भारतीय मजदूर युद्ध की आग में फंसे, सरकार की खामोशी पर दीपांकर भट्टाचार्य ने उठाए गंभीर सवाल...
Dhanbad: निरसा में दो दिन की CPI (ML) स्टेट कमेटी की मीटिंग हुई, जहां पार्टी के शीर्ष नेताओं ने देश की मौजूदा स्थिति, केंद्र सरकार की विदेश नीति, मजदूरों की सुरक्षा और आर्थिक संकट को लेकर जमकर हमला बोला. बैठक के दौरान राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कई गंभीर मुद्दों को उठाते हुए केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया. देश के बाहर युद्धग्रस्त इलाकों में फंसे भारतीय मजदूरों को लेकर सियासत तेज हो गई है. दीपांकर भट्टाचार्य ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि सरकार की चुप्पी बेहद चिंताजनक और अमानवीय है. उन्होंने आरोप लगाया कि युद्ध की आग में फंसे मजदूरों की सुरक्षा और स्वदेश वापसी को लेकर केंद्र सरकार गंभीर नजर नहीं आ रही है.
“मजदूरों की जान की कोई कीमत नहीं?”
दीपांकर भट्टाचार्य ने बयान जारी कर कहा कि बड़ी संख्या में भारतीय मजदूर रोजगार के सिलसिले में विदेशों में काम कर रहे हैं, जिनमें से कई इस समय युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में फंसे हुए हैं. ऐसे हालात में केंद्र सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी बनती है कि वह उनकी सुरक्षा, भोजन, चिकित्सा और सुरक्षित वापसी की व्यवस्था करे, लेकिन सरकार इस मुद्दे पर खामोश बनी हुई है.
उन्होंने सवाल उठाया कि
- आखिर सरकार अब तक स्पष्ट रेस्क्यू प्लान क्यों नहीं लाई?
- फंसे मजदूरों और उनके परिजनों से सीधा संवाद क्यों नहीं हो रहा?
- क्या गरीब मजदूरों की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है?
अमेरिका तथा इजरायल से युद्ध रोकने की अपील करनी चाहिएः माले महासचिव
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को गलत बताते हुए कहा कि इसी वजह से भारत भी इस संकट में फंसता नजर आ रहा है. माले महासचिव ने मांग की कि भारत सरकार को इस युद्ध के खिलाफ खुलकर सामने आना चाहिए और अमेरिका तथा इजरायल से दो टूक शब्दों में युद्ध रोकने की अपील करनी चाहिए.
युद्ध का असर भारतीय प्रवासी मजदूरों परः दीपांकर भट्टाचार्य
दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि इस युद्ध का सबसे बड़ा असर प्रवासी भारतीय मजदूरों पर पड़ रहा है. उन्होंने बताया कि करीब एक करोड़ भारतीय मजदूर ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं, जिनकी स्थिति बेहद चिंताजनक है. कई मजदूरों के मारे जाने की खबरें भी सामने आ रही हैं, जबकि हजारों मजदूर वहां फंसे हुए हैं.
केंद्र सरकार का उदासीन रवैयाः भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युद्ध से पहले इजरायल का दौरा कर चुके हैं और वहां अगले पांच वर्षों में 50 हजार मजदूर भेजने का वादा किया गया था. ऐसे में उन्होंने सरकार पर प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा को लेकर उदासीन रवैया अपनाने का आरोप लगाया.
सरकार पर “चुनिंदा चिंता” का आरोप
दीपांकर भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार केवल वीआईपी और बड़े वर्ग के नागरिकों को लेकर त्वरित कदम उठाती है, जबकि मेहनतकश मजदूरों के मामले में उदासीन रवैया अपनाया जाता है. उन्होंने कहा कि विदेशों में फंसे मजदूरों में बड़ी संख्या बिहार, झारखंड, यूपी और अन्य गरीब राज्यों के लोगों की है, जिनकी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती.
परिजनों में बढ़ती चिंता
उधर, युद्धग्रस्त इलाकों में फंसे मजदूरों के परिजनों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है. कई परिवारों का कहना है कि उन्हें न तो सरकार की ओर से कोई ठोस जानकारी मिल रही है और न ही दूतावासों से संतोषजनक जवाब. मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट बाधित होने के कारण मजदूरों से संपर्क भी टूटता जा रहा है.
त्वरित हस्तक्षेप की मांग
दीपांकर भट्टाचार्य ने मांग की कि केंद्र सरकार
- युद्ध प्रभावित देशों में भारतीय दूतावासों को तुरंत सक्रिय करे
- फंसे मजदूरों का पूरा डेटा सार्वजनिक करे
- सुरक्षित निकासी (एवैक्यूएशन) के लिए विशेष अभियान चलाए
- मजदूरों और उनके परिजनों को नियमित अपडेट दे
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए, तो इसे लेकर देशव्यापी आंदोलन भी किया जा सकता है.
विपक्ष का दबाव बढ़ा
इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने भी केंद्र सरकार को घेरना शुरू कर दिया है. विपक्ष का कहना है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी कूटनीतिक ताकत का दावा करती है, लेकिन संकट की घड़ी में अपने ही नागरिकों खासकर मजदूरों—को नजरअंदाज कर रही है. फिलहाल, युद्ध में फंसे भारतीय मजदूरों की सुरक्षित वापसी को लेकर देशभर में निगाहें केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं, जबकि विपक्ष सरकार की चुप्पी को संवेदनहीनता करार दे रहा है.