कानपुर से प्रयागराज के बीच मिली 200 किमी लंबी प्राचीन नदी, अब इसी रास्ते भूजल बचाने की तैयारी

 

 

 

UP News: उत्तर प्रदेश में भूजल संरक्षण को लेकर एक नई वैज्ञानिक परियोजना शुरू की गई है। गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में 1.65 करोड़ रुपये की प्रबंधित जलभृत पुनर्भरण (MAR) परियोजना के तहत बारिश के पानी को जमीन के नीचे मौजूद जलभृतों तक पहुंचाकर भूजल स्तर बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।

इस परियोजना की खास बात यह है कि कानपुर से प्रयागराज के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबी भूमिगत प्राचीन नदी प्रणाली यानी पैलियोचैनल की पहचान की गई है। वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, जमीन के नीचे मौजूद ये पुराने नदी मार्ग आज भी भूजल के प्रवाह में भूमिका निभा सकते हैं।

आधुनिक तकनीक से जमीन के नीचे खोजी गई नदी प्रणाली

भूगर्भ जल विभाग के निदेशक एवं नमामि गंगे और ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के विशेष सचिव डॉ. राजेश कुमार प्रजापति के मुताबिक, सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई), हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने गंगा-यमुना दोआब में जलभृतों और प्राचीन नदी प्रणालियों का अध्ययन किया।

इस अध्ययन के लिए हवाई भू-भौतिकीय सर्वेक्षण और बोरहोल लॉगिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। इसी प्रक्रिया के दौरान प्रयागराज से कानपुर के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबी पैलियोचैनल प्रणाली की पहचान हुई।

सरल शब्दों में समझें तो यह जमीन के नीचे मौजूद उस पुराने नदी मार्ग की पहचान है, जो हजारों साल पहले नदी के बहाव का हिस्सा रहा होगा और अब भी भूमिगत जल की आवाजाही में उपयोगी हो सकता है।

बारिश का पानी सीधे जलभृतों तक पहुंचाने की योजना

MAR परियोजना का मुख्य उद्देश्य बारिश के पानी को बहकर बर्बाद होने से रोकना और उसे जमीन के अंदर मौजूद जलभृतों तक पहुंचाना है। जलभृत जमीन के नीचे मौजूद ऐसी प्राकृतिक परतें होती हैं, जिनमें पानी जमा रहता है और जिनसे कुओं तथा नलकूपों के जरिए भूजल प्राप्त किया जाता है।

वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि बारिश का पानी जमीन के अंदर किन रास्तों से आसानी से पहुंच सकता है। इसी जानकारी के आधार पर भूजल पुनर्भरण के लिए उपयुक्त स्थानों का चयन किया जाएगा।

छह जगहों पर शुरू होगा पायलट प्रोजेक्ट

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के वित्तीय सहयोग से भूगर्भ जल विभाग, उत्तर प्रदेश इस परियोजना को लागू कर रहा है। परियोजना की अवधि तीन साल रखी गई है और इसके लिए 1.65 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है।

पहले चरण में छह स्थानों को पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया है। इन जगहों पर भूजल पुनर्भरण से जुड़ी संरचनाएं बनाई जाएंगी। बारिश के पानी को इन संरचनाओं के जरिए जमीन के भीतर पहुंचाने के बाद भूजल स्तर में होने वाले बदलाव की लगातार निगरानी की जाएगी।

छह स्थानों के नतीजों के बाद बढ़ेगा दायरा

पायलट प्रोजेक्ट के दौरान यह देखा जाएगा कि अलग-अलग स्थानों पर बनाई गई पुनर्भरण संरचनाओं का भूजल स्तर पर कितना असर पड़ता है। साथ ही यह भी अध्ययन किया जाएगा कि स्थानीय जलभृत बारिश के पानी को कितनी प्रभावी तरीके से ग्रहण कर रहे हैं।

इन परीक्षणों से मिलने वाले परिणामों के आधार पर भविष्य में गंगा-यमुना दोआब के दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसी परियोजनाओं का विस्तार किया जा सकता है।

गंगा-यमुना और भूमिगत जल के रिश्ते पर भी नजर

एनजीआरआई के अध्ययन में गंगा और यमुना नदियों तथा जमीन के नीचे मौजूद प्रमुख जलभृतों के बीच हाइड्रोजियोलॉजिकल संबंध के संकेत मिलने की बात कही गई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, प्राचीन नदी मार्ग भी भूमिगत जल के प्रवाह के महत्वपूर्ण रास्ते हो सकते हैं। ऐसे में परियोजना के दौरान नदी, बारिश के पानी, भूजल और इन पुराने नदी मार्गों के बीच संबंध को समझने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

वैज्ञानिक निगरानी के साथ जागरूकता पर भी जोर

नमामि गंगे के अतिरिक्त परियोजना निदेशक प्रभाष कुमार के अनुसार, परियोजना में एनजीआरआई के तकनीकी सहयोग से भूजल की निगरानी और शोध किया जाएगा। पुनर्भरण संरचनाओं से कितना फायदा हो रहा है, इसका भी वैज्ञानिक तरीके से आकलन किया जाएगा।

इसके साथ ही लोगों को भूजल बचाने और उसके बेहतर इस्तेमाल के प्रति जागरूक करने के लिए सूचना, शिक्षा एवं संचार (IEC) गतिविधियां भी चलाई जाएंगी। इससे परियोजना को केवल संरचनाएं बनाने तक सीमित रखने के बजाय भूजल संरक्षण को लेकर स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की योजना है।