MMDR विरोध पर भड़के निशिकांत दुबे, हेमंत सरकार से बोले- पहले पढ़ें बिल, बिना समझे विरोध क्यों?

Deoghar:  MMDR संशोधन कानून को लेकर झारखंड में BJP और राज्य सरकार के बीच सियासी टकराव जारी है. देवघर में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून के फायदे और नुकसान को जनता के सामने स्पष्ट किया जाना चाहिए. दुबे ने कोयले की उपलब्धता और दूसरे राज्यों से आपूर्ति की संभावनाओं का भी जिक्र किया.
 

Deoghar: झारखंड में खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) यानी MMDR संशोधन कानून 2026 को लेकर सियासी टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने देवघर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्य सरकार के रुख पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार को जनता के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि संशोधित कानून से झारखंड को किस तरह और कितना नुकसान होगा।

निशिकांत दुबे ने दावा किया कि MMDR कानून को लेकर राज्य सरकार की ओर से जनता के सामने जो बातें रखी जा रही हैं, उनमें भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चुनौती देते हुए कहा कि यदि सरकार कानून के प्रावधानों को समझती है, तो इसके फायदे और नुकसान को तथ्यों के साथ सार्वजनिक करना चाहिए।

MMDR कानून पर आमने-सामने सरकार और भाजपा

MMDR संशोधन कानून को लेकर झारखंड सरकार और भाजपा के बीच लंबे समय से राजनीतिक मतभेद सामने आ रहे हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस कानून के प्रावधानों को लेकर केंद्र सरकार के समक्ष आपत्ति जताई है। राज्य सरकार का कहना है कि संशोधन से झारखंड के खनिज राजस्व और राज्य के वित्तीय अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

राज्य सरकार ने इस मुद्दे को कानूनी रूप से चुनौती देने का फैसला भी किया है। सितंबर में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने बताया था कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मंजूरी के बाद सरकार MMDR संशोधन कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है।

निशिकांत दुबे बोले- दूसरे राज्यों से लिया जा सकता है कोयला

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान निशिकांत दुबे ने कोयले की उपलब्धता को लेकर भी राज्य सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कोयला केवल झारखंड में नहीं है और देश के दूसरे राज्यों से भी इसकी आपूर्ति की जा सकती है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजार से कोयला आयात किए जाने की संभावना का भी उल्लेख किया।

दुबे पिछले कुछ दिनों से MMDR संशोधन कानून और कोयला उत्पादन से जुड़े मुद्दों पर लगातार बयान दे रहे हैं। इससे पहले भी उन्होंने राज्य सरकार पर कानून को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया था।

हेमंत सरकार का दावा- राजस्व पर पड़ सकता है असर

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्य सरकार MMDR संशोधन को झारखंड के वित्तीय हितों से जोड़कर देख रहे हैं। हेमंत सोरेन ने केंद्र को लिखे पत्र में आशंका जताई थी कि राज्यों की खनिज कराधान संबंधी शक्तियों पर असर पड़ने से झारखंड के राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

राज्य सरकार के मुताबिक, खनन से मिलने वाला राजस्व झारखंड के लिए महत्वपूर्ण है और इसका इस्तेमाल विकास तथा कल्याणकारी योजनाओं में किया जाता है।

₹1.36 लाख करोड़ के बकाये का भी मुद्दा

MMDR विवाद में झारखंड सरकार की ओर से केंद्र पर पुराने खनिज बकाये का मुद्दा भी उठाया गया है। राज्य सरकार ने करीब ₹1.36 लाख करोड़ के बकाये का दावा किया है। सरकार का कहना है कि संशोधित कानून के बाद इस दावे की कानूनी स्थिति प्रभावित हुई है और इसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है।

निशिकांत दुबे ने दी आर्थिक नाकेबंदी की चुनौती

देवघर में निशिकांत दुबे ने राज्य सरकार के उस रुख पर भी सवाल उठाया जिसमें MMDR कानून को झारखंड के आर्थिक हितों के लिए नुकसानदायक बताया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार को लगता है कि कानून से राज्य को नुकसान होगा तो उसे अपने दावे के समर्थन में स्पष्ट आर्थिक और कानूनी आंकड़े सामने रखने चाहिए।

दुबे ने तीखे अंदाज में कहा कि यदि राज्य सरकार कोयले के उत्पादन या आपूर्ति को रोकने की दिशा में कदम उठाती है तो इसके आर्थिक प्रभाव का अंदाजा उसे खुद हो जाएगा। उन्होंने राज्य सरकार को आर्थिक नाकेबंदी की चुनौती भी दी।

राजनीतिक बयानबाजी के बीच आगे बढ़ेगी कानूनी लड़ाई

MMDR संशोधन कानून अब केवल राजनीतिक बहस का मुद्दा नहीं रहा है, बल्कि राज्य सरकार ने इसे अदालत में चुनौती देने की तैयारी भी शुरू कर दी है। एक तरफ भाजपा नेता संशोधन कानून के समर्थन में इसके प्रावधानों को लेकर अपना पक्ष रख रहे हैं, वहीं झारखंड सरकार इसे राज्य के वित्तीय और संवैधानिक अधिकारों से जोड़कर विरोध कर रही है।

ऐसे में आने वाले दिनों में MMDR कानून, खनिज राजस्व, कोयला और राज्यों के अधिकार को लेकर राजनीतिक बहस के साथ-साथ कानूनी लड़ाई भी आगे बढ़ने की संभावना है।