क्या खत्म हो जाएंगे क्षेत्रीय भाषा विभाग? क्लस्टर सिस्टम को लेकर बढ़ी चिंता

Ranchi: विद्यार्थियों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छात्रों और छात्राओं को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है. दूर-दराज के कॉलेजों में जाने के कारण परिवहन खर्च बढ़ रहा है और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं. कई विद्यार्थियों को मनचाहा विषय नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि संबंधित विषय की सीटें किसी दूसरे कॉलेज में स्थानांतरित कर दी गई हैं. शोधार्थियों का मानना है कि इससे मातृभाषाओं के अध्ययन और संरक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.
 

Ranchi: झारखंड के विश्वविद्यालयों में लागू किए गए क्लस्टर सिस्टम को लेकर शिक्षकों, छात्रों और भाषा विशेषज्ञों के बीच चिंता बढ़ती जा रही है. विशेष रूप से जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और भविष्य को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं. शिक्षाविदों का कहना है कि क्लस्टर सिस्टम के तहत विभिन्न कॉलेजों और विभागों के पुनर्गठन से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़े पाठ्यक्रमों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. झारखंड जैसे राज्य में, जहां संथाली, हो, मुंडारी, कुड़ुख, खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और कुरमाली जैसी भाषाएं सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, वहां इन विषयों की उपेक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है.

विशेष रूप से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा (टीआरएल) विभागों में सीटों की कटौती, विषयों के पुनर्वितरण और चांसलर पोर्टल के माध्यम से हो रहे सीट आवंटन को लेकर छात्रों, शोधार्थियों और भाषा प्रेमियों में चिंता बढ़ गई है. झारखंड टीआरएल संघ ने भी इस व्यवस्था में मौजूद विसंगतियों को लेकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपते हुए जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को क्लस्टर सिस्टम से बाहर रखने की मांग की है.

छात्रों और शोधार्थियों का कहना है कि क्लस्टर सिस्टम झारखंड की सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं है. पहले विद्यार्थी अपने नजदीकी कॉलेजों में अपनी पसंद के विषयों के साथ नामांकन ले पाते थे, लेकिन अब चांसलर पोर्टल के माध्यम से उन्हें दूसरे कॉलेजों में सीट आवंटित की जा रही है. इसका सबसे अधिक असर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा के विद्यार्थियों पर पड़ा है. कई कॉलेजों में कुरमाली, खोरठा, संताली, मुंडारी और अन्य भाषाओं की सीटें कम कर दी गई हैं, जबकि कुछ स्थानों पर इन विषयों की पढ़ाई ही सीमित कर दी गई है.

विद्यार्थियों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छात्रों और छात्राओं को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है. दूर-दराज के कॉलेजों में जाने के कारण परिवहन खर्च बढ़ रहा है और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं. कई विद्यार्थियों को मनचाहा विषय नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि संबंधित विषय की सीटें किसी दूसरे कॉलेज में स्थानांतरित कर दी गई हैं. शोधार्थियों का मानना है कि इससे मातृभाषाओं के अध्ययन और संरक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

आरयू की कुलपति ने बताया क्लस्टर सिस्टम का उद्देश्य

हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन इस व्यवस्था को नई शिक्षा नीति का हिस्सा बताते हुए इसका समर्थन कर रहा है. रांची विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. सरोज शर्मा का कहना है कि क्लस्टर सिस्टम का उद्देश्य उपलब्ध शिक्षकों और संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है. उनके अनुसार जिन कॉलेजों में विद्यार्थियों और शिक्षकों का अनुपात संतुलित है, वहां विषयों और सीटों का आवंटन किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था किसी विसंगति को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि उसे दूर करने के लिए लागू की गई है. साथ ही उन्होंने स्वीकार किया कि विद्यार्थियों को जो व्यावहारिक समस्याएं आ रही हैं, उन पर विश्वविद्यालय गंभीरता से विचार कर रहा है.

भाषा संरक्षण से जुड़े कुरमाली भाषा के विद्वान राजाराम महतो का मानना है कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के मामले में पूर्व व्यवस्था को बनाए रखना अधिक उपयुक्त होगा. उनका कहना है कि भाषा संरक्षण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की सहज पहुंच और पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता से संभव है. उन्होंने विश्वविद्यालयों में नियमित प्रोफेसरों और शिक्षकों की नियुक्ति पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान में शिक्षकों की भारी कमी भी कई समस्याओं की जड़ है.

क्या है क्लस्टर सिस्टम

दरअसल, क्लस्टर सिस्टम के तहत आसपास के कई कॉलेजों को एक समूह में जोड़ दिया जाता है और विषयों का बंटवारा किया जाता है. इसका उद्देश्य संसाधनों का बेहतर उपयोग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है, लेकिन झारखंड में इसके क्रियान्वयन को लेकर उठ रहे सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं जैसे संवेदनशील विषयों में स्थानीय जरूरतों और सांस्कृतिक सरोकारों को ध्यान में रखते हुए संतुलित समाधान तलाशना आवश्यक होगा. फिलहाल यह मुद्दा शिक्षा जगत में बहस का विषय बना हुआ है और आने वाले समय में इस पर व्यापक चर्चा की संभावना है.