कोलकाता में जन्माष्टमी उत्सव को लेकर बड़ा फैसला, कमेटी में अब केवल हिंदू सदस्य..60 साल से चल रही थी ये परंपरा...
Kolkata Janmashtami News: कोलकाता के मोमिनपुर और खिदिरपुर इलाके में जन्माष्टमी का आयोजन लंबे समय से शहर की गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल माना जाता रहा है। यहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर इस त्योहार के आयोजन में भाग लेते रहे हैं। हालांकि, इस साल आयोजन को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है। भाजपा नेता और पोर्ट विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके राकेश सिंह ने आयोजन की कमान संभालते हुए घोषणा की है कि इस बार आयोजन समिति में केवल हिंदू सदस्यों को शामिल किया जाएगा।
60 साल पुरानी परंपरा में बदलाव
जन्माष्टमी का यह आयोजन कोलकाता नगर निगम के वार्ड-79 में भू-कैलाश रोड और हुसैन शाह रोड चौराहे पर होता है। यह इलाका पोर्ट विधानसभा क्षेत्र में आता है।
बताया जाता है कि यहां करीब छह दशक से हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर जन्माष्टमी उत्सव आयोजित करते रहे हैं। इस बार समिति के स्वरूप में बदलाव किए जाने के बाद यह पुरानी परंपरा समाप्त होती नजर आ रही है।
राकेश सिंह का कहना है कि जन्माष्टमी हिंदुओं का धार्मिक त्योहार है और इसकी धार्मिक परंपराओं की रक्षा करना हिंदू समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि दूसरे धर्मों के लोग उत्सव में शामिल हो सकते हैं, लेकिन आयोजन समिति में उनकी भागीदारी नहीं होगी।
'इस बार समिति पूरी तरह हिंदुओं की होगी'
आयोजन समिति में बदलाव को लेकर राकेश सिंह ने दावा किया कि पिछले वर्षों में समिति में मुस्लिम सदस्यों की संख्या काफी अधिक थी। उनके मुताबिक, 18 सदस्यीय समिति में 16 मुस्लिम सदस्य थे।
उन्होंने कहा कि इस बार समिति का पुनर्गठन किया गया है और इसे पूरी तरह हिंदू सदस्यों की समिति बनाया गया है। उनके अनुसार, इसका उद्देश्य जन्माष्टमी के धार्मिक स्वरूप और परंपराओं को बनाए रखना है।
राकेश सिंह ने आपसी सद्भाव में विश्वास की बात कहते हुए यह भी कहा कि धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
मुस्लिम समुदाय की भागीदारी पर उठाए सवाल
भाजपा नेता ने जन्माष्टमी से जुड़े कुछ धार्मिक अनुष्ठानों में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने भगवान कृष्ण के साथ गाय की पूजा से जुड़े रीति-रिवाजों का उल्लेख करते हुए मुस्लिम समुदाय की भागीदारी पर आपत्ति जताई।
हालांकि, ये राकेश सिंह के व्यक्तिगत राजनीतिक और धार्मिक तर्क हैं। आयोजन में मुस्लिम समुदाय की वर्षों पुरानी भागीदारी को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग राय सामने आ रही है।
ममता बनर्जी के 'त्योहार सबके' बयान पर भी निशाना
राकेश सिंह ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के उस कथन की भी आलोचना की, जिसमें वह अक्सर कहती रही हैं कि धर्म व्यक्तिगत विषय है, जबकि त्योहार सभी के होते हैं।
भाजपा नेता ने इस विचार को खारिज करते हुए कहा कि धार्मिक त्योहारों के आयोजन और उनकी परंपराओं की रक्षा का अधिकार संबंधित समुदाय के पास होना चाहिए।
फिरहाद हकीम पर भी लगाए आरोप
राकेश सिंह ने इस आयोजन के पुराने स्वरूप को लेकर तृणमूल कांग्रेस नेता और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम पर भी आरोप लगाए। उनका दावा है कि आयोजन के प्रबंधन में मुस्लिम समुदाय को महत्वपूर्ण भूमिका देकर उत्सव के हिंदू स्वरूप को कमजोर करने की कोशिश की गई।
हालांकि, इस संबंध में राकेश सिंह द्वारा लगाए गए आरोपों पर फिरहाद हकीम की प्रतिक्रिया इस जानकारी में उपलब्ध नहीं है।
करीब 60 साल पहले मुस्लिम समाजसेवी ने शुरू किया था आयोजन
जन्माष्टमी के इस आयोजन के इतिहास को लेकर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसकी शुरुआत करीब 60 साल पहले मुस्लिम समाजसेवी मोहम्मद काशिम ने खिदिरपुर समाज कल्याण समिति के बैनर तले की थी।
समय के साथ उत्सव का महत्व कम होने लगा। इसके बाद वर्ष 2011 में मुस्लिम युवाओं के एक समूह ने आयोजन को दोबारा सक्रिय करने में मदद की। इसके बाद कई वर्षों तक हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर जन्माष्टमी उत्सव में भाग लेते रहे।
'रीति-रिवाजों से कभी समझौता नहीं हुआ'
आयोजन समिति के पूर्व सदस्य और तृणमूल कांग्रेस पदाधिकारी मोहम्मद आलम ने समिति से मुस्लिम सदस्यों को बाहर किए जाने पर आपत्ति जताई है।
आलम का कहना है कि मुस्लिम समुदाय की भागीदारी को कभी भी पूजा के हिंदू स्वरूप के खिलाफ नहीं माना गया। उनके मुताबिक, सभी लोग मिलकर आयोजन करते थे, धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाता था और प्रसाद भी बांटा जाता था।
उन्होंने कहा कि इतने वर्षों तक हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग साथ मिलकर जन्माष्टमी मनाते रहे हैं, लेकिन इस बार आयोजन समिति में किसी भी मुस्लिम सदस्य को शामिल नहीं किया गया है।
अब नए स्वरूप में होगा जन्माष्टमी उत्सव
कोलकाता के इस आयोजन में समिति की संरचना में आया बदलाव अब चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर आयोजक इसे हिंदू धार्मिक परंपराओं की सुरक्षा से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पुराने आयोजकों और मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों का कहना है कि दशकों से दोनों समुदाय मिलकर इस धार्मिक उत्सव को आयोजित करते रहे हैं।
ऐसे में इस साल जन्माष्टमी उत्सव न केवल धार्मिक आयोजन, बल्कि पुरानी सामाजिक परंपरा में आए बदलाव के कारण भी चर्चा में है।