महात्मा गाँधी का झारखंड से गहरा जुड़ाव था, यहां की परंपराओं और आदिवासियों से बहुत प्रभावित थे 

गांधी जी पहली बार 1925 में बाबानगरी देवघर का भ्रमण किया था. यहां बाबाधाम की यात्रा और लोगों से संपर्क के बाद उन्होंने अपनी पत्रिका 'यंग इंडिया' में देवघर के पंडों और यहां की परंपरा की तारीफ की थी. उन्होंने लिखा कि अन्य मंदिरों के विपरीत यहां छुआछूत नहीं माना जाता, मंदिर सबके लिए खुला है. ये बहुत ही अच्छी परंपरा है. दूसरा मौका 1934 के उनके छोटानागपुर दौरे में आया.
 
Mahatma Gandhi Jayanti Special: गांधी जी पहली बार 1925 में बाबानगरी देवघर का भ्रमण किया था. यहां बाबाधाम की यात्रा और लोगों से संपर्क के बाद उन्होंने अपनी पत्रिका 'यंग इंडिया' में देवघर के पंडों और यहां की परंपरा की तारीफ की थी. उन्होंने लिखा कि अन्य मंदिरों के विपरीत यहां छुआछूत नहीं माना जाता, मंदिर सबके लिए खुला है. ये बहुत ही अच्छी परंपरा है. दूसरा मौका 1934 के उनके छोटानागपुर दौरे में आया.

Mahatma Gandhi Jayanti Special: आज का झारखंड और पूर्व के अखंड बिहार के दक्षिण पठार के कई इलाकों में महात्मा गांधी जी का परिभ्रमण हुआ, जो आज भी झारखंड के लिए यादगार बना हुआ है. गांधी जी का यहां से गहरा जुड़ाव रहा है. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 1917 से 1940 के बीच बापू 12 बार झारखंड आए. सिर्फ यहां के शहरों में ही नहीं, कस्बों-गांवों में जाकर वे आम लोगों और आदिवासियों से मिले. झारखंड के आचरण और यहां की परंपराओं से भी वे खासा प्रभावित थे. दो मौके ऐसे भी आए जब उन्होंने खुलकर यहां के लोगों की तारीफ की.

1925 में पहली बार गांधी जी देवघर आए

गांधी जी पहली बार 1925 में बाबानगरी देवघर का भ्रमण किया था. यहां बाबाधाम की यात्रा और लोगों से संपर्क के बाद उन्होंने अपनी पत्रिका 'यंग इंडिया' में देवघर के पंडों और यहां की परंपरा की तारीफ की थी. उन्होंने लिखा कि अन्य मंदिरों के विपरीत यहां छुआछूत नहीं माना जाता, मंदिर सबके लिए खुला है. ये बहुत ही अच्छी परंपरा है. दूसरा मौका 1934 के उनके छोटानागपुर दौरे में आया.

1934 में गोमिया पधारे

28 अप्रैल, 1934 को उन्होंने गोमिया में सभा की. यहां काफी संख्या में संथाल आदिवासी भी उन्हें सुनने आए थे. संथालों की परंपरा की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा था कि मुझे आप लोगों से मिलकर बहुत खुशी हुई. आप लोग खुद सूत काटते हैं और अपने पहनने का कपड़ा खुद बुनते हैं. ये बहुत अच्छी आदत है. इन दो मौकों के अलावा भी महात्मा गांधी कई बार झारखंड आए और यहां लोगों से मिले. उनकी इन झारखंड यात्राओं पर एक विशेष रिपोर्ट के कुछ अंश हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं.

1940  की  रामगढ़ की वो अंतिम यात्रा

1940 में महात्मा गांधी अंतिम दफा रांची आए थे. तभी वे निवारण बाबू को देखने निवारणपुर गए थे. फिर यहां से 45 किलोमीटर दूर मार्च महीने में रामगढ़ में कांग्रेस के 53वें वार्षिक अधिवेशन में हिस्सा लेने गए थे. रामगढ़ का अधिवेशन गांधी जी के लिए भी काफी महत्वपूर्ण था. रामगढ़ अधिवेशन में 20 मार्च 1940 को कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध में भाग लेने के विरोध में प्रस्ताव पारित कर दिया था.

1917 में चार बार रांची आए

1917  में चंपारण आंदोलन के सिलसिले में बापू चार बार रांची आए थे. रांची में सबसे पहले गांधी जी का आगमन चंपारण आंदोलन को लेकर 4 जून 1917 को ही हुआ था. 29 मई 1917 को उन्हें एक सरकारी पत्र मिला था, जिसमें उन्हें बिहार-ओडिशा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर एडवर्ड अलबर्ट गेट से 4 जून को मिलने को कहा गया था. ऐसी आशंका जताई जा रही थी गांधी जी को नजरबंद कर लिया जाएगा. गांधीजी की पत्नी और उनके छोटे पुत्र को भी रांची बुलवा लिया गया था. 4 जून 1917 को गांधीजी की मुलाकात अलबर्ट गेट से हुई. वार्ता 3 दिन चली, 7 जून को वे पटना लौट गए.

- गांधी जी 11 जुलाई 1917 की बैठक में हिस्सा लेने रांची आए थे.

- 22 सितंबर 1917 को भी आंदोलन के सिलसिले में गांधी जी रांची आए.

- 4 अक्टूबर 1917 को भी गांधी जी रांची में थे, इसकी पुष्टि उनके लिखे पत्र से होती है, जो उन्होंने रांची में रहते हुए एडवर्ड को लिखा था.

1920 में टाना भगतों से मिले थे 

1920 में महात्मा गांधी का फिर से रांची आगमन हुआ था. तब वे रांची में भीमराज वंशीधर मोदी धर्मशाला में ठहरे थे. उस वक्त उसी धर्मशाला के बाहर लंकाशायर-मैनचेस्टर के कपड़ों की होली जलाई गई थी. उसी वक्त जनजातीय समुदाय के टाना भगत गांधी जी के प्रिय शिष्य बने थे.

1921 और 1927 में दो बार धनबाद आए 

5 फरवरी 1921 को पहली बार गांधी जी धनबाद गए, लेकिन समयाभाव के कारण कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं हो सका था फिर उन्होंने 12 जनवरी 1927 को धनबाद का दौरा किया था. 1934 में झरिया का दौरा किया था. राष्ट्रीय विश्वविद्यालय कोष के लिए झरिया में उन्हें 60 हजार रुपए मिले थे.

1925 में हजारीबाग में हो-मुंडा आदिवासियों से मिले

15 सितंबर 1925 को बापू ने चाईबासा दौरा किया था. यहां के हो आदिवासियों से गांधी जी खासा प्रभावित थे. रांची लौट रहे थे, तो खूंटी में मुंडाओं से भी बातचीत की थी. रांची से हजारीबाग गए, जहां 18 सितंबर 1925 को संत कोलंबा कॉलेज में छात्रों को संबोधित किया था. 1932 में भी वे हजारीबाग आए थे.

तीन बार की जमशेदपुर की यात्रा

1922 में टाटा प्रबंधन और मजदूरों की यूनियन के बीच हड़ताल की वजह से संबंध बिगड़ गए थे. दीनबंधु एंड्रूज के आग्रह पर गांधी जी 1925 में जमशेदपुर आए. टाटा प्रबंधन और मजदूरों के बीच समझौता कराया. 1934 में गांधी जी ने दूसरी बार और 1940 में तीसरी बार जमशेदपुर यात्रा की थी.

1925 में देवघर में पंडों की तारीफ की

1925 में गांधी जी ने देवघर की यात्रा की थी यहां मदिरा पान के खिलाफ लोगों को जागरूक किया था. उन्होंने यहां के पंडों की तारीफ की थी. उन्होंने मधुपुर का भी दौरा किया था और स्थानीय टाउन हॉल का उद्घाटन भी किया था. 7 अक्टूबर 1925 को देवघर से खड़गडीहा जाते समय गांधीजी गिरिडीह भी पहुंचे थे.

1927 में डालटनगंज में देखा मारवाड़ी पुस्तकालय

11 जनवरी 1927 को गांधीजी ने डालटनगंज की भी यात्रा की थी. यहां वे काशी से रेलगाड़ी से पहुंचे थे. यहां लोगों ने 525 रुपए एकत्र कर उन्हें दिए थे. डालटनगंज में वे मारवाड़ी सार्वजनिक पुस्तकालय भी गए थे. गांधी जी ने कतरास और झरिया का भी दौरा किया था.

1934 में देवघर में बापू की कार पर हुआ था हमला

1934 में जब गांधीजी दूसरी दफा देवघर पहुंचे, तो उनकी कार पर जसीडीह में हमला किया गया था. हमले में गांधी जी को चोट तो नहीं लगी, वे बाल-बाल बच गए थे. छोटानागपुर के इस दौरे में वे गोमिया, कतरास, झरिया समेत कई स्थानों पर गए थे.

1934 में रांची में निवारण आश्रम की नींव रखी

29 अप्रैल 1934 को भी गांधी जी रांची आए थे. 3 मई को उन्होंने हरिजन इंडस्ट्रियल स्कूल की स्थापना की और निवारण आश्रम की भी नींव रखी थी. 2-3 मई को सविनय अवज्ञा आंदोलन के बारे में रांची के नेताओं से विचार-विमर्श कर 4 मई को ओडिशा रवाना हो गए.