निकाय चुनाव में बिखर रहा JMM, RJD और कांग्रेस का गठबंधन? कहां और क्यों हो रहा ऐसा? राजनीतिक घमासान की लड़ाई शुरू

Jharkhand Civic Elections: झारखंड नगर निकाय चुनाव कई मायनों में खास माने जा रहे हैं. ट्रिपल टेस्ट पूरा होने के बाद राज्य में पहली बार नगर निकाय चुनाव कराए जा रहे हैं.

क्यों है जरूरी शहरी निकाय चुनाव?

 

Jharkhand Civic Elections: झारखंड में काफी लंबे समय के बाद नगर निकाय चुनाव हो रहे हैं. साथ ही निकाय चुनाव को लेकर अब तस्वीरें काफी स्थिति स्पष्ट हो गई है. राज्य निर्वाचन आयोग ने नगर निकाय चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है. राज्य में एक ही दिन 23 फरवरी को मतदान होगा. वोटों की गिनती 27 फरवरी को कराई जाएगी. निर्वाचन आयोग के मुताबिक, मतदान 23 फरवरी को सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक होगा.

नामांकन प्रक्रिया 29 जनवरी से शुरू होकर 4 फरवरी तक चलेगी. नामांकन पत्रों की जांच  तारीख 5 फरवरी को को थी जिसके बाद आयोग ने कहा था कि  जो भी उम्मीदवार अपना नाम वापस लेना चाहते हैं वो 6 फरवरी तक अपना नाम वापस ले सकेंगे. जिसके बाद 7 फरवरी को चुनाव चिन्हों का आवंटन किया गया.

झारखंड नगर निकाय चुनाव कई मायनों में खास माने जा रहे हैं. ट्रिपल टेस्ट पूरा होने के बाद राज्य में पहली बार नगर निकाय चुनाव कराए जा रहे हैं.

पहले जानते है क्या है ट्रिपल टेस्ट?

  1. राज्य के भीतर स्थानीय निकायों के रूप में पिछड़ेपन की प्रकृति और प्रभावों की समकालीन कठोर अनुभवजन्य जांच करने के लिए एक समर्पित आयोग की स्थापना करना.
  2. आयोग की सिफारिशों के आलोक में स्थानीय निकायवार प्रावधान किए जाने के लिए आवश्यक आरक्षण के अनुपात को निर्दिष्ट करना.
  3. किसी भी मामले में ऐसा आरक्षण अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित कुल सीटों के 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा.

अब ट्रिपल टेस्ट का क्या है उद्देश्य?
OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) को स्थानीय निकायों में आरक्षण देने के लिए यह सर्वे जरूरी था. राज्य सरकार ने ओबीसी आरक्षण के लिए समर्पित आयोग के माध्यम से जिला स्तर पर डेटा संग्रह का काम पूरा कर लिया गया, जो सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल टेस्ट मानदंडों का अनुपालन करता है. इन चुनावों में कुल 48 निकाय शामिल हैं, जिनमें 9 नगर निगम, 20 नगर परिषद और 19 नगर पंचायत हैं. साल 2020 से ही इन निकायों के चुनाव लंबित थे. उस समय कोरोना महामारी के कारण चुनाव स्थगित कर दिए गए थे. इसके बाद ओबीसी आरक्षण और ट्रिपल टेस्ट को लेकर निर्णय में देरी होती रही. अंततः हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ सकी.

क्यों है जरूरी शहरी निकाय चुनाव?
नगर निकायों के माध्यम से शहरों के विकास, स्वच्छता, पेयजल, सड़क, स्ट्रीट लाइट और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े जनप्रतिनिधियों का चुनाव किया जाएगा. शहरी विकास की दिशा तय करने में इन निकायों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है. इसके साथ ही चुनाव आयोग ने यह भी साफ किया है कि मतदान पुराने तरीके बैलेट पेपर से ही होगी. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि नगर निगम चुनाव में नोटा का विकल्प उपलब्ध नहीं रहेगा, यानी मतदाताओं को उपलब्ध उम्मीदवारों में से ही किसी एक को मतदान करना होगा. राज्य में पहली बार सभी नगर निकायों में एससी, एसटी और महिलाओं के अलावा पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की भी व्यवस्था की गई है.

झारखंड में जिन 48 शहरी निकायों में चुनाव कराए जाने हैं, उनमें 9 नगर निगम, 20 नगर परिषद और 19 नगर पंचायतें शामिल हैं. इन निकायों के अंतर्गत कुल 1087 वार्ड शामिल हैं.

उल्लेखनीय है कि झारखंड के सभी नगर निकायों में लंबे समय से चुनाव लंबित थे. इन नगर निकायों में 13 ऐसे हैं, जहां 2020 से ही चुनाव लंबित थे, जबकि रांची सहित शेष अन्य नगर निगम एवं निकायों में 2022 से चुनाव नहीं हुए थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक निकाय चुनाव टालने का कारण पहले कोरोना महामारी और बाद में ओबीसी आरक्षण तथा ट्रिपल टेस्ट से जुड़े कानूनी पेंच. अंततः हाईकोर्ट के हस्तक्षेप और समयसीमा तय होने के बाद चुनाव का रास्ता साफ हुआ.

किन निकायों में होंगे चुनाव?
रांची, धनबाद, जमशेदपुर, बोकारो और देवघर जैसे बड़े शहरों के नगर निगम चुनाव पर पूरे राज्य की खास नजर रहेगी. राज्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि चुनाव के लिए विधि-व्यवस्था और सुरक्षा बलों की पर्याप्त संख्या में तैनाती की व्यवस्था की गई है. चुनाव नियमानुसार संपन्न कराए जाएं, इसके लिए पर्यवेक्षकों की तैनाती की जाएगी.

अब आते है राजनितिक पार्टियों और उनके बीच अफरा-तफरी की तकरार पर...उससे पहले झारखंड के पॉलिटिकल परिदृश्य में थोड़ा पीछे आते हैं...
भारतीय राजनीति में झारखंड एक अनूठा राज्य है. इस राज्य ने हमेशा लोकसभा चुनाव में एक दल / गठबंधन को स्पष्ट बढ़त दी है, लेकिन राज्य ने कभी भी किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया है. अब अगर भाजपा की बात करे तो, झारखंड से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की विदाई हो चुकी है. कांग्रेस-झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का महागठबंधन 81 में से बहुमत से छह ज्यादा यानी 47 सीटें जीतकर राज्य में नई सरकार बनाई थी.

वहीं, झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन की सरकार है, लेकिन इन दिनों इस गठबंधन में दरार दिखने लगी है. राज्य में होने वाले निकाय चुनावों ने सत्तारूढ़ गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएं हुई है जिसके बाद इनके बीच तालमेल की कमी खुलकर सामने आई है. रांची सहित कई नगर निकायों में सहयोगी दलों के समर्थित उम्मीदवार आमने-सामने हैं.

निकाय चुनाव भले ही गैर दलीय आधार पर हो रहे हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने समर्थित प्रत्याशियों के पक्ष में पूरी ताकत झोंक दी है. कई जगहों पर तीनों दलों ने अलग-अलग उम्मीदवारों को समर्थन दे दिया है. इससे गठबंधन की डोर ढीली पड़ती नजर आ रही है. राजधानी रांची में मेयर और वार्ड पार्षद पदों को लेकर मुकाबला रोचक और जटिल हो गया है. गठबंधन सहयोगी दलों के समर्थित प्रत्याशी एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में हैं। इससे साझा रणनीति के अभाव की तस्वीर साफ दिख रही है. जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है. सार्वजनिक मंचों से गठबंधन की मजबूती का दावा तो किया जा रहा है, लेकिन अलग-अलग सभाएं और प्रचार अभियान हकीकत बयां कर रहे हैं. कई वार्डों में एक ही मोहल्ले में अलग घटक दलों के समर्थक समर्थन मांगते नजर आ रहे हैं.

अब गठबंधन का तालमेल जिलों में भी नहीं बन रहा 
रांची ही नहीं, बोकारो, धनबाद, हजारीबाग और गिरिडीह जैसे शहरी क्षेत्रों में भी प्रत्याशी चयन को लेकर सहमति नहीं बन सकी. स्थानीय नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों के आधार पर निर्णय लिए. इससे गठबंधन के भीतर समन्वय की कमी उजागर हुई है. निकाय चुनाव आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिहाज से अहम माने जाते हैं. ऐसे में हर दल अपने संगठन को मजबूत करने और जनाधार परखने का अवसर देख रहा है. यही कारण है कि साझा रणनीति के बजाय अलग-अलग दांव खेले जा रहे हैं.

गठबंधन की ढील का असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर दिख रहा 
गठबंधन की ढीली होती डोर का असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी दिख रहा है. कई जगहों पर कार्यकर्ता स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं मिलने की बात स्वीकार कर रहे हैं. कुछ स्थानों पर वे दो खेमों में बंटे नजर आ रहे हैं. एक मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मतदाताओं के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि राज्य स्तर पर गठबंधन कायम है तो स्थानीय स्तर पर तालमेल क्यों नहीं दिख रहा. यह स्थिति विपक्षी दलों को हमला बोलने का अवसर दे सकती है. शीर्ष नेता इसे स्थानीय स्वायत्तता का मामला बता रहे हैं, लेकिन जमीनी संकेत भविष्य की राजनीति के लिए चुनौती की ओर इशारा कर रहे हैं.

जानते है रांची नगर निगम के मेयर पद के लिए कुल कितने उम्मीदवार हैं ?
इस बार कुल 11 उम्मीदवार अपनी ताकत आजमा रहे हैं। खास बात यह है कि हेमंत सोरेन सरकार में गठबंधन में शामिल दलों, राजद और कांग्रेस ने भी अपने-अपने उम्मीदवार को मैदान में उतारा है. वहीं, एनडीए की ओर से अकेली रोशनी खलखो चुनावी मैदान में हैं. भाजपा संगठन उनकी जीत सुनिश्चित कराने के लिए पूरी तरह जुटा हुआ है.

  • झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से सुजीत आनंद विजय कुजूर के पक्ष में पार्टी का पूरा प्रचार-प्रसार चल रहा है.
  • कांग्रेस की ओर से रमा खलखो के समर्थन में मंत्री और विधायक चुनाव प्रचार में लगे हैं. 
  • राजद समर्थित प्रत्याशी सुजाता कच्छप के लिए पार्टी के कार्यकर्ता पूरी मेहनत कर रहे हैं। 

क्या इस बार नगर निकाय चुनाव मेदिनीनगर की सियासत में नया इतिहास लिख सकता है?
इधर, नगर निकाय चुनाव मेदिनीनगर की सियासत में नया इतिहास लिख सकता है. यह चुनाव कई दिग्गज नेताओं के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगा. भले ही चुनाव तकनीकी रूप से निर्दलीय हो, लेकिन भाजपा, कांग्रेस और झामुमो जैसे बड़े दलों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. शहर सरकार की इस जंग में पहली बार केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व की सीधी दखल से सियासी पारा चढ़ गया है. माहौल लोकसभा और विधानसभा चुनाव जैसा बन गया है.

इस बार 11 प्रत्याशी मैदान में, बैलेट से होगा मतदान
साल 2018 में नगर निगम गठन के बाद यह दूसरा चुनाव है. मेयर पद इस बार भी सामान्य महिला (अनारक्षित) है. वर्ष 2018 में आठ प्रत्याशी मैदान में थे, जिसमें भाजपा की अरुणा शंकर विजयी हुई थीं. इस बार 11 प्रत्याशी चुनावी रण में हैं.

झामुमो का बड़ा दांव, संगठन विस्तार पर नजर
झारखंड मुक्ति मोर्चा इस बार पूरे दमखम के साथ निकाय चुनाव में उतरा है. पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष पूनम सिंह को पार्टी में शामिल कर झामुमो ने रणनीतिक चाल चली है. झामुमो जिलाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद सिन्हा उर्फ गुड्डू सिन्हा के नेतृत्व में पूरी टीम लगातार प्रचार अभियान में सक्रिय है.

पार्टी इस चुनाव को संगठन विस्तार के अवसर के रूप में देख रही है. यदि पार्टी को सफलता मिलती है तो पलामू जिले में उसका नया आधार मजबूत हो सकता है. हालांकि अब तक झामुमो के बड़े नेता चुनाव  कैंपेन में नहीं पहुंचे हैं लेकिन कल्पना सोरेन के पलामू आने की संभावना हैं. उनके आने से झामुमो को बढ़त मिलने की उम्मीद है. 

कांग्रेस का दांव नमिता त्रिपाठी पर
कांग्रेस ने मेदिनीनगर नगर निगम में नमिता त्रिपाठी पर भरोसा जताया है. वह पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केएन त्रिपाठी की पुत्री हैं. केएन त्रिपाठी पिछले विधानसभा चुनाव में डालटनगंज सीट से एक लाख से अधिक मत प्राप्त कर दूसरे स्थान पर रहे थे. नगर निगम क्षेत्र में उन्हें अच्छी बढ़त मिली थी. 

भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर
भाजपा समर्थित प्रत्याशी अरुणा शंकर के पक्ष में प्रदेश स्तर के कई नेता मेदिनीनगर में कैंप कर रहे हैं. भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री अरुण सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेखा वर्मा और भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष शशांक राज दौरा कर चुके हैं. पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने मेदिनीनगर और चैनपुर में अरुणा शंकर के समर्थन में सभा की. उनके प्रयास से भाजपा की एक बागी प्रत्याशी मीना गुप्ता और निर्दलीय प्रत्याशी जयश्री गुप्ता ने समर्थन की घोषणा करते हुए मैदान से हटने का निर्णय लिया.

पलामू सांसद बीडी राम, पांकी विधायक डॉ. शशिभूषण मेहता, सदर विधायक आलोक चौरसिया और पूर्व मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी सहित अन्य नेता सक्रिय हैं. हालांकि तीन बागी प्रत्याशी अब भी मैदान में डटे हैं, जिससे पार्टी नेतृत्व की चिंता बनी हुई है. ऐसे में भाजपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है.

निर्दलीय चुनाव, पर दलों की सीधी टक्कर
तकनीकी रूप से यह चुनाव निर्दलीय है, लेकिन जमीनी हकीकत में भाजपा, कांग्रेस और झामुमो के बीच सीधी राजनीतिक टक्कर है. वहीं निर्दलीय प्रत्याशी रिंकू सिंह चौथा कोण बनाने में जुटी है. 23 फरवरी का फैसला न केवल शहर सरकार का मुखिया तय करेगा, बल्कि पलामू की सियासत में कई चेहरों की साख और कद भी निर्धारित करेगा.