SIR पर अखिलेश यादव का बड़ा आरोप: वोटर लिस्ट से नाम हटाने की साजिश, फॉर्म-7 के दुरुपयोग का दावा

 
National News: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में चल रही SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान फॉर्म-7 का गलत इस्तेमाल कर बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं।

अखिलेश यादव का कहना है कि गांवों और शहरों में फर्जी आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं। जाली हस्ताक्षरों के जरिए खासतौर पर PDA समाज (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई मामलों में मतदाताओं को बिना किसी सूचना के उनके नाम पर आपत्ति लगा दी जाती है और उन्हें इसकी जानकारी तब मिलती है, जब उनका नाम सूची से गायब हो जाता है।


‘यह लोकतंत्र पर हमला है’

सपा अध्यक्ष ने इस पूरे मामले को “महाघोटाला” करार देते हुए कहा कि यह सीधे तौर पर लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश है। उन्होंने न्यायालय, निर्वाचन आयोग और मीडिया से इस मुद्दे में हस्तक्षेप करने की अपील की है। अखिलेश यादव ने मांग की है कि SIR के तहत दर्ज की जा रही आपत्तियों की निष्पक्ष जांच हो और फर्जी आवेदन देने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही किसी भी मतदाता का नाम बिना ठोस सबूत और उचित सुनवाई के नहीं हटाया जाए।

क्या है SIR और फॉर्म-7?

दरअसल, SIR प्रक्रिया चुनाव से पहले मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए की जाती है। इसका मकसद फर्जी या दोहरे नाम हटाना, मृत मतदाताओं और स्थानांतरित लोगों के रिकॉर्ड को अपडेट करना होता है। इस दौरान बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर सत्यापन करते हैं। वहीं फॉर्म-7 का इस्तेमाल किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए दावा या आपत्ति दर्ज कराने में किया जाता है।

आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

जानकारी के मुताबिक, राज्य में SIR प्रक्रिया के तहत अब तक करीब 2.89 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। इनमें सबसे ज्यादा नाम लखनऊ और गाजियाबाद से कटे हैं। अकेले लखनऊ में लगभग 30 प्रतिशत नाम हटाए जाने का दावा किया जा रहा है।

ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर दावा और आपत्ति दर्ज कराने की अंतिम तारीख 6 फरवरी तय की गई है, जबकि अंतिम मतदाता सूची 6 मार्च को जारी की जाएगी।

अखिलेश यादव ने कहा कि यदि समय रहते इस प्रक्रिया पर रोक नहीं लगी और पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की गई, तो इससे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।