भीषण गर्मी और हीटवेव से 110 करोड़ बच्चों की सेहत पर खतरा, यूपी-बिहार-झारखंड में सबसे ज्यादा जोखिम

Extreme Heat Effects on Children:भीषण गर्मी का असर बच्चों के पोषण स्तर पर सीधा पड़ता है. गर्म मौसम में फसलों की उत्पादकता प्रभावित होती है, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं और स्वच्छ पानी की उपलब्धता कम हो सकती है. इससे बच्चों में कुपोषण, डिहाइड्रेशन और संक्रमण जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है.
 

Extreme Heat Effects on Children: आज मनुष्य अपनी सुख सुविधा और विभिन्न मनोविकारों की पूर्ति के लिए प्रकृति को गंभीर नुकसान पहुँचा रहा है. इसीलिए प्रकृति असंतुलित हो रही है और उसके दुष्परिणाम इस क्लाइ मेट change के रूप में दिखाई पद रहे है. क्लाईमेट चेंज याने जलवायु परिवर्तन ऐसे दो शब्द हैं, जिनके बारे में आप इन दिनों अक्सर सुन रहे होंगे. दरअसल, पिछली कुछ सदियों से हमारी जलवायु में धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है. यानी, दुनिया के विभिन्न देशों में सैकड़ों सालों से जो औसत तापमान बना हुआ था, वह अब बदल रहा है.

जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ती गर्मी का असर अब बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर रूप से दिखाई देने लगा है. विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक तापमान और हीटवेव की बढ़ती घटनाओं के कारण दुनिया भर में करीब 110 करोड़ बच्चे कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बढ़ते खतरे का सामना कर रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, भीषण गर्मी का असर बच्चों के पोषण स्तर पर सीधा पड़ता है. गर्म मौसम में फसलों की उत्पादकता प्रभावित होती है, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं और स्वच्छ पानी की उपलब्धता कम हो सकती है. इससे बच्चों में कुपोषण, डिहाइड्रेशन और संक्रमण जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है. कभी ज्यादा सर्दी-गर्मी तो कभी अधिक तूफान-बारिश और बाढ़. ये कुदरती आफतें अब बच्चों को भी प्रभावित करने लगी हैं. विश्व के 110 करोड़ बच्चे किसी न किसी प्राकृतिक आपदा से जूझ रहे हैं. साल 2050 तक 2.8 करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हो सकते हैं. 4 करोड़ बच्चों का कद भी कम रह सकता है. यूनिसेफ की हाल की रिपोर्ट के अनुसार भारत के करीब 97% बच्चों पर जलवायु परिवर्तन का जोखिम है. देश के बिहार, यूपी और झारखंड समेत कई राज्यों में ये खतरा ज्यादा है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि सूखा और अत्यधिक गर्मी का भारत के 15 करोड़ बच्चों पर इंपैक्ट है. देश के 23 करोड़ से अधिक बच्चे कम से कम 3 जलवायु संबंधी खतरों से घिरे हैं. दुनिया के अन्य देशों का भी यही हाल है. विश्व के हर सात में से एक यानी 33 करोड़ बच्चे बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहते हैं. जबकि करीब दो तिहाई बच्चे भीषण लू की चपेट में हैं. इस समस्या में लगातार इजाफा भी हो रहा है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि विश्वभर के करीब 23 लाख बच्चे ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां हवा पूरी तरह शुद्ध नहीं है.

वहीं पिछले साल भी यूनिसेफ ने Assessing the Impact of Climate Change on Food and Nutrition Security in India के नाम से इसी तरह की रिपोर्ट जारी की थी. इसके मुताबिक अत्यधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों में नाटेपन की दर 44.6% है. जबकि कम संवेदनशील क्षेत्रों में यह 29.6% है. यानी जहां सूखा, बाढ़, गर्मी-तूफान आदि का खतरा हमेशा बना रहता है वहां हर 100 में से 44 बच्चे छोटे कद वाले रह जाते हैं. वहीं जहां ऐसे खतरे कम हैं, वहां हर 100 में से 29 बच्चों की लंबाई कम रहती है. जलवायु संबंधी जोखिम बढ़ने पर बच्चों में कुपोषण का खतरा भी बढ़ेगा.

भारत के हर बच्चे पर जलवायु-आपदा का संकट : यूनिसेफ (United Nations International Children's Emergency Fund) की नई रिपोर्ट में भारत के संबंध में चिंताजनक बात कही गई है. इससे भारतीय माता-पिता की टेंशन बढ़ सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत का करीब हर बच्चा (97%) क्लाइमेट चेंज या प्राकृतिक आपदा संबंधी खतरों के संपर्क में है. इन बच्चों को कम से कम 2 या इससे अधिक जोखिमों का सामना करना पड़ता है. यूनिसेफ के पूर्व की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में 18 साल के कम उम्र के 240 करोड़ बच्चे हैं. इनमें से काफी बच्चों पर मौसम की मार है.


बच्चों की जरूरतों को अहमियत देने पर जोर : रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि बच्चे सूखा, बाढ़, अधिक गर्मी, तूफान, रेत और धूल भरी आंधी, जंगल की आग आदि से जुड़े खतरों के दायरे में हैं. यूनिसेफ ने कहा है कि जलवायु को अनुकूल बनाने, आपदा से निपटने की जो भी तैयारियां की जाती हैं, उनमें बच्चों की जरूरतों को प्रमुखता से अहमियत देनी चाहिए. इन आपदाओं से करीब 55% भारतीय बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सुरक्षा को नुकसान पहुंचने का अनुमान है.


हर साल 6.69 करोड़ बच्चे बाढ़ की चपेट में आते हैं : यूनिसेफ ने बाढ़ से प्रभावित बच्चों की अनुमानित संख्या का भी जिक्र किया है. इसके अनुसार दुनिया के 6.69 करोड़ बच्चे हर साल नदी में आने वाली बाढ़ की चपेट में आते हैं. प्राकृतिक आपदाओं से परिवार और समुदायों का निपटना काफी कठिन हो जाता है. कई बार कुछ ही समय के दौरान ही कई तरह की प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिलती हैं. जैसे बाढ़, तूफान सूखा और भीषण गर्मी. ये समस्याएं बच्चों को असुरक्षित कर देती हैं. परिवारों को इससे उबरने का ज्यादा समय नहीं मिल पाता है.

बच्चों की 6 आवश्यक्ताओं पर ध्यान जरूरी : यूनिसेफ ने क्लाइमेट चेंज के जोखिमों के मद्देनजर बच्चों की 6 आवश्कताओं पर जोर दिया है. इसमें स्वास्थ्य, पोषण, जल-स्वच्छता, शिक्षा, बाल संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा शामिल हैं. यानी जिन इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है. वहां के बच्चों को ये सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए. यूनिसेफ ने यह भी बताया है कि जलवायु संबंधी खतरे उस समय आपदा का रूप ले लेते हैं जब ये लोगों के जीवन और रोजगार को प्रभावित करने लगते हैं.

भारत में वायु प्रदूषण का ज्यादा जोखिम : रिपोर्ट में भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण पर भी चिंता जताई गई है. बताया गया है कि यह गंभीर समस्या है. यहां के काफी बच्चे इस जोखिम का सामना कर रहे हैं. वहीं देश के 29 करोड़ से अधिक बच्चे उन इलाकों में रहते हैं, जहां मलेरिया का खतरा ज्यादा होता है. सूखा और बाढ़ से फसलें बर्बाद होने पर खाने-पीने के सामानों की सप्लाई प्रभावित होने का खतरा रहता है. करीब 40% भारतीय बच्चों को खाने-पीने की पर्याप्त चीजें नहीं मिल पा रहीं हैं.

भारत में जलवायु संबंधी खतरों का रिस्क ज्यादा : रिपोर्ट में यूनिसेफ ने बताया है कि मौसम को अनुकूल बनाने के लिए यदि वैश्विक स्तर पर तत्काल बड़े प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में इसके कई दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं. इससे पूरी दुनिया के बच्चों का कद कम रह जाएगा. यानी वे बौनेपन के शिकार हो जाएंगे. इसके अलावा बच्चों को पर्याप्त पोषण भी नहीं मिल पाएगा. इससे आगामी समय में बच्चों में कुपोषण बढ़ेगा. बाढ़ से पानी दूषित हो सकता है. सूखे से पानी के स्रोत भी सूख सकते हैं. बीमारियां बढ़ सकती हैं.

बच्चों के विकास पर असर डाल सकती है गर्मी : यूनिसेफ ने बताया है कि गर्मी के कारण गर्भ में पल रहे बच्चों पर भी असर पड़ सकता है. गर्भवस्था के अंतिम महीनों में यदि कोई महिला अधिक गर्मी के संपर्क में रहती है तो बच्चे का वजन कम रह सकता है. उसमें पोषण की कमी भी हो सकती है. इतना ही नहीं बच्चे के जन्म लेने के बाद भी उसका विकास प्रभावित हो सकता है. लंबे समय तक उसे स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

किन राज्यों में जलवायु संबंधी खतरे ज्यादा? : पिछले साल की यूनिसेफ रिपोर्ट और आईसीआरआईसैट की स्टडी में जलवायु संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे राज्यों के बारे में जानकारी दी गई थी. जलवायु जोखिम सूचकांक में बिहार का स्कोर 0.836, उत्तर प्रदेश का 0.834, झारखंड का 0.829, छत्तीसगढ़ का 0.827 और मध्य प्रदेश का 0.816 है. यानी बिहार में मौसमी खतरे आने की संभावना सबसे ज्यादा है. जबकि यूपी दूसरे नंबर पर है. छत्तीसगढ़ तीसरे जबकि झारखंड चौथे और एमपी पांचवें स्थान पर है.

त्रिपुरा में जलवायु जोखिम सबसे कम : बिहार, यूपी, झारखंड, छत्तीसगढ़ और एमपी के अलावा असम, ओडिशा, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान भी जलवायु जोखिम वाले राज्यों में आते हैं. वहीं त्रिपुरा सबसे कम संवेदनशील राज्य है. यानी यहां पर जलवायु संबंधी जोखिमों का रिस्क न के बराबर ही है. इन रिपोर्टों के मुताबिक जो राज्य जलवायु के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं, वहां के बच्चों में बौनापन और कुपोषण होने का रिस्क ज्यादा है. यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार गर्मी, अनियमित बारिश, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं कई तरह से जन-जीवन पर प्रभाव डाल रही है.


साल 2050 तक 2 डिग्री तक पारा बढ़ने का खतरा : जनवरी 2026 में आई ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी रिपोर्ट में बताया गया था कि साल 2050 तक पारा 2 डिग्री तक बढ़ने का खतरा है. पेरिस एग्रीमेंट में तापमान का मानक 1.5 डिग्री सेल्सियस तय किया गया है. दुनिया की कोशिश ग्लोबल वार्मिंग के स्तर को इससे नीचे रखने की है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां बताती हैं कि धरती का बढ़ता तापमान इस लिमिट के पार जाएगा. ऐसे में अगर पारा 2 डिग्री तक पहुंचता है तो साल 2050 से काफी समय पहले ही गर्मी विश्व में तबाही मचा सकती है. दुनिया की लगभग आधी जनसंख्या को परेशान होना पड़ेगा.

कम रह सकती है 120 देशों के लोगों की हाइट : मई में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की रिसर्च रिपोर्ट में भी जलवायु परिवर्तन की वजह से इंसानों की हाइट कम रहने का जिक्र किया गया था. बताया गया था कि आगामी समय में 120 देशों पर इसका खतरा है. सबसे लंबे लोगों वाले देश नीदरलैंड पर अभी से इसका इंपैक्ट नजर आने लगा है. दक्षिण एशिया के देशों को पर्यावरण के लिहाज से 'हाई-रिस्क' माना गया है. इसमें भारत, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका और अफगानिस्तान आदि शामिल हैं.

किन देशों में रहते हैं सबसे अधिक और सबसे कम लंबे लोग : heightcomparisonhub.com के डेटा के अनुसार नीदरलैंड में सबसे लंबे लोग रहते हैं. यहां पुरुषों की औसत लंबाई 183.8 सेंटीमीटर है. जबकि महिलाओं की 170.4 है. डेनमार्क इस मामले में दूसरे नंबर पर है. यहां के पुरुषों की लंबाई 181.4 जबकि महिलाओं की 168.7 सेंटीमीटर है. वहीं तिमोर-लेस्ते में सबसे कम लंबाई के लोग रहते हैं. यहां पुरुषों की ऊंचाई 159.8 जबकि महिलाओं की 152.9 सेंटीमीटर होती है. कम लंबाई के मामले दूसरे नंबर पर लाओस है. यहां पुरुषों की औसत लंबाई 162.8 जबकि महिलाओं की 152,2 सेंटीमीटर होती है.