लेबर कोड वापस लो के नारों से गूंजा पतरातू, हजारों मजदूरों की हड़ताल, सरकार को दी बड़े आंदोलन की चेतावनी

Patratu: केंद्र सरकार के चार नए लेबर कोड के विरोध में पतरातू (झारखंड) में हजारों मजदूरों ने हड़ताल की है, जिसे [एटक (AITUC) (एनटीपीसी मजदूर यूनियन) ने पूर्ण समर्थन दिया है. यह हड़ताल 12 फरवरी 2026 की राष्ट्रव्यापी हड़ताल का हिस्सा थी, जिसमें 30 करोड़ से अधिक मज़दूरों ने काम बंद कर दिया था.
 

Patratu: पतरातू में सोमवार को लेबर कोड के विरोध में हजारों मजदूर सड़कों पर उतर आए. खनन, बिजली, औद्योगिक इकाइयों और निर्माण क्षेत्र से जुड़े मजदूरों ने एकजुट होकर कामकाज पूरी तरह ठप कर दिया. इस हड़ताल को ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) का खुला समर्थन मिला, जिससे आंदोलन को और मजबूती मिली.

क्या है मजदूरों की आपत्ति?

मजदूर संगठनों का कहना है कि नए लेबर कोड मजदूर हितों के खिलाफ हैं। इससे

  • 8 घंटे के कार्यदिवस पर खतरा,
  • ठेका प्रथा को बढ़ावा,
  • स्थायी रोजगार की सुरक्षा खत्म होने,
  • यूनियन बनाने और हड़ताल के अधिकार कमजोर होने
    का अंदेशा है.

एटक नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार श्रम कानूनों में बदलाव कर उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाना चाहती है, जबकि मजदूरों की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा दांव पर लगाई जा रही है.

मांगें पूरी नहीं हुईं तो होगा उग्र आंदोलन

एनटीपीसी मजदूर यूनियन (एटक) ने पीवीयूएनएल प्रबंधन से मजदूरों की समस्याओं का जल्द समाधान करने की मांग की है. यूनियन ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन और उग्र होगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रबंधन पर होगी. मजदूरों ने साफ कर दिया है कि वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखेंगे.

पतरातू में क्या रहा असर?

हड़ताल का असर पतरातू पावर प्लांट, कोलियरी इलाकों और औद्योगिक क्षेत्रों में साफ दिखा. कई जगहों पर मजदूरों ने गेट मीटिंग कर नारेबाजी की और जुलूस निकाला. “लेबर कोड वापस लो”, “मजदूर विरोधी कानून नहीं चलेगा” जैसे नारों से पूरा इलाका गूंज उठा. हालांकि, प्रशासन की ओर से सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे, ताकि किसी तरह की अप्रिय घटना न हो.

आगे की रणनीति

एटक और अन्य मजदूर संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने लेबर कोड वापस नहीं लिए, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा. जरूरत पड़ी तो राज्यव्यापी और देशव्यापी आंदोलन का रास्ता भी अपनाया जाएगा. मजदूर नेताओं का साफ कहना है. यह लड़ाई सिर्फ पतरातू की नहीं, बल्कि देश के करोड़ों मजदूरों के हक और भविष्य की है.