बगहा में अवैध नर्सिंग होम पर क्यों नहीं होती कार्रवाई? उपाधीक्षक डॉ. ए.के. तिवारी ने खोली सिस्टम की परतें
डॉ. तिवारी के मुताबिक, जिन सरकारी चिकित्सकों को अवैध नर्सिंग होम की जांच का जिम्मा सौंपा जाता है, उन्हीं में से कुछ निजी स्तर पर खुद नर्सिंग होम चला रहे हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच और कड़ी कार्रवाई की उम्मीद बेमानी हो जाती है।
रेफर मरीजों के नाम पर खेल?
डॉ. तिवारी ने आरोप लगाया कि अनुमंडलीय अस्पताल से प्रसव के दौरान रेफर की गई महिलाओं को बहला-फुसलाकर निजी नर्सिंग होम में ले जाया जाता है। उनके अनुसार इसके पीछे एक संगठित रैकेट सक्रिय है, जो सरकारी सेवा में रहते हुए निजी क्लीनिक और नर्सिंग होम संचालित करने वाले चिकित्सकों के इशारे पर काम करता है।
सूत्रों की मानें तो निजी नर्सिंग होम में सीजेरियन डिलीवरी के नाम पर 30 से 40 हजार रुपये तक वसूले जाते हैं। इसमें से 25 से 30 प्रतिशत तक कमीशन मरीज पहुंचाने वालों को दिया जाता है। यही वजह है कि सरकारी अस्पताल से मरीजों को निजी संस्थानों तक ले जाने का सिलसिला थम नहीं रहा।
सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल
डॉ. तिवारी के बयान को स्वास्थ्य तंत्र के भीतर चल रही अंदरूनी गड़बड़ी की ओर सीधा संकेत माना जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिनका स्वयं का अवैध नर्सिंग होम संचालित हो रहा हो, उनसे निष्पक्ष जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
अब यह मामला सरकार और स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर जांच का विषय बनता दिख रहा है। सवाल यह है कि क्या अवैध नर्सिंग होम के खिलाफ ठोस कार्रवाई होगी या फिर सिस्टम की खामियां यूं ही परत दर परत छिपी रहेंगी?
रिपोटर: आशीष कुमार, प. चम्पारण