डॉ. रामदयाल मुंडा कौन थे? झारखंड आंदोलन को दी बौद्धिक दिशा, आदिवासी संस्कृति को दिलाई विश्व पहचान
Ranchi: पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा झारखंड की उन महान हस्तियों में शामिल हैं, जिन्होंने राज्य की संस्कृति, आदिवासी समाज और झारखंड आंदोलन को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिक्षाविद, आंदोलनकारी, संस्कृतिकर्मी, लेखक और विचारक के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।
झारखंड आंदोलन को बौद्धिक और वैचारिक दिशा देने में डॉ. रामदयाल मुंडा की अहम भूमिका रही। आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों पर उनका मौलिक चिंतन था। उन्होंने झारखंड की संस्कृति, आंदोलन और सामाजिक विषयों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनकी विचारधारा और जीवनशैली आज भी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
आज 23 अगस्त को उनकी जयंती के अवसर पर डॉ. रामदयाल मुंडा से जुड़ी अपनी स्मृतियों और उनसे मिली सीख को साझा करते हुए डीएसपीएमयू के सहायक प्राध्यापक डॉ. अभय सागर मिंज ने उनके व्यक्तित्व के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को याद किया।
न किसी की निंदा करते थे, न सुनते थे
डॉ. रामदयाल मुंडा के व्यक्तित्व की सबसे प्रभावशाली विशेषताओं में से एक थी उनकी निंदा से दूरी। डॉ. अभय सागर मिंज के अनुसार, उनकी वाणी से कभी किसी की निंदा नहीं निकलती थी।
यदि कोई उनके सामने किसी व्यक्ति की बुराई करना शुरू करता, तो वे बेहद शालीनता से बातचीत का रुख बदल देते थे। उनका मानना था कि दूसरों की आलोचना में समय और ऊर्जा लगाने के बजाय सकारात्मक सोच के साथ समाज और जीवन को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
अनुशासन और समय की पाबंदी के थे कायल
डॉ. रामदयाल मुंडा अपने अनुशासन और समय की पाबंदी को लेकर बेहद सख्त थे। उनके लिए समय का महत्व केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं था, बल्कि वे दूसरों से भी समय के प्रति गंभीर रहने की अपेक्षा करते थे।
एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए डॉ. अभय सागर मिंज बताते हैं कि एक बार एक पत्रकार उनसे मिलने में महज छह मिनट देर से पहुंचे। डॉ. मुंडा ने उस दिन उनसे मिलने से इनकार कर दिया और अगले दिन आने के लिए कहा।
उनका यह व्यवहार समय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। निजी जीवन में भी उन्होंने अनुशासन और समय की पाबंदी को हमेशा प्राथमिकता दी।
समाज के हर इंसान को अपना मानते थे
डॉ. रामदयाल मुंडा का मानना था कि एक संगठित और समावेशी समाज ही प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है। वे समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे।
उनके व्यक्तित्व में सभी समुदायों के प्रति सम्मान और अपनापन दिखाई देता था। उनके गीतों और विचारों में आदिवासी, मूलवासी और सदान सभी समुदायों के प्रति समान आदर और स्नेह की भावना नजर आती थी।
यही समावेशी सोच उन्हें केवल एक आंदोलनकारी या शिक्षाविद तक सीमित नहीं करती, बल्कि उन्हें समाज को जोड़ने वाले विचारक के रूप में स्थापित करती है।
नकारात्मकता से दूर रहने की देते थे सीख
जीवन के अंतिम दौर में डॉ. रामदयाल मुंडा ने एक महत्वपूर्ण जीवन-मंत्र दिया था—नकारात्मक बातों पर अपनी ऊर्जा और समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए।
उनकी सीख थी कि व्यक्ति को केवल उन्हीं विषयों की चिंता करनी चाहिए, जिन्हें वह अपने स्तर पर सुधार सकता है। जो चीजें उसके नियंत्रण से बाहर हैं, उनके बारे में लगातार चिंता करने से न तो समस्या का समाधान होता है और न ही जीवन बेहतर होता है।
उनका यह संदेश आज के दौर में भी बेहद प्रासंगिक है, जब नकारात्मकता और अनावश्यक चिंता व्यक्ति की ऊर्जा को प्रभावित करती है।
झारखंड की पहचान से जुड़ा अमर योगदान
डॉ. रामदयाल मुंडा ने शिक्षा, संस्कृति, साहित्य और सामाजिक सरोकारों के माध्यम से झारखंड की पहचान को मजबूत किया। उन्होंने आदिवासी समाज की परंपराओं, भाषाओं, लोककला और सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच पर पहुंचाने का काम किया।
झारखंड आंदोलन को वैचारिक आधार देने से लेकर आदिवासी संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने तक उनका योगदान बहुआयामी रहा। यही वजह है कि उनकी जयंती केवल एक महान व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों और जीवन-मूल्यों को आत्मसात करने का दिन भी है।
डॉ. रामदयाल मुंडा का जीवन यह संदेश देता है कि अनुशासन, सकारात्मक सोच, समावेशी दृष्टिकोण और अपनी संस्कृति के प्रति प्रतिबद्धता के जरिए समाज में स्थायी बदलाव लाया जा सकता है।