जो पोषण के साथ-साथ जलवायु के अनुकूल भी हैं।

8,000 से ज्यादा PACS, करोड़ों सदस्य-बदल सकती है तस्वीर
सहकारिता विभाग के निबंधक रजनीश कुमार सिंह ने बताया कि बिहार में 8463 PACS सक्रिय हैं, जिनसे 1.39 करोड़ सदस्य जुड़े हैं। यदि इन्हें व्यावसायिक गतिविधियों से जोड़ा जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है।

छोटे किसानों के लिए बड़ा मॉडल
रमेश चंद ने कहा कि सहकारिता मॉडल ही छोटे और सीमांत किसानों को मजबूत बनाने का सबसे प्रभावी तरीका है। वहीं डॉ. राका सक्सेना ने बताया कि बिहार में 87% किसान छोटे जोत वाले हैं, ऐसे में PACS के जरिए उन्हें संगठित करना बेहद जरूरी है।

डिजिटल और आधुनिक PACS की दिशा में कदम
कार्यशाला में PACS के डिजिटलीकरण, आधुनिकीकरण, वित्तीय समावेशन और FPOs के साथ तालमेल जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हो रही है। साथ ही पूर्वी भारत के सफल मॉडलों को अपनाने की रणनीति भी बनाई जा रही है।

ग्रामीण भारत के लिए नई उम्मीद
इस कार्यशाला से निकलने वाले सुझाव आने वाले समय में नीतियों का आधार बनेंगे। साफ है कि अगर PACS को सही दिशा और संसाधन मिले, तो बिहार के गांव आत्मनिर्भर बन सकते हैं और किसानों की आय में स्थायी बढ़ोतरी संभव है।