असम के चाय बागान बने सियासी रणभूमि, हिमंता बनाम हेमंत की लड़ाई में टी-ट्राइब वोट बैंक सबसे बड़ा फैक्टर..चाय बागान इलाकों में हेमंत सोरेन की एंट्री से टी-ट्राइब वोट बैंक में हलचल से कितना बदलेगा माहौल 

JMM Impact In Assam Election: असम विधानसभा चुनाव इस बार सिर्फ स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है. चाय बगानों के लिए मशहूर इस राज्य में झारखंड की राजनीति का असर भी साफ नजर आ रहा है. खासतौर पर हेमंत सोरेन और हिमंता बिस्वा सरमा के बीच राजनीतिक सक्रियता ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया है.
 

JMM Impact In Assam Election: असम के 2026 विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा (बीजेपी) और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (झारखंड मुक्ति मोर्चा – JMM) के बीच की राजनीतिक टक्कर पारंपरिक पार्टी प्रतिद्वंद्विता से कहीं आगे निकलकर चाय बगानों और टी-ट्राइब (Tea Tribe/आदिवासी) समुदायों के नीचे-ऊपर बदलते वोटिंग पैटर्न और सामाजिक मुद्दों तक पहुँच गई है. असम विधानसभा के चुनाव के आईने में इस बार झारखंड की राजनीति का चेहरा भी साफ साफ उभरकर सामने आया है.

2024 में झारखंड विधानसभा चुनाव में असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने झारखंड के खूब चक्कर लगाये थे, सो लगे हाथ इस बार झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी असम में हिसाब किताब बराबर करते दिखे. झारखंड में तो सरकार बनाने में बीजेपी चूक गयी थी, लेकिन असम में जेएमएम किस भूमिका में होगा, इस पर सभी की नजर है. दरअसल, असम विधानसभा चुनाव इस बार सिर्फ स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है. चाय बगानों के लिए मशहूर इस राज्य में झारखंड की राजनीति का असर भी साफ नजर आ रहा है. खासतौर पर हेमंत सोरेन और हिमंता बिस्वा सरमा के बीच राजनीतिक सक्रियता ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया है.

चाय बागानों का राजनीतिक महत्व

  • असम में चाय-बागान समुदाय (Tea Tribes) की आबादी लगभग 60 लाख के आसपास है और ये 35 + विधानसभा सीटों पर नतीजे प्रभावित कर सकते हैं.
  • ये समुदाय मुख्यतः पूर्वी असम में फैला है और इतिहासिक रूप से कांग्रेस का मतदाता माना जाता रहा है, लेकिन अब यह बीजेपी, कांग्रेस और JMM तीनों के लिए निर्णायक वोट बैंक बन गया है.

जेएमएम का फोकस. टी ट्राइब्स पर पूरा दांव

हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने इस चुनाव में अपनी रणनीति साफ रखी है. पार्टी ने असम के टी ट्राइब्स यानी चाय बगान से जुड़े समुदायों को केंद्र में रखा है. इन समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने, मजदूरी बढ़ाने और बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया गया है. राजनीति के जानकारों के अनुसार, असम में टी ट्राइब्स की आबादी बड़ी संख्या में है और यह कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकती है. जेएमएम ने इसी सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश की है.

18 सीटों पर दांव. असर कितना होगा

जेएमएम ने इस बार करीब 18 सीटों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. हालांकि पार्टी का संगठन असम में बहुत मजबूत नहीं माना जाता, लेकिन लगातार प्रचार और मुद्दा आधारित राजनीति ने उसे चर्चा में ला दिया है. सवाल यह है कि यह चर्चा वोट में कितनी तब्दील होगी. जानकार मानते हैं कि अगर जेएमएम कुछ सीटों पर भी प्रभाव डालती है, तो यह राज्य की बड़ी पार्टियों के समीकरण को प्रभावित कर सकती है. खासकर उन सीटों पर जहां मुकाबला करीबी है.

चुनाव प्रचार के दौरान एक नया विवाद भी सामने आया. हेमंत सोरेन ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के कारण उन्हें सभा करने की अनुमति नहीं दी गई. इसके बाद उन्होंने मोबाइल फोन के जरिए ही रोंगोनदी और चाबुआ की जनता को संबोधित किया. इससे पहले कल्पना सोरेन की सभा को भी अनुमति नहीं मिलने की बात सामने आई थी. इस मुद्दे ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया और विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर उठाया. 

खास बात यह कि जेएमएम की रणनीति सिर्फ टी ट्राइब्स तक सीमित नहीं रही. पार्टी ने दलित और पिछड़े वर्गों को भी जोड़ने की कोशिश की है. अनुमान है कि इस सामाजिक समीकरण के जरिए 80-90 लाख लोगों तक संदेश पहुंचाने की कोशिश की गई है. अब असली परीक्षा रिजल्ट के दिन होगी. 4 मई को यह साफ हो जाएगा कि जेएमएम का यह प्रयोग कितना सफल रहा. क्या यह सिर्फ चर्चा तक सीमित रहेगा या सीटों में बदलकर असम की राजनीति में नया समीकरण बनाएगा.

इंतजार रिजल्ट का, चाय बगान में किसकी खुशबू?

असम की सियासत में चाय बगान हमेशा से अहम रहे हैं. इस बार इन बगानों में सिर्फ स्थानीय मुद्दों की नहीं, बल्कि बाहरी राजनीतिक प्रभाव की भी चर्चा है. 4 मई को जब नतीजे आएंगे, तब यह तय होगा कि चाय बगानों में किस राजनीतिक दल की खुशबू सबसे ज्यादा फैली. फिलहाल इतना तय है कि जेएमएम ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर चुनाव को एक नया एंगल जरूर दे दिया है.