यूपी में तंबाकू पर कानून सख्त, फिर भी गली-मोहल्लों में आसानी से मिल रहा गुटखा; कैंसर के बढ़ते मामले बढ़ा रहे चिंता
UP News: उत्तर प्रदेश की सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर जगह-जगह दिखाई देने वाले तंबाकू और गुटखे के निशान एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करते हैं। कानून में तंबाकू उत्पादों की बिक्री और इस्तेमाल को लेकर कई तरह के प्रतिबंध और नियम हैं, लेकिन बाजारों में पान मसाला, खैनी, जर्दा, तंबाकू और सिगरेट की उपलब्धता अब भी आम है।
यही वजह है कि प्रदेश में तंबाकू नियंत्रण को लेकर सरकार के सामने दोहरी चुनौती बनी हुई है। एक तरफ इन उत्पादों से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान और कैंसर का खतरा है, तो दूसरी ओर इससे मिलने वाला राजस्व और इस कारोबार पर निर्भर लोगों की आजीविका का सवाल है।
कानून के बावजूद क्यों नहीं रुक रही बिक्री?
सवाल यह है कि अगर तंबाकू उत्पादों को नियंत्रित करने के लिए नियम मौजूद हैं, तो फिर इनकी बिक्री पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लग पा रही है। खासतौर पर गुटखे को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की स्थिति में सरकार के सामने अवैध बिक्री और नियमों से बचने के नए तरीकों पर भी अंकुश लगाने की चुनौती होगी।
गुटखे पर सिर्फ सरकारी आदेश जारी कर पूर्ण रोक लगाना आसान नहीं होगा। पान मसाला और तंबाकू को अलग-अलग पैकेट में बेचकर नियमों से बचने की कोशिशों पर भी रोक लगानी होगी। इसके साथ ही तंबाकू कारोबार से जुड़े लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करना भी जरूरी होगा।
तंबाकू से जुड़ी बीमारियां बढ़ा रहीं चिंता
तंबाकू सेवन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की तस्वीर अस्पतालों में भी दिखाई देती है। इटावा में उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में कैंसर के 26 मरीज सामने आए थे। 2025 में यह संख्या बढ़कर 37 हो गई। यानी एक साल के दौरान दर्ज मामलों में करीब 42 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर के मामलों में वृद्धि को केवल तंबाकू सेवन के कारण बताना सही नहीं होगा। कैंसर होने के पीछे कई अलग-अलग जोखिम कारक और कारण हो सकते हैं।
ओरल कैंसर में तंबाकू बड़ा जोखिम कारक
डॉक्टरों के मुताबिक तंबाकू, गुटखा, पान मसाला और धूम्रपान मुंह के कैंसर यानी ओरल कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) समेत बड़े अस्पतालों में मुंह के कैंसर और प्री-कैंसर से जुड़े मरीज लगातार इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
KGMU के प्रवक्ता प्रोफेसर केके सिंह के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में ओरल कैंसर के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि बीमारी को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ने से मरीज अब पहले की तुलना में जल्दी अस्पताल पहुंच रहे हैं। इसका असर अस्पतालों में दर्ज मामलों की संख्या पर भी पड़ सकता है।
लक्षण दिखते ही अस्पताल पहुंच रहे लोग
प्रोफेसर केके सिंह के मुताबिक, मुंह में दर्द, लंबे समय तक रहने वाला घाव या किसी तरह की असामान्यता होने पर अब लोग पहले के मुकाबले जल्दी चिकित्सकीय सलाह ले रहे हैं। इससे बीमारी की पहचान भी पहले हो रही है।
उन्होंने तंबाकू, पान मसाला, गुटखा, बीड़ी और सिगरेट को ओरल कैंसर के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में बताया। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि कैंसर के बढ़ते मामलों को सिर्फ तंबाकू या पान मसाला खाने से जोड़ना वैज्ञानिक तौर पर उचित नहीं होगा।
यूपी में तंबाकू सेवन भी बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश में तंबाकू इस्तेमाल को लेकर सरकारी सर्वे के आंकड़े भी चिंता पैदा करते हैं। प्रदेश में पुरुषों के बीच तंबाकू सेवन महिलाओं की तुलना में काफी अधिक रहा है। चुनौती सिर्फ सिगरेट और बीड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि खैनी, गुटखा और दूसरे धूम्ररहित तंबाकू उत्पाद भी बड़ी समस्या बने हुए हैं।
सरकार की ओर से तंबाकू और सिगरेट पर टैक्स का बोझ बढ़ाकर खपत कम करने की कोशिश की गई है। इसके बावजूद बाजार में इन उत्पादों की उपलब्धता और इस्तेमाल को नियंत्रित करना अभी भी बड़ी चुनौती है।
सिर्फ प्रतिबंध नहीं, प्रभावी निगरानी भी जरूरी
तंबाकू नियंत्रण के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। नियमों का सख्ती से पालन, अवैध बिक्री पर कार्रवाई, टैक्स चोरी पर नियंत्रण और लोगों को तंबाकू छोड़ने के लिए जागरूक करना भी उतना ही जरूरी है।
यूपी में पूर्ण गुटखा प्रतिबंध की राह में स्वास्थ्य, कानून, रोजगार और राजस्व से जुड़े कई सवाल हैं। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती ऐसी नीति बनाने की है, जो तंबाकू की खपत कम करने के साथ उसके अवैध कारोबार पर भी प्रभावी तरीके से लगाम लगा सके।