भूमि सर्वे की धीमी रफ्तार पर हाईकोर्ट नाराज, तय समय में रिपोर्ट देने का निर्देश

Ranchi: हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि भूमि सर्वे राज्य से जुड़े अहम मुद्दों में से एक है और इसमें अनावश्यक देरी आम जनता के हितों को प्रभावित कर रही है. कोर्ट ने कहा कि बार-बार समय लेने के बावजूद अपेक्षित प्रगति न होना गंभीर विषय है. चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान...​​​​​​
 

Ranchi: झारखंड में लंबे समय से लंबित भूमि सर्वे (लैंड सर्वे) को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. अदालत ने भूमि सर्वे में हो रही लगातार देरी पर नाराजगी जताते हुए राज्य के राजस्व सचिव को 15 जुलाई तक नया शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है.

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि भूमि सर्वे राज्य से जुड़े अहम मुद्दों में से एक है और इसमें अनावश्यक देरी आम जनता के हितों को प्रभावित कर रही है. कोर्ट ने कहा कि बार-बार समय लेने के बावजूद अपेक्षित प्रगति न होना गंभीर विषय है. चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान राजस्व विभाग के अवर सचिव द्वारा दाखिल शपथ पत्र पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि जब पिछली सुनवाई में स्वयं राजस्व सचिव को शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया गया था, तो अवर सचिव ने यह शपथ पत्र किस आधार पर दाखिल किया. खंडपीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया कि राजस्व सचिव स्वयं 15 जुलाई तक नए तथ्यों और अद्यतन जानकारी के साथ शपथ पत्र दाखिल करें. साथ ही मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 जुलाई की तिथि निर्धारित की गई है.

इससे पहले हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह शपथ पत्र के माध्यम से यह स्पष्ट करे कि झारखंड के सभी जिलों में भूमि सर्वे का कार्य कब तक पूरा कर लिया जाएगा. अदालत ने इस कार्य की प्रगति और निर्धारित समयसीमा के संबंध में स्पष्ट जानकारी मांगी थी. हालांकि, सरकार की ओर से राजस्व सचिव के स्थान पर अवर सचिव ने शपथ पत्र दाखिल किया, जिस पर अदालत ने असंतोष व्यक्त करते हुए इसे गंभीरता से लिया और पुनः राजस्व सचिव को व्यक्तिगत रूप से शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया.

1974-75 में शुरू हुआ था सर्वे, आज तक नहीं हुआ पूरा

मामले में प्रार्थी गोकुल चंद ने जनहित याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया है कि झारखंड क्षेत्र में भूमि का अंतिम व्यापक सर्वे वर्ष 1932 में हुआ था. इसके बाद वर्ष 1974-75 में नए भूमि सर्वे की प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन पांच दशक बीत जाने के बाद भी यह कार्य आज तक पूरा नहीं हो सका. याचिकाकर्ता ने अदालत से आग्रह किया है कि भूमि सर्वे कार्य पूरा करने के लिए सरकार के लिए निश्चित समयसीमा तय की जाए, ताकि सर्वे का कार्य जल्द पूरा हो सके और भूमि अभिलेखों को अद्यतन किया जा सके.

याचिका में कहा गया है कि भूमि सर्वे पूरा होने से राज्य में जमीन के रिकॉर्ड अपडेट होंगे. इससे भूमि की प्रकृति, स्वामित्व और सीमांकन से संबंधित विवादों में कमी आएगी. साथ ही जमीन के मालिकाना हक में संभावित हेराफेरी और फर्जीवाड़े पर भी रोक लगाने में मदद मिलेगी. विशेषज्ञों का भी मानना है कि अद्यतन भूमि रिकॉर्ड होने से विकास परियोजनाओं, मुआवजा वितरण और राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनेगी.

पूर्व की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया था कि भूमि सर्वे कार्य में तेजी लाने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है. इसके लिए राज्य की तीन टीमें बिहार, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक भेजी गई हैं, जहां वे आधुनिक भूमि सर्वे तकनीकों का अध्ययन कर रही हैं. सरकार ने अदालत को यह भी बताया था कि इन तकनीकों को झारखंड में लागू कर सर्वे प्रक्रिया को तेज किया जाएगा. अब तक लातेहार और लोहरदगा जिलों में भूमि सर्वे का कार्य पूरा किया जा चुका है, जबकि अन्य जिलों में यह प्रक्रिया जारी है. हाईकोर्ट ने अब सरकार से सर्वे कार्य पूरा करने की स्पष्ट समयसीमा और प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है.