भारत और जापान रक्षा सहयोग में नया अध्याय, पहली टेक्नोलॉजी परियोजना को मिली हरी झंडी
India-Japan: भारत और जापान ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देते हुए अपनी पहली संयुक्त रक्षा तकनीक परियोजना को मंजूरी दे दी है. दोनों देशों ने भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए यूनीकॉर्न (UNICORN – Unified Complex Radio Antenna) नामक उन्नत संचार एंटीना प्रणाली के संयुक्त विकास और उत्पादन पर सहमति बनाई है. यह फैसला दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों के बीच हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद लिया गया. यह समझौता हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते रणनीतिक मुकाबले और चीन के आक्रामक सैन्य रुख पर बढ़ती चिंताओं के बीच आया है. यह एशिया के दो बड़े लोकतांत्रिक देशों के बीच एक गहरे रणनीतिक जुड़ाव का संकेत देता है.
यूनीकॉर्न प्रणाली अत्याधुनिक रेडियो और संचार तकनीक से लैस होगी, जिससे नौसैनिक युद्धपोतों की संचार क्षमता, निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) की दक्षता में बड़ा सुधार होगा. इस परियोजना के तहत जापान अपनी उन्नत तकनीक उपलब्ध कराएगा, जबकि भारत निर्माण और उत्पादन में अहम भूमिका निभाएगा. इससे भारत की 'मेक इन इंडिया' और रक्षा आत्मनिर्भरता की नीति को भी मजबूती मिलेगी.
गुरुवार को यहां आयोजित भारत-जापान वार्षिक द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के बाद अपनी जापानी समकक्ष सानाए ताकाइची के साथ मीडिया को संयुक्त रूप से संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा- "आज हमने रक्षा क्षेत्र में भारत और जापान के बीच पहली सह-विकास परियोजना पर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. नौसेना के रेडियो एंटीना (नेवल रेडियो एंटीना) के लिए यह परियोजना हमारी रक्षा प्रौद्योगिकी साझेदारी में एक नया अध्याय खोलेगी. अब हम मिलकर ऐसी रक्षा तकनीकें विकसित करेंगे जो क्षेत्रीय शांति, समुद्री सुरक्षा और नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करेंगी."
Addressed the India-Japan Joint Economic Forum along with Prime Minister Sanae Takaichi. It was gladdening to interact with business leaders from both countries, whose enterprise and innovation continue to add new momentum to the India-Japan economic partnership.… pic.twitter.com/hGXrYcDBw7
— Narendra Modi (@narendramodi) July 2, 2026
अपनी ओर से, ताकाइची ने कहा कि जापान और भारत को एक साथ अधिक मजबूत और समृद्ध बनने के लिए अपनी-अपनी ताकतों का लाभ उठाना चाहिए. उन्होंने कहा, "अस्त-व्यस्त अंतरराष्ट्रीय मामलों के बीच, इस तरह के एक परस्पर-पूरक सहयोगात्मक संबंध की स्थापना और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है." उन्होंने कहा कि भारत और जापान मौजूदा अंतरराष्ट्रीय स्थिति के तहत स्थापित की जाने वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के रूप को लेकर एक जैसी सोच (विजन) साझा करते हैं.
ताकाइची ने आगे कहा, "मैंने हाल ही में अपडेटेड FOIP (जापान की स्वतंत्र और खुला हिंद-प्रशांत नीति) की घोषणा की है, जो FOIP को हासिल करने के लिए आत्मनिर्भरता और लचीलेपन पर ध्यान केंद्रित करती है. दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी समुद्र को एक ऐसे साझा क्षेत्र के रूप में देखते हैं जो क्षेत्रीय स्थिरता और विकास का समर्थन करता है. वह हिंद महासागर के देशों के लिए 'महासागर' (MAHASAGAR - द ग्रेट ओशन इनिशिएटिव) को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि वे अपने प्रयासों से अपनी संप्रभुता और समुद्र की रक्षा कर सकें, जो कि FOIP के पूरी तरह अनुकूल है."
Special Briefing by MEA on the Official Visit of Prime Minister of Japan to India
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) July 2, 2026
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द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के बाद एक विशेष मीडिया ब्रीफिंग को संबोधित करते हुए, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि भारत रक्षा निर्यात के मामले में जापान के रुख में आ रहे बदलावों का स्वागत करता है. मिस्री ने कहा, "इस मुद्दे पर काफी बड़ा और हमारे नजरिए से, एक सकारात्मक बदलाव आया है. और आज दोनों नेताओं के बीच रक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई. इस बात पर भी सहमति बनी कि हम कई क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं तलाश सकते हैं."
विदेश सचिव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने सुझाव दिया है कि यह सहयोग डिजाइनिंग से लेकर प्रोडक्शन और मैन्युफैक्चरिंग तक के पूरे दायरे में हो सकता है. उन्होंने कहा, "जहां तक विशिष्ट प्लेटफॉर्म्स का सवाल है, आपने ध्यान दिया होगा कि दोनों नेताओं ने उस बड़ी परियोजना पर प्रगति का जिक्र किया है जो इस समय दोनों देशों के बीच चल रही है, और वो है यूनिकॉर्न (UNICORN) प्रोजेक्ट."
List of outcomes (16 in total) : Meeting between PM @narendramodi and PM @takaichi_sanae of Japan on her Official Visit to India ⬇️
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) July 2, 2026
🇮🇳 🇯🇵 pic.twitter.com/jgxHibuxVW
द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के बाद जारी एक संयुक्त बयान के अनुसार, मोदी ने रक्षा उपकरणों और प्रौद्योगिकी के ट्रांसफर से जुड़े तीन सिद्धांतों की जापान द्वारा की गई समीक्षा का स्वागत किया और उम्मीद जताई कि इससे दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी और गहरी होगी.
संयुक्त बयान के अनुसार, "दोनों प्रधानमंत्रियों ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि यूनिफाइड कॉम्प्लेक्स रेडियो एंटीना (UNICORN) परियोजना के संबंध में बचे हुए तकनीकी विवरणों पर सैद्धांतिक रूप से सहमति बन गई है." बयान में आगे कहा गया, "उन्होंने इस परियोजना के जल्द पूरा होने की उम्मीद जताई और रक्षा उपकरण व तकनीक के क्षेत्र में अन्य परियोजनाओं को अमली जामा पहनाने के रास्ते तलाशने पर सहमति व्यक्त की."
यूनिकॉर्न को आधुनिक नौसैनिक जहाजों पर सुरक्षित और विश्वसनीय संचार की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए विकसित किया गया था. जैसे-जैसे समुद्री अभियान अधिक जटिल होते गए हैं और जहाजों, विमानों व जमीनी बलों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता बढ़ी है, वैसे-वैसे यूनिकॉर्न को विभिन्न परिस्थितियों में निर्बाध संचार सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के दौरान का समय भी शामिल है.
जापान में भारत की एम्बेसडर नगमा एम. मलिक और भारत में जापान के एम्बेसडर केइची ओनो ने गुरुवार, 2 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के बीच मीटिंग के बाद एक जॉइंट प्रेस स्टेटमेंट के दौरान MoUs का एक्सचेंज किया. (IANS)
यह प्रणाली वर्तमान में जापानी समुद्री आत्म-रक्षा बल (JMSDF) के मोगामी-क्लास फ्रिगेट्स (एक प्रकार के युद्धपोत) पर स्थापित की जा रही है. इसके अलावा, इस बात की भी संभावना है कि इन्हें जापान के नेक्स्ट जनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल (अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती जहाज) कार्यक्रम में शामिल करने पर विचार किया जाएगा.
दशकों तक, भारत और जापान के बीच रक्षा संबंध जापान के युद्ध के बाद के शांतिवादी प्रतिबंधों और रक्षा निर्यात पर संवैधानिक सीमाओं के कारण सीमित थे. यूनिकॉर्न परियोजना उस समीकरण को बदल देती है.
एक पारंपरिक हथियार खरीद के विपरीत, सह-विकास (को-डेवलपमेंट) में संयुक्त अनुसंधान और विकास (आरएंडडी), बौद्धिक संपदा और संवेदनशील तकनीकों को साझा करना, मिलकर निर्माण करना, दीर्घकालिक रखरखाव व अपग्रेड, और तीसरे देशों को भविष्य में निर्यात करने की संभावना शामिल होती है. यह भारत-जापान रक्षा सहयोग को उस स्तर पर ले जाता है, जिसका आनंद भारत पहले से ही रूस और तेजी से फ्रांस व अमेरिका जैसे भागीदारों के साथ ले रहा है.
यह परियोजना 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहलों के तहत सह-विकास और सह-उत्पादन पर भारत के जोर के साथ भी पूरी तरह मेल खाती है. यूनिकॉर्न मास्ट का मूल उद्देश्य भारतीय नौसेना के जहाजों पर लगाने के लिए भारतीय उद्योग और जापानी भागीदारों द्वारा इसे मिलकर विकसित करना था.
भारत-जापान रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग के पीछे सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक वजह एक बड़ी सैन्य शक्ति के रूप में चीन का उदय है. भारत और जापान दोनों को बीजिंग से सीधे सुरक्षा खतरों का सामना करना पड़ रहा है. भारत हिमालयी सीमा पर विवादित क्षेत्रों में और हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी सैन्य दबाव का सामना कर रहा है. वहीं जापान को पूर्वी चीन सागर में सेनकाकू द्वीप समूह के आस-पास चीनी नौसेना व वायुसेना की गतिविधियों और ताइवान के आस-पास बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है.
गुरुवार, 2 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची के बीच मीटिंग के बाद एक जॉइंट प्रेस स्टेटमेंट के दौरान विदेश सचिव विक्रम मिस्री और भारत में जापान के राजदूत केइची ओनो ने MoUs का आदान-प्रदान किया. (IANS/PMO)
दोनों देश चीन की तेजी से बढ़ती नौसैनिक क्षमताओं और उसके 'एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल' (दुश्मन को रोकने वाले सैन्य तंत्र) से चिंतित हैं. नतीजतन, नई दिल्ली और टोक्यो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति का संतुलन बनाए रखने के लिए एक-दूसरे को स्वाभाविक रणनीतिक भागीदार के रूप में देख रहे हैं. इसलिए, रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग एक बड़े रणनीतिक उद्देश्य को पूरा करता है- 'बाहरी आपूर्तिकर्ताओं (सप्लायर्स) पर बहुत अधिक निर्भर रहने के बजाय एक जैसी सोच रखने वाले लोकतांत्रिक देशों के बीच खुद की और मजबूत सैन्य क्षमताओं का निर्माण करना'.
यह पहली परियोजना अपने आप में समुद्री (नौसेना से जुड़ी) प्रकृति की है, जो कि बेहद महत्वपूर्ण है.
यूनिकॉर्न (UNICORN) एंटीना प्रणाली युद्धपोतों के संचार को बेहतर बनाती है. उनके रडार पर दिखने की संभावना को कम करती है, जिससे जहाजों की छिपने की क्षमता और उनके सुरक्षित बचे रहने की संभावना बढ़ जाती है. ऐसी तकनीकें दक्षिण चीन सागर, पूर्वी चीन सागर, पश्चिमी प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र जैसे विवादित समुद्री वातावरण में विशेष रूप से मूल्यवान हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची गुरुवार, 2 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली में 16वें भारत-जापान सालाना समिट के दौरान भारत-जापान जॉइंट इकोनॉमिक फोरम में ग्रुप फोटो सेशन के दौरान. (IANS/PMO)
भारत और जापान एक स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण के सबसे मजबूत समर्थकों में से हैं, जो नौवहन की स्वतंत्रता (फ्रीडम ऑफ नेविगेशन), अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देता है. नौसैनिक प्रौद्योगिकियों को मिलकर विकसित करके, दोनों देश एक मजबूत क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा ढांचे के निर्माण में योगदान दे रहे हैं, जो किसी भी दमनकारी व्यवहार को रोकने और समुद्री मार्गों की सुरक्षा बनाए रखने में सक्षम है.
विदेश सचिव मिस्री के अनुसार, द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के दौरान थल, नभ, नौसैनिक प्रणालियों, मानव रहित वाहनों (ड्रोन) और विभिन्न प्रकार के रक्षा तंत्रों में सहयोग का जिक्र किया गया. उन्होंने कहा, "दोनों देशों की सेनाओं द्वारा किए जा रहे सैन्य अभ्यासों की बढ़ती रफ्तार (तेजी) को स्वीकार किया गया."
मिस्री ने आगे कहा, "बेशक, हम लंबे समय से नौसैनिक अभ्यास करते आ रहे हैं, लेकिन अब थल सेना और वायु सेना के अभ्यास भी तेजी से बढ़ रहे हैं, और कुछ मामलों में तो यह पहली बार हो रहे हैं. प्रधानमंत्री ताकाइची ने इस क्षेत्र में संस्थागत सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता का विशेष रूप से उल्लेख किया."
शिलॉन्ग स्थित 'एशियन कॉन्फ्लुएंस' थिंक टैंक के फेलो के. योम के अनुसार, दोनों देशों का अपने रक्षा सहयोग को बढ़ाने का निर्णय और इसके लिए दिखाई गई इच्छाशक्ति व साहस, रणनीतिक क्षेत्र में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है. योम ने ईटीवी भारत से कहा, "यह चीन और अमेरिका दोनों के संदर्भ में इस क्षेत्र में उभरते भू-राजनीतिक परिदृश्य के बारे में भी कुछ बयां करता है. भारत और जापान दोनों के लिए, अमेरिका पर विश्वसनीयता की कमी की भावना भी लगातार बढ़ रही है."
उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हालिया चीन यात्रा का जिक्र किया, जिसके बाद उन्होंने एक जी-2 (G2) ब्लॉक के बारे में बात की. योम ने कहा, "दूसरा कारण निश्चित रूप से हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में बदलते शक्ति समीकरण हैं. भारत और जापान दोनों का मानना है कि दोनों देशों को सहयोग करने और हिंद-प्रशांत के समुद्री क्षेत्र में एक स्थिरता लाने वाली ताकत बनने की आवश्यकता होगी."
उन्होंने आगे कहा, "यदि आप जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे के समय से इसके सफर को देखें, तो आप देख सकते हैं कि दोनों देशों के बीच एक गहरे और अधिक सार्थक रक्षा सहयोग को बनाने की यह इच्छा आज धरातल पर उतरती दिख रही है."
कुल मिलाकर देखा जाए तो, भारत-जापान नौसेना एंटीना परियोजना सिर्फ एक एकल रक्षा समझौते से कहीं बढ़कर है. यह जापान के लिए एक भरोसेमंद रक्षा प्रौद्योगिकी भागीदार के रूप में भारत के उभार को दिखाता है. साथ ही, यह हथियार निर्यात से पीछे हटने वाले जापान के एक सक्रिय रक्षा-औद्योगिक खिलाड़ी के रूप में बदलने, बदलते एशियाई शक्ति संतुलन के प्रति एक साझा जवाब, और एक व्यापक भारत-जापान रक्षा नवाचार साझेदारी की शुरुआत को दर्शाता है.
रणनीतिक रूप से, यह समझौता भारत-जापान संबंधों के आर्थिक सहयोग से व्यापक सुरक्षा सहयोग की ओर बढ़ते बदलाव को दिखाता है. यह यह भी प्रदर्शित करता है कि कैसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मध्यम शक्तियां बड़े देशों के बीच बढ़ते मुकाबले के इस दौर में क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री सुरक्षा और नियम-आधारित व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपनी तकनीकी क्षमताओं को आपस में जोड़ रही हैं.