जननी सुरक्षा जैसी योजनाएं कागजों में मजबूत, बजट की कमी से जमीनी स्तर पर फेल, झारखंड में माताओं की जान खतरे में

Ranchi: “इस आंकड़े को और कम करना है ताकि ‘सुरक्षित मातृत्व का सुख’ हर महिला को मिल सके.” डॉ. पुष्पा ने स्पष्ट किया कि राज्य में सालाना करीब 10 लाख प्रसव होते हैं और इनमें से 500-540 मौतें अभी भी दर्ज की जा रही हैं. लक्ष्य है कि इन मौतों को न्यूनतम स्तर तक लाया जाए और अंततः शून्य के करीब पहुंचाया जाए.
 

Ranchi: झारखंड में मातृत्व मृत्यु दर (MMR) में सुधार के सरकारी दावों के बावजूद जमीनी हकीकत चिंताजनक बनी हुई है. आंकड़ों और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, झारखंड में आज भी हर साल 500 से अधिक महिलाओं की मौत गर्भावस्था या प्रसव से जुड़ी जटिलताओं के कारण हो रही है. सबसे गंभीर स्थिति यह है कि कई कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बजट समाप्त होने के कारण पात्र माताओं तक नहीं पहुंच पा रहा.

आंकड़ों में सुधार, लेकिन मौतों का सिलसिला जारी

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में संस्थागत प्रसव (अस्पताल में डिलीवरी) का प्रतिशत बढ़ा है और मातृत्व मृत्यु दर में कागजों पर गिरावट भी दर्ज की गई है. इसके बावजूद ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में हालात अब भी बेहद कमजोर हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि औसत आंकड़ों में सुधार के पीछे शहरी क्षेत्रों की स्थिति बेहतर होना एक बड़ा कारण है, जबकि दूरदराज के गांवों में हालात लगभग जस के तस हैं.

झारखंड में सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा देने और मातृ मृत्यु दर (MMR) को कम करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के स्तर पर कई कार्यक्रम और योजनाएं संचालित की जा रही हैं. इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम यह है कि राज्य का MMR अब 54 प्रति एक लाख प्रसव रह गया है, जबकि राष्ट्रीय औसत NFHS-5 और हालिया SRS आंकड़ों के अनुसार 88 प्रति एक लाख प्रसव के आसपास है. यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि झारखंड जैसे पिछड़े माने जाने वाले राज्य ने SDG लक्ष्य (2030 तक MMR 70 से नीचे) को पहले ही हासिल कर लिया है.

हालांकि, राष्ट्रीय औसत से बेहतर प्रदर्शन के बावजूद राज्य के लिए चिंता की बड़ी बात यह है कि हर वर्ष अभी भी 500 से अधिक गर्भवती महिलाएं प्रसव के दौरान अपनी जान गंवा रही हैं. पूरे राज्य में प्रतिवर्ष करीब 10 लाख महिलाएं मां बनती हैं, ऐसे में MMR के इस आंकड़े का मतलब है कि लगभग 540 महिलाओं की मौत हर साल प्रसव संबंधी जटिलताओं से हो जाती है. मां बनने के सुखद अहसास से पहले इन मौतों को रोकना राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है.

झारखंड राज्य मातृ स्वास्थ्य की स्टेट नोडल अधिकारी डॉ. पुष्पा ने बताया कि प्रसव के दौरान माताओं की मौत के आंकड़ों को कम करने में राज्य ने काफी प्रगति की है, लेकिन अभी भी हर एक लाख प्रसव में 54 मौतें हो रही हैं. उन्होंने जोर देकर कहा, “इस आंकड़े को और कम करना है ताकि ‘सुरक्षित मातृत्व का सुख’ हर महिला को मिल सके.” डॉ. पुष्पा ने स्पष्ट किया कि राज्य में सालाना करीब 10 लाख प्रसव होते हैं और इनमें से 500-540 मौतें अभी भी दर्ज की जा रही हैं. लक्ष्य है कि इन मौतों को न्यूनतम स्तर तक लाया जाए और अंततः शून्य के करीब पहुंचाया जाए.

जननी सुरक्षा योजना (JSY) में बड़े पैमाने पर लंबित भुगतान, इंतजार में लाभार्थी

संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और प्रसव के बाद माताओं को पौष्टिक आहार सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त योजना जननी सुरक्षा योजना (JSY) चलाई जा रही है. इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्र की माताओं को 1400 रुपये और शहरी क्षेत्र की माताओं को 1000 रुपये की सहायता राशि दी जाती है. यह राशि न केवल आर्थिक सहयोग प्रदान करती है बल्कि अस्पताल में प्रसव कराने के लिए प्रोत्साहन भी देती है.

लेकिन इस महत्वपूर्ण योजना के क्रियान्वयन में बड़ी खामी सामने आई है. राज्यभर में बड़ी संख्या में माताओं को JSY की राशि अभी तक नहीं मिली है. सिर्फ रांची सदर अस्पताल में पिछले वित्तीय वर्ष की 250 माताओं और चालू वित्तीय वर्ष की 635 माताओं को मिलाकर कुल 885 माताएं JSY राशि का इंतजार कर रही हैं. पूरे राज्य स्तर पर यह आंकड़ा एक लाख 13 हजार से अधिक माताओं तक पहुंच गया है.

रांची सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. बिमलेश कुमार सिंह ने बताया, “आवंटन के अभाव में हम प्रसव कराने वाली महिलाओं को JSY राशि का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं. जैसे ही फंड आवंटित होगा, सभी लाभार्थियों के खातों में राशि ट्रांसफर कर दी जाएगी.” उन्होंने आश्वासन दिया कि शीघ्र ही सभी लंबित भुगतान पूरे कर लिए जाएंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि JSY जैसी योजनाओं में भुगतान में देरी से महिलाओं का संस्थागत प्रसव के प्रति विश्वास प्रभावित हो सकता है, इसलिए इस समस्या का त्वरित समाधान जरूरी है.

राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस पर हाई रिस्क प्रेग्नेंसी मॉड्यूल का लॉन्च

11 अप्रैल को हर वर्ष राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता है. इस वर्ष रांची में यूनिसेफ, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) झारखंड और झारखंड स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त तत्वावधान में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम में हाई रिस्क प्रेग्नेंसी आइडेंटिफिकेशन, मैनेजमेंट एंड क्वालिटी एंटी नेटल केयर मॉड्यूल का शुभारंभ किया गया.

इस मौके पर राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी, NHM झारखंड के अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा, यूनिसेफ की पारुल शर्मा सहित राज्य भर के स्वास्थ्य अधिकारी और पदाधिकारी उपस्थित रहे. मॉड्यूल का उद्देश्य उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की समय पर पहचान, उनका प्रबंधन और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल (ANC) को मजबूत करना है.

किसी मां की मौत स्वीकार्य नहीं- स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी

स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा, “राज्य में प्रसव के दौरान किसी भी गर्भवती मां की मौत को हम स्वीकार नहीं करेंगे. हमारा लक्ष्य मातृ मृत्यु दर को शून्य के करीब लाना है.” उन्होंने जोर दिया कि जब मां सुरक्षित रहेगी, तभी बच्चा भी स्वस्थ होगा.

डॉ. इरफान अंसारी ने घोषणा की कि गांव और पंचायत स्तर तक स्वास्थ्य व्यवस्था को डिजिटल बनाया जाएगा. राज्य की करीब 42,000 सहिया दीदियों (आशा कार्यकर्ताओं) को एक माह के अंदर टैबलेट उपलब्ध कराए जाएंगे, जिससे वे घर-घर जाकर बेहतर ट्रैकिंग और सेवाएं दे सकें. उन्होंने कहा, “मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है. किसी भी महिला को जीवन देते समय अपना जीवन नहीं खोना चाहिए.”

स्वास्थ्य मंत्री ने किशोरियों की शिक्षा, 18 वर्ष की आयु के बाद विवाह सुनिश्चित करने और एनीमिया नियंत्रण पर विशेष जोर दिया. उन्होंने कहा कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय जैसी योजनाओं से बालिकाओं को शिक्षित और सशक्त बनाया जा रहा है. कम उम्र में विवाह और बार-बार गर्भधारण मातृ स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती हैं, इसलिए इन पर सख्ती से काम किया जा रहा है. सहिया कार्यकर्ताओं और नर्सों की सराहना करते हुए मंत्री ने कहा कि वे विषम परिस्थितियों में भी 24x7 सेवा देकर संस्थागत प्रसव को बढ़ावा दे रही हैं.

राज्यव्यापी थैलेसीमिया, सिकल सेल और एनीमिया स्क्रीनिंग अभियान

डॉ. इरफान अंसारी ने बताया कि NHM के तहत कुपोषण, सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया और सामान्य एनीमिया की रोकथाम के लिए राज्यभर में व्यापक स्क्रीनिंग अभियान चलाया जा रहा है. यूनिसेफ के सहयोग से जागरूकता, ग्राम स्तर तक पहुंच और व्यवहार परिवर्तन पर जोर दिया जा रहा है. ममता वाहन जैसी सेवाओं से गर्भवती महिलाओं को समय पर स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाया जा रहा है. सहिया कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन राशि देकर उनकी भूमिका को और मजबूत किया जा रहा है.

स्वास्थ्य सेवाओं में झारखंड तीसरे स्थान पर, लक्ष्य पहले स्थान का

स्वास्थ्य मंत्री ने गर्व के साथ कहा कि वर्तमान में झारखंड स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में देश में तीसरे स्थान पर है, लेकिन सरकार का लक्ष्य इसे पहले स्थान पर पहुंचाना है. डिजिटल सशक्तिकरण के माध्यम से सहिया दीदियों को टैबलेट देकर गांव-गांव में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित की जाएंगी.

NHM झारखंड के अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा ने कहा कि किसी भी राज्य के वास्तविक विकास का आकलन उसके बुनियादी ढांचे से नहीं, बल्कि मातृ मृत्यु दर (MMR) और शिशु मृत्यु दर (IMR) जैसे स्वास्थ्य सूचकों से किया जाता है. झारखंड की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन वैश्विक मानकों तक पहुंचने के लिए निरंतर प्रयास जरूरी हैं. कार्यक्रम के तकनीकी सत्र में डॉ. पुष्पा ने उच्च जोखिम गर्भावस्था (HRP) की समयबद्ध पहचान और प्रबंधन पर जोर दिया. लक्ष्य है MMR को सिंगल डिजिट (10 से नीचे) तक लाना, जैसा केरल जैसे राज्यों में संभव हुआ है.

यूनिसेफ की सीएफओ इंचार्ज पारुल शर्मा ने झारखंड के प्रयासों की सराहना की और कहा, “झारखंड मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक उभरता हुआ मॉडल बन रहा है. मातृत्व कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत है—इसलिए एक भी मातृ मृत्यु स्वीकार्य नहीं है.”

इस दिवस का मुख्य उद्देश्य गर्भवती महिलाओं, माताओं और परिवारों में स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा. उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान और गुणवत्तापूर्ण ANC से संबंधित मॉड्यूल लॉन्च कर इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया. NFHS-5 और हालिया SRS आंकड़ों के अनुसार झारखंड में मातृ स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव आए हैं. संस्थागत प्रसव की दर कुल प्रसव का 90% से अधिक पहुंच गई है. हालांकि, 50% से अधिक गर्भवती महिलाएं अभी भी एनीमिया से पीड़ित हैं. बाल विवाह की दर अभी भी काफी अधिक है, जो मातृ स्वास्थ्य पर सीधा नकारात्मक प्रभाव डालती है.