फर्श पर बैठकर भोजन करना, परंपरा या साइंस क्या कहता है?

Tradition or Science: एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह प्रथा न सिर्फ प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययनों से भी इसके फायदे साबित हो रहे हैं. जमीन पर बैठकर खाने की मुद्रा को 'सुखासन' कहा जाता है, जो शरीर और मन को शांत रखती है. जब आप आगे झुककर बाइट लेते हैं और वापस सीधे होते हैं, तो पेट की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं. 
 

Tradition or Science: कहते है हर सिक्के के दो पहलू होते है ठीक उसी तरह धर्म और विज्ञान के अपने अपने पहलू है. धर्म की भाषा कुछ और होती है और विज्ञान की भाषा कुछ और. ये दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग है. अब धर्म को यूँ समझ लीजिए कि धर्म एक रुका हुआ पानी है और विज्ञानं एक बहती हुई नदी. धर्म में विश्वास है कुछ हद तक कुरीतियां है वहीं विज्ञान में तथ्य है. मतलब एक दूसरे से बिलकुल अलग. विज्ञान सत्य और साक्ष्य पे भरोसा करता है. धर्म में श्रद्धा और आस्था का मतलब है मान लेना या सवाल ना करना.

परंपरागत कारण

भारतीय परंपरा में जमीन पर बैठकर खाना खाना सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि सेहत के लिए एक वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक तरीका माना जाता है. आयुर्वेद, योग और आधुनिक डाइटिशियंस के अनुसार, सुखासन (क्रॉस-लेग्ड या पालथी मारकर) में बैठकर भोजन करने से पाचन क्रिया बेहतर होती है, वजन नियंत्रित रहता है और कई स्वास्थ्य समस्याओं से राहत मिलती है.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह प्रथा न सिर्फ प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययनों से भी इसके फायदे साबित हो रहे हैं. जमीन पर बैठकर खाने की मुद्रा को 'सुखासन' कहा जाता है, जो शरीर और मन को शांत रखती है. जब आप आगे झुककर बाइट लेते हैं और वापस सीधे होते हैं, तो पेट की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं. इससे पाचन रस (डाइजेस्टिव ज्यूसेस) ज्यादा बनते हैं और भोजन आसानी से पचता है. आयुर्वेद में इसे 'अग्नि' (डाइजेस्टिव फायर) को मजबूत करने वाला माना जाता है, जिससे एसिडिटी, गैस, कब्ज और अपच जैसी समस्याएं कम होती हैं.

वैज्ञानिक कारण

इस पोजीशन में वगस नर्व (vagus nerve) बेहतर तरीके से एक्टिवेट होता है, जो 'रेस्ट एंड डाइजेस्ट' मोड को ट्रिगर करता है. इससे ब्रेन को पेट से सिग्नल जल्दी मिलते हैं कि पेट भर गया है, जिससे ओवरईटिंग रुकती है और वजन कंट्रोल में रहता है. साथ ही, निचले हिस्से में ब्लड फ्लो कम होने से पेट क्षेत्र में ज्यादा ब्लड सर्कुलेशन होता है, जो न्यूट्रिएंट्स के अब्सॉर्प्शन को बढ़ाता है.

इसके अलावा इससे जोड़ों और लचीलापन में सुधार होता है. हिप्स, घुटनों और एंकल्स की फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ती है, जो उम्र बढ़ने पर जोड़ों की समस्या से बचाव करती है. मन शांत रहता है, खाने का स्वाद बेहतर महसूस होता है और खाने पर पूरा ध्यान केंद्रित होता है. रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है, कोर मसल्स मजबूत होते हैं और पोस्चर बेहतर बनता है.