राज्यसभा की दूसरी सीट पर सस्पेंस, क्या दोहराएगा झारखंड 2016 का इतिहास?
Ranchi: झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है. एक सीट को लेकर तस्वीर अपेक्षाकृत साफ मानी जा रही है, लेकिन दूसरी सीट पर मुकाबला दिलचस्प होता जा रहा है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या राज्यसभा चुनाव में 2016 जैसा कोई अप्रत्याशित घटनाक्रम देखने को मिल सकता है.
राज्य की 81 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ महागठबंधन के पास 56 विधायक हैं, जबकि विपक्षी गठबंधन के पास 24 विधायक हैं. संख्या बल के आधार पर महागठबंधन मजबूत स्थिति में दिखता है, लेकिन दूसरी सीट का गणित वरीयता मतों (Preference Votes) और राजनीतिक रणनीति पर निर्भर माना जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पहली सीट पर समीकरण अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं, लेकिन दूसरी सीट पर उम्मीदवारों के चयन, वरीयता मतों और संभावित क्रॉस वोटिंग की आशंकाओं के कारण मुकाबला रोचक हो गया है. कुछ जानकारों का मानना है कि राज्यसभा चुनावों में झारखंड का इतिहास कई बार सामान्य अंकगणित को चुनौती देता रहा है.
2016 के राज्यसभा चुनाव का जिक्र भी लगातार हो रहा है, क्योंकि उस चुनाव में राजनीतिक घटनाक्रम और वोटिंग को लेकर काफी चर्चा हुई थी. इसी वजह से इस बार भी सभी दल अपने विधायकों को एकजुट रखने और किसी तरह की राजनीतिक चूक से बचने की कोशिश कर रहे हैं.
चुनाव आयोग ने झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव कार्यक्रम जारी कर दिया है. इनमें एक सीट दिवंगत शिबू सोरेन के निधन के बाद रिक्त हुई थी, जबकि दूसरी सीट भाजपा नेता दीपक प्रकाश का कार्यकाल पूरा होने के कारण खाली हो रही है। मतदान 18 जून को प्रस्तावित है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, यदि सभी वोट अपेक्षित दिशा में पड़ते हैं तो परिणाम अनुमानित हो सकते हैं, लेकिन दूसरी सीट पर उम्मीदवारों की रणनीति और वरीयता मतों का खेल चुनाव को अंतिम समय तक रोमांचक बनाए रख सकता है.
शिबू सोरेन के निधन की वजह से 4 अगस्त 2025 से एक सीट खाली है. जबकि भाजपा के दीपक प्रकाश का कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है. एक प्रत्याशी को जीत के लिए पहली प्राथमिकता के 28 वोट की दरकार है. सत्ताधारी झामुमो (34 ), कांग्रेस (16), राजद (04) और भाकपा माले (02) के पास कुल 56 विधायक हैं. इस लिहाज से एक सीट पर झामुमो की जीत तय है. आंकड़ों के लिहाज से दूसरी सीट भी इंडिया गठबंधन के खाते में जा सकती है. इसके बावजूद कांग्रेस को सहयोगी दलों से समर्थन मांगना पड़ रहा है. ऊपर से भाजपा ने प्रत्याशी देने की बात कहकर चुनाव को दिलचस्प बना दिया है.
इन सवालों ने दूसरी सीट के चुनाव को बनाया रोचक
अब सवाल है कि दूसरी सीट पर किस तरह का समीकरण देखने को मिल सकता है. क्या हो सकती है झामुमो की रणनीति. कांग्रेस प्रत्याशी के सामने कौन कौन सी चुनौतियां आ सकतीं हैं. राजद के 04 और भाकपा माले के 02 विधायकों का स्टैंड क्या हो सकता है. भाजपा आखिर किस आधार पर प्रत्याशी उतारने की बात कर रही है. क्या बाहरी-भीतरी वाला फैक्टर भी देखने को मिल सकता है. इन सवालों ने झारखंड की राजनीतिक तपिश बढ़ा दी है. क्योंकि 2016 के चुनाव में कमोबेश इसी तरह के हालात थे, जब जरुरी आंकड़ा होने के बावजूद झामुमो के बसंत सोरेन चुनाव हार गये थे.
2016 के राज्यसभा चुनाव में हुआ था खेल
तब झारखंड में रघुवर दास के नेतृत्व वाली भाजपा-एनडीए की सरकार थी. एक सीट पर भाजपा की जीत सुनिश्चित थी तो दूसरी पर झामुमो के नेतृत्व वाले विपक्ष की. फिर भाजपा ने मुख्तार अब्बास नकवी के साथ-साथ महेश पोद्दार को प्रत्याशी बनाया था. दूसरी ओर झामुमो के बसंत सोरेन विपक्ष के प्रत्याशी थे. लेकिन झामुमो के चमरा लिंडा और कांग्रेस के बिट्टू सिंह के अनुपस्थित रहने और दो विधायकों के क्रॉस वोटिंग के कारण बसंत सोरेन चुनाव हार गये थे. इस सीट का फैसला दूसरी वरीयता के वोट से हुआ था.
आंकड़ा होने के बावजूद ऐसे हारे थे बसंत सोरेन
भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी को 29 वोट मिले थे. वहीं, महेश पोद्दार को 26.66 वोट. बसंत सोरेन के पास कुल 30 वोट थे, पर उन्हें 26 वोट ही मिले. कुल 79 विधायकों ने डाले वोट थे. ऐसे में जीत के लिए उम्मीदवार को 27 मतों की जरूरत थी. झामुमो के उम्मीदवार बसंत सोरेन को प्रथम वरीयता के 26 और महेश पोद्दार को 24 मत मिले थे. नियम के तहत मुख्तार अब्बास नकवी को मिले 29 मतों में से दो मत महेश पोद्दार को स्थानांतरित हो गये. इस कारण महेश पोद्दार के वोट की संख्या 26 हो गई थी. इसके बाद दूसरी वरीयता के मतों की गणना हुई. महेश पोद्दार को दूसरी वरीयता के कुल तीन वोट मिले थे. गणना के बाद इनकी संख्या 0.66 आंकी गयी थी. इस आधार पर भाजपा के महेश पोद्दार महज 0.66 वोट के अंतर से बसंत सोरेन को हराने में सफल रहे थे.
दूसरी सीट के लिए झामुमो की रणनीति क्या हो सकती है
वैद्यनाथ मिश्र के मुताबिक दूसरी सीट पर जीत की चाबी हेमंत सोरेन के पास है. इसी वजह से कांग्रेस द्वारा कई मनुहार के बावजूद हेमंत सोरेन अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं. इसकी वजह से शक के बादल गहरे हो रहे हैं.