क्या है हड़गड़ी महोत्सव पूजा? उरांव जनजाति का इतिहास जुड़ा है रोहतास किला से...
Palamu: झारखंड से हजारों की संख्या में उरांव जनजाति के लोग बिहार के रोहतास किला गए हैं. उरांव जनजाति के लोग रोहतास किला में आयोजित होने वाले हड़गड़ी महोत्सव में भाग लेंगे. हड़गड़ी कोहां बेंजा एक धार्मिक समारोह है, जिसमें पूरे देशभर के उरांव जनजाति के लोग भाग लेते हैं. पूरे झारखंड से उरांव जनजाति के सदस्य पलामू के रास्ते बिहार गए हैं.
दरअसल, उरांव जनजाति का हड़गड़ी महोत्सव में रोहतास किला जाने की एक परंपरा रही है. यह महोत्सव पौष महीने में पूर्णिमा के दिन आयोजित होता है, जबकि पूरे पौष माह के दौरान उरांव जनजाति के लोग किसी भी प्रकार का शुभ कार्य नहीं करते हैं. पलामू से आदि कुडुख सरना समाज के नेतृत्व में हजारों की संख्या में लोग रोहतास किला गए हैं.
पूर्वजों को किया जाता है याद
आदि कुडुख सरना समाज के श्यामलाल उरांव ने बताया कि कोहां बेंजा हड़गड़ी यात्रा रोहतास गढ़ किला तक जाती है. यह यात्रा पुण्य की यात्रा मानी जाती है. पौष महीने के पूर्णिमा के दिन रोहतासगढ़ किला में पूर्वजों की पूजा की जाती है और उन्हें जल अर्पित जाता है. उन्होंने बताया कि ऐसी मान्यता है कि पौष के महीने में ही उरांव जनजाति के महापुरुषों और ज्ञानी पुरुषों का निधन हुआ है. उन्होंने बताया कि रोहतासगढ़ किला से ही उरांव झारखंड से लेकर असम तक और विदेशों में फैले हैं. सभी हड़गड़ी पूजा में भगाने के लिए रोहतासगढ़ किला पहुंचते हैं. इस दिन प्रतापी राजा रोहित उरांव के सपनों को पूरा करने का भी संकल्प लिया जाता है. हड़गड़ी पूजा के बाद से ही उरांव जनजाति में शादी-विवाह और अन्य शुभ कार्य शुरू होते हैं.
पलामू और आसपास की इलाके में आदि कुडुख सरना समाज इस पुण्य यात्रा का नेतृत्व कर रहा है. 10 वर्षों से समाज ने यह जिम्मेवारी उठाई है और लोगों को हड़गड़ी पूजा को लेकर जागरूक कर रही है. समाज के अध्यक्ष मिथिलेश उरांव ने बताया कि रोहतासगढ़ किला में पूर्वजों की पूजा होनी है. सभी अलग-अलग गोत्र के लोग पहुंचेंगे. अपने-अपने गोत्र का चिन्ह लगता है और सभी पूर्वजों को याद करते हुए पूजा करते हैं. समाज के सतीश उरांव ने बताया कि आदि कुडुख सरना समाज लोगों को जागरूक कर रहा है. लोग घर-घर जा रहे हैं. बड़ी संख्या में समाज के सदस्य रोहतासगढ़ किला गए हैं.