पश्चिम बंगाल और असम में अलग राह पर JMM और कांग्रेस, क्या झारखंड की सत्ता में भी दिखेगा इसका असर?
Ranchi: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का काउंटडाउन शुरु हो चुका है. पहले चरण में 23 अप्रैल को 152 सीटों पर चुनाव होना है. पहले फेज में ही एसटी के लिए रिजर्व कुल 16 सीटों में से 15 सीटों पर वोट डाले जाने हैं.
इसी बीच झामुमो के एक स्टैंड ने झारखंड की राजनीतिक तपिश बढ़ा दी है. क्योंकि इस चुनाव में झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन की एंट्री हो गई है. दोनों 18 से 20 अप्रैल तक पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए चुनाव प्रचार करेंगे. इसका शंखनाद पुरुलिया से हो चुका है. अब सवाल है कि क्या इसका झारखंड के सियासी समीकरण पर असर पड़ेगा. क्या यह कांग्रेस के लिए झटका नहीं होगा.
झारखंड में झामुमो और कांग्रेस के बीच मतलब की दोस्ती
खास बात है कि इन सवालों पर दोनों दलों ने एक ही तरह की दलील पेश की है. झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कह चुके हैं कि कांग्रेस के साथ सिर्फ झारखंड में तालमेल है. दूसरे राज्यों में अपना फैसला लेने के लिए पार्टी स्वतंत्र है.
कांग्रेस नेता भी कह रहे हैं कि झामुमो के साथ गठबंधन सिर्फ झारखंड में है. सभी पार्टी अपना जनाधार बढ़ाने के लिए स्वतंत्र है. साथ ही कांग्रेस नेता यह भी कह रहे हैं कि पश्चिम बंगाल चुनाव में सीएम हेमंत के टीएमसी के पक्ष में प्रचार करने से झारखंड में कांग्रेस के साथ के संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
झामुमो के रुख से उठने लगे हैं कई सवाल
लिहाजा, मतलब की दोस्ती पर तरह तरह की चर्चाएं शुरु हो गई हैं. सवाल उठने लगे हैं कि झामुमो आखिर झारखंड के बाहर कांग्रेस से दूरी क्यों बना रहा है. इसकी झलक असम विधानसभा चुनाव में दिख चुकी है जब कांग्रेस से तालमेल नहीं बनने पर झामुमो ने ना सिर्फ अपने प्रत्याशी उतारे बल्कि सीएम हेमंत सोरेन कई दिनों तक असम में रहकर चुनाव प्रचार करते रहे.
झामुमो के स्टैंड पर वरिष्ठ पत्रकार बैजनाथ मिश्र का दो टूक
वरिष्ठ पत्रकार बैजनाथ मिश्र का दो टूक कहना है कि झारखंड में झामुमो और कांग्रेस के संबंधों पर असर पड़ चुका है. पिछले दिनों कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने सरकार पर सीधा हमला ऐसे ही नहीं बोला था.
उन्होंने सीधे तौर पर विधि व्यवस्था पर सवाल उठाए थे. मेरा मानना है कि झामुमो चाहता है कि हम पहल ना करें कांग्रेस पहल करे. कांग्रेस ने बिहार में झामुमो को ठेंगा दिखाया था.
अब झामुमो को मौका मिला है तो अपने तेवर दिखा रहा है. लेकिन यह भी साफ है कि कांग्रेस विवश और मजबूर है. हालांकि कांग्रेस अगर तनकर खड़ी हो जाएगी तो झामुमो को महंगा पड़ जाएगा. क्योंकि कांग्रेस के साथ अल्पसंख्यक वोट का झुकाव है.
रांची मेयर चुनाव में इसकी झलक दिख चुकी है. झामुमो प्रत्याशी फिसड्डी साबित हुए थे. वहीं अल्पसंख्यक वोट की बदौलत कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त मिली थी.
क्या कांग्रेस के खिलाफ तैयार हो रहा है नया विकल्प
रही बात असम की तो वहां झामुमो का स्टैंड बहुत हद तक सही था. कांग्रेस से अलग ताल ठोककर झामुमो ने यह जरुर बताया कि वह अब राष्ट्रीय स्तर पर ट्राइबल के बीच अपना विस्तार चाहता है. यही स्टैंड पश्चिम बंगाल में दिखता तो मतलब समझ में आता. अब चर्चा तो इस बात पर होनी चाहिए कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के खिलाफ एक नया विकल्प तैयार हो रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार का आकलन
वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार के मुताबिक झामुमो के इस स्टैंड का एक पहलू प्रेशर पॉलिटिक्स हो सकता है. झामुमो ने असम में आदिवासियों के हित का हवाला देकर ताल ठोका था. लेकिन पश्चिम बंगाल से तो रोजी-रोटी और बेटी का रिश्ता है. बंगाल में कांग्रेस का साथ ना देना समझ में आता है लेकिन टीएमसी का साथ देना समझ से परे है.
कोई भी पार्टी चुनाव लड़कर अपना विस्तार करती है ना कि किसी दूसरे पार्टी के लिए प्रचार करके. जंगल महल में आदिवासी सीटों का बोलबाला है. आप लड़ते तो उसका प्रभाव कुछ और होता. लेकिन दूसरे के लिए आपके प्रचार का क्या मतलब है. इससे लगता है कि आप या तो लाभ पहुंचाने के लिए गये हैं या पार्टनर को चिढ़ाने के लिए गये हैं.
मुस्लिम वोट बैंक में पैठ बनाने की कोशिश
वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार के मुताबिक कांग्रेस के पास झामुमो के साथ चिपके रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
सत्ता से बाहर होते ही कांग्रेस और कमजोर हो जाएगी. वहीं झामुमो के इस स्टैंड का दूसरा पहलू मुस्लिम वोट बैंक भी हो सकता है. क्योंकि बंगाल में मुस्लिम वोट का झुकाव टीएमसी के साथ है.
बंगाल के मुस्लिम का प्रभाव संथाल क्षेत्र में बहुत ज्यादा है. संभव है कि टीएमसी के पक्ष में प्रचार कर झारखंड के मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश हो. झामुमो को अगर इसमें सफलता मिल जाती है तो झारखंड में पार्टी अपने बूते सत्ता चलाने में सक्षम हो जाएगी. क्योंकि सरना वोट को झामुमो पूरी तरह साध चुका है.
क्या है बंगाल में आदिवासी सीटों का समीकरण
पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में से 16 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. इन सीटों पर जीत के लिए सत्तारूढ़ टीएमसी और विपक्षी भाजपा एड़ी चोटी का जोर लगा रही है.
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में इन सीटों पर टीएमसी और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर हुई थी. तब टीएमसी ने 16 में से 09 सीटें तो भाजपा ने 07 सीट पर जीत हासिल की थी.
पश्चिम बंगाल में एसटी वर्ग के लिए आरक्षित ये सीटें जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, अलीपुरद्वार, दक्षिण दिनाजपुर, बांकुरा, पश्चिमी मेदिनीपुर और पुरुलिया जैसे जिलों में केंद्रीत हैं. पहले चरण में 23 अप्रैल को एसटी के लिए रिजर्व 16 में से 15 सीटों के लिए चुनाव होना है.