आधार, पासपोर्ट या वोटर ID नहीं! जानिए भारतीय नागरिकता का असली कानूनी सबूत क्या है

National: आधार कार्ड पहचान और निवास का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं. इसी तरह वोटर आईडी मतदान का अधिकार दर्शाती है, जबकि पासपोर्ट यात्रा और पहचान संबंधी दस्तावेज है. हालांकि ये दस्तावेज नागरिकता के दावे को मजबूत कर सकते हैं, लेकिन अपने आप में नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं माने जाते.
 

National: देश में नागरिकता को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या आधार कार्ड, वोटर आईडी या पासपोर्ट भारतीय नागरिकता का प्रमाण हैं. कई लोग इन दस्तावेजों को नागरिकता का अंतिम प्रमाण मान लेते हैं, लेकिन कानूनी रूप से स्थिति इससे अलग है.

विशेषज्ञों के अनुसार, आधार कार्ड पहचान और निवास का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं. इसी तरह वोटर आईडी मतदान का अधिकार दर्शाती है, जबकि पासपोर्ट यात्रा और पहचान संबंधी दस्तावेज है. हालांकि ये दस्तावेज नागरिकता के दावे को मजबूत कर सकते हैं, लेकिन अपने आप में नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं माने जाते. इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर खूब बहस छिड़ गई और लोग पूछने लगे कि अगर पासपोर्ट, आधार कार्ड और वोटर आईडी नागरिकता का सबूत नहीं हैं तो फिर असली सबूत क्या है.



पासपोर्ट का नागरिकता का सबूत न होना कोई नई बात नहीं है. यह बात सालों से कानून में लिखी हुई है. पासपोर्ट को लेकर एक बात बार-बार कही जाती है कि यह किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का सबूत है, लेकिन कानूनी तौर पर यह बात सही नहीं है. पासपोर्ट सिर्फ एक यात्रा दस्तावेज है नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं. यह कोई नई बात नहीं है यह बात सालों से कानून में लिखी हुई है.

पासपोर्ट एक्ट क्या कहता है

पासपोर्ट एक्ट 1967 की धारा 20 में साफ लिखा है कि केंद्र सरकार चाहे तो किसी ऐसे व्यक्ति को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज दे सकती है जो भारत का नागरिक नहीं है. शर्त सिर्फ यह है कि सरकार को लगे कि यह जनहित में जरूरी है. यानी कानून खुद मानता है कि पासपोर्ट और नागरिकता दो अलग अलग चीजें हैं. आम तौर पर भारतीय पासपोर्ट भारतीय नागरिकों को ही मिलता है, लेकिन यह कोई पूरी तरह से बंधा हुआ नियम नहीं है. धारा 20 के तहत इसमें छूट का प्रावधान है.

बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला

साल 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में यही बात साफ कही थी कि पासपोर्ट होने का मतलब यह नहीं है कि वह व्यक्ति भारत का नागरिक ही है. कोर्ट ने कहा था कि पासपोर्ट को नागरिकता के अंतिम सबूत के तौर पर नहीं देखा जा सकता.

जन्म और वंश से नागरिकता

26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मे हर व्यक्ति को नागरिकता मिली. 1987-2003 के बीच माता या पिता में से एक के भारतीय नागरिक होने पर भी नागरिकता मिलती थी. 2003 के बाद दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों या एक नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो. विदेश में जन्मे बच्चे को भारतीय माता-पिता के आधार पर वंश से नागरिकता मिल सकती है, बशर्ते उसका जन्म एक वर्ष के भीतर भारतीय दूतावास में पंजीकृत कराया जाए.

रजिस्ट्रेशन और नेचुरलाइजेशन से नागरिकता

भारतीय मूल के लोगों के लिए या कुछ खास स्थितियों में आवेदन करके रजिस्ट्रेशन के जरिए नागरिकता मिल सकती है. कोई विदेशी नागरिक जो गैर कानूनी प्रवासी न हो, अगर भारत में लगातार बारह साल रहता है तो केंद्र सरकार उसे नेचुरलाइजेशन सर्टिफिकेट दे सकती है. शपथ लेने के बाद वह व्यक्ति भारत का नागरिक बन जाता है.

क्षेत्र के विलय से नागरिकता

अगर कोई नया क्षेत्र भारत में शामिल होता है तो वहां के लोगों को भी सरकार आदेश के जरिए नागरिकता दे सकती है.

नागरिकता का प्रमाण

भारतीय नागरिकता का कानूनी आधार नागरिकता अधिनियम, 1955 है, जो तय करता है कि कौन भारत का नागरिक है और नागरिकता पांच तरीकों से कैसे मिलती है. इन प्रक्रियाओं के बाद जारी सिटिजनशिप सर्टिफिकेट (नागरिकता प्रमाण पत्र) ही नागरिकता का औपचारिक प्रमाण होता है. पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी और पैन कार्ड केवल पहचान के दस्तावेज हैं. पासपोर्ट एक्ट, 1967 की धारा 20 के तहत विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिक को भी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है, इसलिए पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता.