झारखंड कांग्रेस और गठबंधन सरकार में आंतरिक खींचतान के संकेत, प्रतुल शाहदेव का आरोप- कांग्रेस की दिशा और नीयत पर गंभीर सवाल...
Ranchi: झारखंड की राजनीति में इन दिनों एक घटनाक्रम सामने आया है और वह कांग्रेस पार्टी की दशा, दिशा और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है. सत्ता में बने रहने और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को खुश करने के लिए कांग्रेस अब अपने ही समर्पित कार्यकर्ताओं की बलि लेने पर उतर आई है. यह बात बीजेपी प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने कही है.
प्रतुल शाहदेव ने कहा कि पूर्व मंत्री योगेंद्र साव शुरू से ही कांग्रेसी रहे हैं. बीजेपी उनके आंदोलन के तरीकों और कार्यशैली से सहमत नहीं रही है, लेकिन यह अत्यंत चिंताजनक है कि जिनका पूरा परिवार कांग्रेस समर्थक रहा है, उसी कांग्रेस समर्थित सरकार में उनका घर कोर्ट में मामला लंबित होने के बावजूद तोड़ दिया गया.
प्रतुल शाहदेव ने कहा कि यह केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि सरकार ने सुनना और बोलना दोनों बंद कर दिया है. पूर्व कांग्रेस विधायक अंबा प्रसाद द्वारा उठाई गई आपत्ति इस बात का प्रमाण है कि अब असंतोष कांग्रेस के भीतर से ही फूट रहा है.
बीजेपी प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने कहा कि बीजेपी तो शुरू से कहती रही है कि यह 'अबुआ नहीं, बबुआ सरकार' है, लेकिन अब कांग्रेस के अंदर के नेता भी इस सच्चाई को स्वीकार करने लगे हैं. उन्होंने कहा कि योगेंद्र साव को बिना किसी नोटिस के पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. जबकि कांग्रेस के कई नेताओं ने खुलेआम पार्टी विरोधी बयान दिए और गतिविधियों में शामिल रहे, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई.
इरफान अंसारी से लेकर केएन त्रिपाठी पर कांग्रेस ने क्यों साधी थी चुप्पी?
स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी द्वारा तत्कालीन मंत्री बन्ना गुप्ता को अनपढ़ बताया गया. वहीं, केएन त्रिपाठी जैसे नेताओं ने निकाय चुनाव से पहले ही सरकार को लेकर आपत्तिजनक बयान दिए, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व मौन बना रहा. उन्होंने कहा कि योगेंद्र साव चूंकि ओबीसी समुदाय से आते हैं और उनके साथ हुआ व्यवहार कांग्रेस की ओबीसी विरोधी मानसिकता को उजागर करता है.
ओबीसी विरोधी है कांग्रेस: बीजेपी प्रवक्ता
बीजेपी प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने पिछड़ों को शक्ति देने वाले मंडल कमीशन की रिपोर्ट को 10 वर्षों तक तक दबाए रखा. यह सब घटनाक्रम साबित करता रहा है कि कांग्रेस का चरित्र शुरू से ही ओबीसी विरोधी का रहा है.