महिला सशक्तिकरण या सामाजिक न्याय से समझौता? नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर बहस

Ranchi: सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में निर्णायक पहल बताती है, जबकि विपक्ष इसे अधूरा और विलंबित सुधार करार देता है. इस बहस के केंद्र में यह सवाल है. क्या यह कानून सत्ता के ढांचे में वास्तविक बदलाव लाएगा या सिर्फ राजनीतिक लाभ तक सीमित रहेगा?
 

Ranchi: नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में संशोधन वाला विधेयक संसद के विशेष सत्र के दौरान लोकसभा में गिर गया. इसके बाद देशभर की राजनीति स्पष्ट रूप से दो धड़े में बंट गई है. झारखंड में भी सियासी बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है. इसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है, लेकिन इसके क्रियान्वयन की शर्तें और समय-सीमा को लेकर सियासी बहस तेज है.

समर्थन की दलीलें

  • महिलाओं की भागीदारी: संसद और विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ेगा।
  • नीतियों में लैंगिक संतुलन: शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण जैसे मुद्दों पर महिला दृष्टिकोण मजबूत होगा।
  • सांकेतिक से संरचनात्मक बदलाव: आरक्षण से राजनीति में महिलाओं की स्थायी उपस्थिति बन सकती है

एक ओर भारतीय जनता पार्टी और एनडीए में शामिल दलों के नेता इसे कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का महिला विरोधी चरित्र और चेहरा बता रहे हैं. वहीं भाजपा के नेता कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने महिला आरक्षण कानून में संशोधन को ओबीसी विरोधी बताकर एक नई और आक्रामक राजनीति को जन्म दे दिया है.

कांग्रेस, सपा, राजद, टीएमसी, झामुमो जैसे दल जिन्होंने महिला अधिकार के नाम पर साल 2023 में ओबीसी के लिए कोटा के अंदर कोटा कE प्रावधान नहीं होने के बावजूद अपना समर्थन दिया था. उस समय इन सभी दलों में से किसी ने भी महिला आरक्षण के अंदर ओबीसी की महिलाओं को आरक्षण देने की मांग नहीं उठाई थी.

ऐसे में भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश प्रवक्ता राफिया नाज कहती हैं कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की नीति ही है कि वह जाति और धर्म के नाम पर समाज को बांटती रही है. अब जब आधी आबादी को उनका हक देने की बात आई तो महिला विरोधी कांग्रेस, ओबीसी और अल्पसंख्यक को आरक्षण देने के नाम पर समाज को बांटने में लगी है.

ऐसे में अहम सवाल यह है कि जब 2023 में संसद से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम में अलग से ओबीसी की महिलाओं के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं था. ऐसे समय में अब कांग्रेस, सपा, राजद, झामुमो जैसे दलों द्वारा जातीय जनगणना के बाद महिलाओं के 33% आरक्षण में पिछड़ी जातियों के लिए "कोटा विदिन कोटा" की मांग क्यों की जा रही है.

ओबीसी महिलाओं के लिए भी हो आरक्षण- राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा

राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष राजेश गुप्ता कहते हैं कि यह सही है कि कांग्रेस को छोड़ जो अन्य पार्टियां पहले महिला आरक्षण में कोटा के अंदर कोटा की मांग बहुत मजबूती से करते थे. उन सभी दलों के साथ-साथ कांग्रेस ने भी 2023 नारी शक्ति वंदन अधिनियम को अपना समर्थन देकर पास कराया जबकि उसमें ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं था.

राजेश गुप्ता कहते हैं कि बाद में राहुल गांधी ने इन बातों को समझा कि ओबीसी की भागीदारी आजादी के 75 वर्ष बाद भी उनकी आबादी के अनुरूप नहीं हुई है. ऐसे में अब जरूर वह ओबीसी के हितों के प्रति मुखर हुए हैं.

ओबीसी को अब तक वाजिब हक नहीं मिलाः जगदीश साहू

झारखंड कांग्रेस के प्रवक्ता जगदीश साहू कहते हैं कि यह ठीक है कि 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का कांग्रेस ने समर्थन किया था. जब इस देश में जातीय जनगणना हो रही है और उसके नतीजे जब आ जाएंगे तो फिर ओबीसी को आरक्षण क्यों नहीं मिले? इसलिए कांग्रेस राजनीति और वोट बैंक के लिए नहीं बल्कि ओबीसी को हक दिलाने की लड़ाई लड़ रही है.

राजद की प्रदेश उपाध्यक्ष अनिता यादव कहती हैं कि बिना ओबीसी कोटा के महिला आरक्षण का लाभ मुख्यतः सवर्ण या प्रभावशाली वर्ग की महिलाओं को मिल सकता है. इससे सामाजिक न्याय का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा.

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023

भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में 2023 में “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” (Women’s Reservation Bill) पारित हुआ था. इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण 2029 से ही लागू करने के लिए संसद के विशेष सत्र में संशोधन विधेयक लाया गया. लेकिन संसद के विशेष सत्र के दौरान लोकसभा में यह प्रस्ताव गिर गया. इसके बाद भाजपा विपक्ष को महिला विरोधी बता रही है तो विपक्ष ने भाजपा को ओबीसी विरोधी बताकर घेरना शुरू कर दिया है.

नारी शक्ति वंदन अधिनियम, दरअसल भारतीय संविधान में संशोधन के जरिए लाया गया बिल है. जिसे आमतौर पर महिला आरक्षण बिल कहा जाता है. लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित SC/ST वर्ग के लिए पहले से मौजूद आरक्षण के भीतर भी महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित हैं. यह आरक्षण सीटों के रोटेशन (rotation) के आधार पर लागू होगा लेकिन ओबीसी की महिलाओं के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में संशोधन का प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया है. ऐसे में अब यह जनगणना और परिसीमन (delimitation) के बाद ही प्रभावी होगा, इसकी संभावना बढ़ गयी है. इसमें OBC महिलाओं के लिए अलग आरक्षण का प्रावधान नहीं था. ऐसे में भविष्य में जब यह लागू होगा, उसमें ओबीसी की महिलाओं के लिए आरक्षण के अंदर आरक्षण का कोई प्रावधान का लाभ उन्हें नहीं मिलेगा. जबकि इस अधिनियम में SC/ST महिलाओं के आरक्षण को आरक्षण का लाभ मिलेगा.

अगर ओबीसी की महिलाओं को भी आरक्षण मिले, इसके लिए एक बार फिर से 2023 के नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में संशोधन करना होगा. ओबीसी के मुखर रहने वाले लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, रामविलास पासवान जैसे नेताओं ने लंबे समय से OBC आरक्षण और महिला आरक्षण में ओबीसी की महिलाओं को आरक्षण देने का मुद्दा को हमेशा केंद्र में रखा. क्योंकि उनका तर्क था कि अगर महिलाओं को 33% आरक्षण मिलेगा तो उसमें OBC महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित होनी चाहिए. इसी वजह से कई बार संसद में महिला आरक्षण बिल सदन में आने के बावजूद लटक गया.

लेकिन 2023 में बिना ओबीसी महिला आरक्षण को सुनिश्चित किये ही लगभग सर्व सम्मति से नारी शक्ति वंदन अधिनियम लागू हो गया. उन सभी दलों ने उनका समर्थन किया जो अब तक महिला आरक्षण में ओबीसी की महिलाओं को आरक्षण देने के लिए मुखर रहा करती थी. बिहार जैसे राज्यों ने जातीय सर्वेक्षण कराया गया. इससे OBC आबादी का मुद्दा फिर से मुखरता से उठा. राजनीतिक दलों ने यह मुद्दा उठाया कि जब OBC आबादी बड़ी है, तो उन्हें अलग प्रतिनिधित्व क्यों नहीं. ऐसे में 2024 और आगे के चुनावों को देखते हुए OBC वोट बैंक बेहद अहम है, इसलिए यह मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में होगा.

संसद का विशेष सत्र

केंद्र सरकार ने 16 अप्रैल से 18 अप्रैल 2026 तक संसद का विशेष सत्र बुलाया. जिसमें महिला आरक्षण बिल (Women Reservation Bill) समेत 3 बिल पारित कराने थे. शुक्रवार को सदन के निचले सदन लोकसभा में यह बिल 298 के मुकाबले 230 वोटों से गिर गया. इस बिल को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी लेकिन सत्ता पक्ष इसे हासिल नहीं कर सका. जहां सत्ता पक्ष इसको लेकर विपक्षी दलों पर हावी है. वहीं, विपक्ष भी सरकार पर हमलावर है.

महिला आरक्षण अधिनियम- 2023

नारी शक्ति वंदन अधिनियम/महिला आरक्षण अधिनियम- 2023 (Women Reservation Act 2023) के लागू होने के बाद संसद के दोनों सदन लोकसभा और राज्यसभा समेत राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी. इस बिल के मुताबिक संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागेदारी करीब 33 फीसदी तक आरक्षित हो जाती लेकिन ऐसा नहीं हो सका. इस समय 18वीं लोकसभा में सांसदों की कुल संंख्या 543 है, जिसमें से 75 महिला सांसद शामिल हैं.

संसद के दोनों सदनों के सांसदों (लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 245) को मिलाया जाए तो यह संख्या 788 है. वहीं, लोकसभा में महिलाओं की संख्या 75 है और राज्यसभा में यह 42 है. लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों का आंकड़ा 31 है, जो किसी भी पार्टी से अधिक है. अगर बात प्रतिशत में की जाए तो लोकसभा में 14 और राज्यसभा में यह 17.14 फीसदी के आसपास है. अब बात करते हैं देश की विधानसभाओं की. सभी विधानसभाओं में महिला विधायकों का यह आंकड़ा सिर्फ 9 प्रतिशत ही है.

झारखंड विधानसभा चुनाव 2024 में प्रदेश की बात करें तो 12 महिला विधायक निर्वाचित होकर विधानसभा पहुंची हैं. झारखंड के 81 सदस्यीय सदन में आज महिलाओं की हिस्सेदारी का प्रतिशत 14.58 है. अगर दलगत आधार पर देखें तो इसमें सबसे ज्यादा कांग्रेस पार्टी से 5, भाजपा से 4 और जेएमएम से 3 महिला विधायक सदन में मौजूद हैं.

लोकसभा में भाजपा के 31 सांसदों के बाद कांग्रेस दूसरे स्थान पर है. इस पार्टी में कुल 14 महिला सांसद हैं. इसके बाद तृणमूल कांग्रेस की 11 महिला सांसद सदन में मौजूद हैं. इसके बाद समाजवादी पार्टी की हिस्सेदारी सदन में पांच महिला सांसदों की है. इसके बाद दक्षिण भारत राज्य तमिलनाडु की द्रमुक पार्टी की 3 महिला सांसद हैं. जदयू और लोजपा की 2-2 महिला सांसद हैं. इसके साथ अन्य के हिस्से में 7 महिला सांसद हैं. इनमें झामुमो, शिअद, टीडीपी, राजद, अपना दल, एनसीपी-शरद चंद्र, YSRCP शामिल हैं.

देश की 18वीं लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में बीजेपी की कुल 194 महिला सांसद और विधायक हैं. इसके बाद कांग्रेस की 72 महिला सांसद और विधायक हैं. तृणमूल कांग्रेस की 45 महिला सांसद और विधायक हैं. तेलुगू देशम पार्टी (TDP) की 21 महिला सांसद और विधायक हैं. समाजवादी पार्टी की 19 महिला सांसद और विधायक हैं. इसके बाद जनता दल-यूनाइटेड की 12 महिला सांसद और विधायक हैं.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस (ADR) की रिपोर्ट को देखें तो लोकसभा चुनाव 2024 में कुल 8360 प्रत्याशी मैदान में थे, जिसमें महिलाओं की हिस्सेदारी महज 800 यानी 9.60 प्रतिशत ही थी. इसके साथ ही 2024 लोकसभा चुनाव में 543 सीटों में से करीब 152 यानी 28 फीसदी सीटों पर महिला उम्मीदवार खड़ी ही नहीं हुईं. पार्टियों की बात करें तो भारतीय जनता पार्टी ने महज 16 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिया था. वहीं, कांग्रेस और सीपीआई-एम ने 13-13 फीसदी टिकट दिया था.