जो पानी कल तक अभिशाप था, आज वही बना कमाई की ताकत—मखाना ने कोसी-सीमांचल की बदल दी किस्मत

 

Patna Desk: बाढ़, जलजमाव और दलदली जमीन… जिन हालातों को कभी खेती के लिए सबसे बड़ी परेशानी माना जाता था, आज वही कोसी और सीमांचल के किसानों के लिए कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गए हैं। इस बदलाव की वजह है बिहार का “सफेद सोना” कहे जाने वाला मखाना, जिसने चुपचाप पूरे इलाके में एक नई कृषि क्रांति खड़ी कर दी है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में चलाई जा रही मखाना विकास योजना अब कोसी-सीमांचल के किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। जहां पहले जलभराव खेती में बाधा बनता था, वहीं अब वही पानी किसानों की आमदनी बढ़ाने का माध्यम बन गया है।

दलदली जमीन से लाखों की कमाई

मखाना विकास योजना के प्रधान अन्वेषक और ‘मखाना मैन’ के नाम से प्रसिद्ध डॉ. अनिल कुमार बताते हैं कि उत्तर बिहार की जलमग्न और नीची जमीन को समस्या नहीं, बल्कि संभावना के रूप में देखा गया। वैज्ञानिक तरीके से खेती को बढ़ावा देकर मखाना जैसी पारंपरिक फसल को एक मजबूत कृषि-उद्यम में बदला गया है।

कभी जिसे जंगली फसल समझा जाता था, आज वही मखाना देश-दुनिया में बिहार की पहचान बन चुका है।

बाढ़ में छिपा था कमाई का सोना

डॉ. अनिल कुमार के अनुसार, बिहार में करीब 9.12 लाख हेक्टेयर ऐसी जमीन है, जो मखाना उत्पादन के लिए उपयुक्त है। सरकार की पहल से मखाना की खेती का रकबा 13,296 हेक्टेयर से बढ़कर 40,400 हेक्टेयर तक पहुंच चुका है।

योजना के तहत किसानों की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में औसतन 12 क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है। इससे किसानों की अतिरिक्त आमदनी ₹3.25 लाख से ₹3.75 लाख प्रति हेक्टेयर तक पहुंच रही है।

महिला किसानों की बदली तस्वीर

मखाना की खेती ने सिर्फ आय ही नहीं बढ़ाई, बल्कि महिला सशक्तिकरण की भी नई मिसाल पेश की है।

मखाना किसान मंझाली देवी बताती हैं, “मैं 20 साल से मखाना की खेती कर रही हूं। मखाना विकास योजना हमारे लिए वरदान है। आज इसी फसल से सालाना 3 से 3.5 लाख रुपये कमा रही हूं।”

वहीं मनीता कुमारी कहती हैं, “मखाना की खेती ने हमारे परिवार की जिंदगी बदल दी है। अब हमारी आमदनी पहले से दोगुनी हो गई है। इसके लिए हम मुख्यमंत्री का धन्यवाद करते हैं।”

कोसी-सीमांचल में चुपचाप चल रही कृषि क्रांति

आज मखाना कोसी-सीमांचल में सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि किसानों की उम्मीद बन चुका है। बाढ़ और जलजमाव से जूझने वाला यह इलाका अब मखाना की बदौलत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। साफ है कि जो पानी कभी अभिशाप था, वही आज किसानों के लिए खुशहाली की राह खोल रहा है।