बंगाल 2026 की रणभूमि: ममता की मज़बूत पकड़, भाजपा की साख और भरोसे की सबसे कठिन परीक्षा
Patna Desk: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 अब सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं रह गया है। यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए संगठनात्मक भरोसे, राजनीतिक विश्वसनीयता और भविष्य की दिशा तय करने वाली लड़ाई बन चुका है। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपनी जमीनी मज़बूती के साथ एक बार फिर मुकाबले के लिए तैयार हैं।
भाजपा के सामने 2026 में दो टूक सवाल
भाजपा के पास अब दो ही विकल्प बचे हैं-
या तो 2021 की गलतियों को खुले दिल से स्वीकार कर रणनीति में बुनियादी बदलाव करे, या फिर केंद्रीय चेहरों और दिल्ली-केंद्रित रणनीति के सहारे एक और अधूरा प्रयास करे।
बंगाल बार-बार यह साबित कर चुका है कि यह राज्य सिर्फ नारों, रैलियों और बाहरी आक्रामक राजनीति से नहीं जीता जा सकता।
ममता बनर्जी की जीत का फॉर्मूला क्यों काम करता है?
ममता बनर्जी की लगातार चुनावी सफलता के पीछे कुछ ठोस वजहें हैं-
• स्थानीय जुड़ाव और भाषा की राजनीति
ममता बंगाली अस्मिता, भाषा और भावनाओं से सीधे संवाद करती हैं।
• योजनाओं का सीधा लाभ
कन्याश्री, लक्ष्मी भंडार, स्वास्थ्य साथी जैसी योजनाओं ने महिलाओं और गरीब तबके में गहरी पकड़ बनाई है।
• कैडर आधारित संगठन
TMC का बूथ लेवल नेटवर्क आज भी भाजपा से कहीं ज़्यादा मज़बूत और सक्रिय है।
• ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ नैरेटिव
भाजपा को बाहरी पार्टी के रूप में पेश करने में TMC अब तक सफल रही है।
2021: जब ओवरकॉन्फिडेंस भारी पड़ा
2019 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को भाजपा ने 2021 में आत्मविश्वास नहीं, बल्कि ओवरकॉन्फिडेंस में बदल दिया। उसकी कीमत पार्टी को भारी नुकसान के रूप में चुकानी पड़ी।
मुख्य चूकें रहीं-
• केंद्रीय चेहरों पर अत्यधिक निर्भरता
• स्थानीय नेतृत्व को दरकिनार करना
• टिकट वितरण में असंतोष
• चुनाव के बाद कार्यकर्ताओं को असुरक्षित छोड़ देना
प्रभारी राजनीति और संगठन की कमजोर कड़ी
बंगाल में संगठन विस्तार जरूर हुआ, लेकिन स्थानीय संस्कृति और संवेदनशीलता को समझने में कमी रही। चुनाव बाद कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और मनोबल बनाए रखने की ठोस रणनीति नहीं दिखी।
नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे भाजपा का ग्राफ नीचे खिसकता चला गया।
चुनाव बाद ‘किनारा’ करना बनी सबसे बड़ी भूल
2021 के बाद भाजपा का बंगाल से संगठनात्मक दूरी बनाना:
• कार्यकर्ताओं में भय और निराशा
• मतदाताओं में भरोसे की कमी
• TMC को खुला मैदान
राजनीति में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी होती है, और बंगाल में भाजपा यही गंवा बैठी।
2026 की असली कुंजी: भरोसा
भाजपा को अब यह साफ संदेश देना होगा कि:
• 2021 की गलतियाँ नहीं दोहराई जाएँगी
• कार्यकर्ताओं को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा
• नेतृत्व सिर्फ दिल्ली से नहीं, कोलकाता से भी दिखेगा
फ्रीबीज़ पर सियासत से आगे सोचने की ज़रूरत
बंगाल ही नहीं, देश के कई राज्य आज किसी न किसी रूप में कल्याणकारी योजनाओं पर टिके हैं।जनता का पैसा अगर जनता तक पहुँच रहा है और भ्रष्टाचार में नहीं जा रहा, तो यह सवाल सिर्फ नकार का नहीं रह जाता। केवल फ्रीबीज़ विरोध के सहारे बंगाल जीतना आसान नहीं होगा-यह हकीकत भाजपा को स्वीकार करनी होगी।
बंगाल जीत: भाजपा के लिए क्यों मील का पत्थर?
अगर भाजपा बंगाल में सत्ता तक पहुँचती है, तो:
• राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव आएगा
• क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व को सीधी चुनौती मिलेगी
• 2029 की राह कहीं आसान होगी
लेकिन इसके लिए रणनीति दिल्ली की तराजू पर नहीं, बंगाल की ज़मीन पर तौलनी होगी।
अंतिम सवाल
क्या 2026 का बंगाल चुनाव- दिल्ली के पावर ग्रुप्स के समीकरण से लड़ा जाएगा? या फिर स्थानीय नेतृत्व, स्थानीय समझ और स्थानीय भरोसे को प्राथमिकता मिलेगी?
इस सवाल का जवाब ही तय करेगा-
बंगाल किस करवट बैठेगा।
संवाददाता: अमित कुमार अग्रवाल