Bengal Election: 294 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का कांग्रेस का ये फैसला कितना सही और क्यों?
Role of Congress in Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव अप्रैल-मई में होने वाले हैं. लेकिन, अभी से ही संकेत मिलने लगे हैं कि बंगाल की लड़ाई भी लगभग दिल्ली और बिहार जैसी ही हो सकती है - बंगाल में भी कांग्रेस करीब करीब उसी भूमिका में नजर आ सकती है, जैसा कांग्रेस का रवैया दिल्ली और बिहार में देखा जा चुका है.
इधर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो पहले से ही तृणमूल कांग्रेस के पश्चिम बंगाल चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर रखा है. अब तो कांग्रेस ने भी पश्चिम बंगाल की सभी 294 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है - ऐसी सूरत में बंगाल के चुनाव नतीजे दिल्ली और बिहार से कितने अलग होंगे, देखना महत्वपूर्ण होगा.
ये तो अब पूरी तरह साफ हो गया है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को चुनावी लड़ाई सिर्फ बीजेपी के खिलाफ नहीं लड़ना है. 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी बहुत ज्यादा सीटें तो नहीं जीत पाई थी, लेकिन मुख्य विपक्षी दल तो बन ही गई. कांग्रेस का तो खाता भी नहीं खुल पाया था.
कुछ दिनों पहले ममता बनर्जी से दिल्ली में जब कांग्रेस के बारे पूछा गया तो उनका जवाब था कि उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी. कांग्रेस के साथ किसी भी तरह के चुनावी गठबंधन की संभावना को नकारते हुए ममता बनर्जी पहले भी कह चुकी हैं, तृणमूल कांग्रेस की रणनीति साफ है, जबकि बाकी पार्टियां टीएमसी के खिलाफ लड़ने की रणनीति बनाती हैं.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर अब कांग्रेस का रुख भी सामने आ गया है. कांग्रेस का कहना है, प्रदेश संगठन और कार्यकर्ताओं की लंबे समय से मांग रही है कि पार्टी राज्य में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के साथ चुनावी मैदान मैदान में उतरे. पश्चिम बंगाल कांग्रेस ने आलाकमान के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा है कि केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल कांग्रेस की भावनाओं का सम्मान किया और अकेले चुनाव लड़ने के फैसले को मंजूरी दी.
बंगाल चुनाव में कांग्रेस की भूमिका क्या होगी
2025 के शुरू में दिल्ली विधानसभा चुनाव और आखिर में बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. पश्चिम बंगाल के 2021 के चुनाव में तो राहुल गांधी की भूमिका रस्मअदायगी जैसी थी. राहुल गांधी एक दिन के लिए पश्चिम बंगाल में कैंपेन करने गए थे, और कोविड के कारण आगे के कार्यक्रम रद्द कर दिए गए थे. 2025 के पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस की भूमिका का अंदाजा कैसे लगाया जाए? क्या राहुल गांधी दिल्ली और बिहार की तरह बंगाल में भी कांग्रेस को चुनाव लड़ाने वाले हैं या 2021 की ही तरह रस्मअदायगी निभाने की तैयारी है?
दिल्ली में हुई कांग्रेस की मीटिंग में ममता बनर्जी के सबसे बड़े विरोधी अधीर रंजन चौधरी भी शामिल थे, जो 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद से हाशिये पर भेजे जा चुके हैं. और, ये भी ममता बनर्जी के फेवर में ही जाता है.2024 के चुनाव से पहले ही ममता बनर्जी ने घोषणा कर डाली थी कि वो अकेले चुनाव लड़ेंगी. पहले तो सुनने में आया था कि वो कांग्रेस को दो सीटें गठबंधन के तहत देने के तैयार भी थीं, लेकिन बाद में मना कर दिया. और, भारत जोड़ो न्याय यात्रा के साथ राहुल गांधी के पश्चिम बंगाल में प्रवेश की पूर्व संध्या पर ही 'एकला चलो रे' घोषणा कर दी थी. फिर कांग्रेस नेतृत्व की तरफ से ममता बनर्जी के प्रति बयानों में सम्मान के भाव ही प्रकट किए जा रहे थे.
दिल्ली और बिहार चुनावों में राहुल गांधी के तेवर को देखें तो अंदाज बिल्कुल अलग था. दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल के खिलाफ राहुल गांधी उतने ही आक्रामक नजर आते थे, जितना बीजेपी के नेता. शीशमहल से लेकर दिल्ली शराब घोटाले तक, राहुल गांधी ने एक एक मामला गिनाकर अरविंद केजरीवाल को कठघरे में खड़ा कर दिया था.
ये भी था कि अरविंद केजरीवाल का भी कांग्रेस के प्रति ममता बनर्जी जैसा ही रवैया था. ममता बनर्जी ने तो विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक में रहते हुए भी अरविंद केजरीवाल का समर्थन किया था. मतलब, कांग्रेस के खिलाफ. जैसे समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने चुनाव कैंपेन भी किया था. बिहार चुनाव राहुल गांधी दिल्ली की तरह तो नहीं लड़ रहे थे, लेकिन कोई कमी भी नहीं छोड़ी थी. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के साथ वोटर अधिकार यात्रा करते हुए उनको मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं बताया. तेजस्वी यादव के बड़े भाई और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बता देने के बाद भी. बाद में जो हुआ, न होता तो भी नतीजे शायद ही अलग होते.
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव (जो 7 मई 2026 से पहले होने हैं) के लिए Indian National Congress (कांग्रेस) की भूमिका इस बार कुछ हद तक अलग और चुनौतीपूर्ण दिख रही है. इस चुनाव में कांग्रेस के लिए मुख्य सियासी परिदृश्य कुछ इस प्रकार है:
1. कांग्रेस स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ रही है
कांग्रेस पार्टी अब किसी बड़े गठबंधन (जैसे लेफ्ट/आईएनडीआईए समूह) के साथ मत लेकर नहीं बल्कि पूरे 294 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. पार्टी का मानना है कि पिछले गठबंधनों से उसकी अपनी संगठनात्मक ताकत कमजोर हुई है, इसलिए इस बार वह स्वतंत्र रूप से चुनावी मैदान में उतरेगी.
2. पार्टी की स्थिति (राजनीति और ताकत)
बंगाल में कांग्रेस 1977 के बाद से सत्ता में नहीं है और पिछले चुनावों में उसकी स्थिति बहुत मजबूत नहीं रही — उसका प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है.
पार्टी के पास विधानसभा में वर्तमान में कोई विधायक नहीं है, जिसका अर्थ है कि उसकी जमीन पर आधार बहुत कम है.
3. कांग्रेस की रणनीति और लक्ष्य
इस बार कांग्रेस मुख्य रूप से एमआईएम, AAP, CPI(M) जैसे अन्य विपक्षी दलों के साथ गठबंधन न बनाकर अकेली ही मुकाबला कर रही है-ताकि पार्टी अपनी पहचान को मजबूत कर सके.
पार्टी की कोशिश रहेगी कि वह बीजेपी और टीएमसी में विभाजित वोट को लाभ में बदलकर कुछ सीटें हासिल करे, खासकर जहाँ कांग्रेस की परंपरागत वोटर पहचान अब भी उपलब्ध है. हालांकि यह आसान काम नहीं होगा.
4. कांग्रेस के सामने मुख्य चुनौतियाँ
स्थानीय पहचान और नेतृत्व: बंगाल जैसे राज्य में कांग्रेस की स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ता नेटवर्क कमजोर है, जिससे उसे मुख्यमंत्री पद का चेहरा या मजबूत संदेश देना मुश्किल हो रहा है.
टिकाऊ वोट शेयर: पिछले चुनावों में कांग्रेस का वोट शेयर गिरा है और वह मुख्य मुकाबले में बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच फंसी हुई दिखती है.
टिकट वितरण और उम्मीदवार चयन: पार्टी को हर 294 सीट पर उम्मीदवार खड़ा करना है, जिससे उसे संसाधन और मजबूत प्रचार की जरूरत पड़ेगी.
5. संभावित राजनीतिक प्रभाव
अगर कांग्रेस अच्छे वोट शेयर के साथ कुछ सीटें भी जीत लेती है, तो यह भाजपा और All India Trinamool Congress (टीएमसी) के बीच मुकाबले को और रोचक बना सकती है और वोट विभाजन का लाभ उठा सकती है.
लेकिन व्यापक रूप से देखा जाए तो फिलहाल कांग्रेस का मुकाबला जीत के लिए मुख्य रूप से प्रतिस्पर्धी दलों के वोट विभाजन से अपनी स्थिति मजबूत करना होगा, न कि सीधे सत्ता में शामिल होना.
कांग्रेस इस बार बंगाल में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ते हुए राजनीतिक पहचान, वोट विभाजन और संगठनात्मक मजबूती को अपने लिए बड़ा लक्ष्य बना रही है. लेकिन उसकी भूमिका अभी भी सीमित दिखती है क्योंकि वह सीधे सत्ता की दौड़ में मुख्य प्रतिस्पर्धी (टीएमसी या बीजेपी) नहीं है, बल्कि तीसरे मोर्चे पर प्रभाव बनाने का प्रयास कर रही है.