कुपोषित बच्चों के इलाज पर सवाल, माताओं को भोजन-भत्ता नहीं मिलने का आरोप
Deoghar: झारखंड के देवघर जिले में कुपोषण से निपटने के सरकारी प्रयासों पर सवाल उठने लगे हैं. पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) की व्यवस्था, भर्ती बच्चों की देखभाल और उनके साथ रहने वाली माताओं को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर कई गंभीर मुद्दे सामने आए हैं.
बताया जा रहा है कि कुपोषित बच्चों के इलाज के दौरान उनके साथ रहने वाली माताओं को पर्याप्त भोजन, आवश्यक सुविधाएं और निर्धारित भत्ता समय पर नहीं मिल रहा है. इस कारण उपचार व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं. सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों ने व्यवस्था में सुधार की मांग की है. राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से कुपोषण -मुक्त झारखंड के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. लेकिन ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में अब भी बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं. आंकड़ों के अनुसार झारखंड में करीब 41 हजार बच्चे कुपोषण से प्रभावित हैं. वहीं देवघर जिले में भी लगभग एक हजार से अधिक बच्चों के कुपोषित होने का अनुमान है.
जिले में कुपोषण की स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन ने पांच मालन्यूट्रिशन ट्रीटमेंट सेंटर (एमटीसी) को सुदृढ़ किया है. जहां जिले भर के कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें उपचार केंद्रों में भर्ती कराने का निर्देश दिया गया है. इस मालन्यूट्रिशन ट्रीटमेंट सेंटर को लेकर जिले के उप विकास आयुक्त पीयूष सिन्हा ने बताया कि एमटीसी में गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को निर्धारित अवधि तक रखकर उपचार किया जाता है। बच्चों के साथ उनकी माताओं को भी केंद्र में रखा जाता है तथा दोनों के लिए पौष्टिक भोजन की व्यवस्था की जाती है.
उप विकास आयुक्त ने बताया कि जसीडीह, करौं, देवघर समेत जिले के पांचों एमटीसी केंद्रों को पूरी तरह अपडेट कर आवश्यक संसाधन उपलब्ध करा दिए गए हैं. हालांकि, ईटीवी भारत की पड़ताल में जसीडीह स्थित एमटीसी केंद्र की तस्वीर कुछ अलग नजर आई. केंद्र में भोजन और अन्य व्यवस्थाएं तो मौजूद थीं, लेकिन वहां एक भी मरीज दिखाई नहीं दिए. कर्मचारियों ने बताया कि कुछ बच्चे छुट्टी पर गए हुए हैं, जबकि अन्य बच्चों की माताएं भोजन के लिए बाहर गई हैं.
जब माताओं के लिए केंद्र में भोजन की व्यवस्था को लेकर सवाल किया गया, तो कर्मचारी सलिता ने बताया कि कई मरीज केंद्र का भोजन नहीं खाते, इसलिए उन्हें भोजन के लिए पैसे दे दिए जाते हैं. वहीं, जसीडीह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ॰ विश्वनाथ चौधरी ने भी स्वीकार किया कि बच्चों की माताओं के लिए भोजन उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें बाहर जाना पड़ता है.
जानकारी के अनुसार, कुपोषित बच्चों और उनकी माताओं के लिए प्रतिदिन 130 रुपये की राशि निर्धारित है. लेकिन कई लाभुकों को यह राशि महीनों से नहीं मिल पाई है. ऐसे में सवाल उठता है कि जब उच्च अधिकारियों द्वारा सभी सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा किया जा रहा है, तब जमीनी स्तर पर इन व्यवस्थाओं का लाभ लाभुकों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है.
कुपोषण जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए बनाए गए केंद्रों में अगर भोजन और अन्य मूलभूत सुविधाओं के संचालन में ही लापरवाही बरती जाएगी, तो कुपोषण-मुक्त समाज का लक्ष्य हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. अब देखना होगा कि प्रशासन इन खामियों को दूर कर कुपोषित बच्चों और उनकी माताओं तक योजनाओं का वास्तविक लाभ कब तक पहुंचा पाता है.