तुलसीदास जयंती पर 23 अगस्त को निकलेगी भव्य शोभायात्रा, संत-महात्माओं और गणमान्यजनों का होगा समागम
New Delhi: रामचरितमानस के अमर रचयिता महाकवि गोस्वामी तुलसीदास की जयंती के अवसर पर अखिल भारतीय गोस्वामी महासभा द्वारा राजधानी नई दिल्ली में गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती मनाई गई। महासभा के राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने गोस्वामी जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। नई दिल्ली में आयोजित प्रेसवार्ता में महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत सच्चिदानंद गिरि और अभियान समिति के अध्यक्ष डॉ. धनंजय गिरि ने
इस उपलक्ष्य में होने वाले महोत्सव कार्यक्रम की तैयारियों और आयोजन की विस्तृत जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि 23 अगस्त 2026, रविवार को राजधानी दिल्ली में भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी।
महासभा के मुताबिक शोभायात्रा कथा पुंज पार्क, यमुना बाजार से प्रारंभ होकर लोथियन रोड, लाल किला, जीपीओ और केडिया पुल चौक होते हुए गोस्वामी तुलसीदास चौक पहुंचेगी। यहां गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद शोभायात्रा का समापन होगा। आयोजन में संत-महात्माओं के अलावा सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्र की अनेक विशिष्ट हस्तियों के शामिल होने की संभावना है।
उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के माध्यम से धर्म, दर्शन और अध्यात्म की गहन अवधारणाओं को लोकभाषा में सरल एवं सहज रूप में जन-जन तक पहुंचाया। उनकी रचनाओं में कर्तव्य, करुणा, संयम, सदाचार और लोककल्याण जैसे जीवन-मूल्यों का व्यापक संदेश मिलता है। यही वजह है कि पांच शताब्दियों से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद तुलसीदास की रचनाएं और उनकी वाणी आज भी भारतीय जनमानस में उतनी ही प्रभावशाली हैं।
बदलते समय में भी तुलसीदास की प्रासंगिकता कायम
महंत सच्चिदानंद गिरि ने कहा कि भारतीय साहित्य के इतिहास में कुछ रचनाकार ऐसे हैं, जिनकी कृतियों की प्रासंगिकता समय के साथ कम नहीं होती। गोस्वामी तुलसीदास भी ऐसे ही कालजयी संत-कवि हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ शासन व्यवस्थाएं बदलीं, साम्राज्य बने और समाप्त हुए, विज्ञान और तकनीक ने अभूतपूर्व प्रगति की तथा संचार क्रांति ने दुनिया को करीब ला दिया, लेकिन तुलसीदास की वाणी आज भी समाज को दिशा दे रही है।
उन्होंने कहा कि तुलसीदास की प्रासंगिकता केवल रामचरितमानस की लोकप्रियता में नहीं, बल्कि उनकी उस नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि में निहित है, जिसमें धर्म आचरण का विषय है, शक्ति के साथ संयम जुड़ा है, ज्ञान के साथ विवेक आवश्यक है और जीवन का उद्देश्य लोकमंगल से अलग नहीं है।
महंत गिरि ने कहा कि आज का समाज भौतिक और तकनीकी उपलब्धियों के बावजूद अनेक प्रकार की आंतरिक चुनौतियों से गुजर रहा है। संवाद के साधन बढ़े हैं, लेकिन आपसी संवाद और संवेदना का अभाव महसूस होता है। सूचनाओं की भरमार के बीच विवेक का संकट दिखाई देता है और अधिकारों की चर्चा के बीच कर्तव्यों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। ऐसे दौर में तुलसीदास की शिक्षाओं और साहित्य का पुनर्पाठ वर्तमान समाज को अपनी नैतिक दिशा पर विचार करने का अवसर देता है।
प्रेस वार्ता के दौरान महासभा के श्री धोले पहलवान, श्री ध्रुवनारायण, श्री हीरा नंद गिरी, श्री डोरी लाल गोस्वामी, श्री विवेक गिरि, श्री मुन्ना पहलवान भी मंच पर उपस्थित रहे।
लोकभाषा को बनाया ज्ञान और भक्ति का माध्यम
महासभा के पदाधिकारियों ने कहा कि तुलसीदास के योगदान को समझने के लिए उनके समय की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। मध्यकालीन भारत में राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक विभाजन और धार्मिक रूढ़ियों के बीच धार्मिक एवं दार्शनिक ज्ञान आम जन तक सीमित रूप में ही पहुंच पाता था। ऐसे समय में तुलसीदास ने लोकभाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर ज्ञान, भक्ति और दर्शन को व्यापक समाज तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
अवधी में रचित रामचरितमानस भारतीय लोक-संस्कृति और जनचेतना का एक महत्वपूर्ण आधार बन गया। इसमें राजमहल से लेकर वन तक, राजा से लेकर निषाद तक और ऋषि से लेकर सामान्य जनजीवन तक विभिन्न सामाजिक एवं मानवीय पक्षों का चित्रण मिलता है। तुलसीदास ने रामकथा को लोकभाषा और लोकसंवेदना से जोड़कर उसे भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति और आस्था का अभिन्न हिस्सा बना दिया।
राम के चरित्र में मर्यादा और कर्तव्य का आदर्श
महासभा की ओर से कहा गया कि तुलसीदास के राम भारतीय मानस में मर्यादा, कर्तव्य, संयम, त्याग और लोककल्याण के आदर्श हैं। वर्तमान समय में नेतृत्व का मूल्यांकन अक्सर सत्ता, लोकप्रियता, प्रचार और राजनीतिक सफलता के आधार पर किया जाता है, ऐसे में तुलसी के राम नेतृत्व की एक ऐसी अवधारणा सामने रखते हैं, जिसमें अधिकार से पहले उत्तरदायित्व को महत्व दिया गया है।
राम के जीवन में सत्ता व्यक्तिगत सुख या अधिकार का माध्यम नहीं, बल्कि कर्तव्य और दायित्व का विषय है। राज्य प्राप्त होने पर उसका निर्वहन और वनवास जैसी कठिन परिस्थिति में भी मर्यादा एवं कर्तव्य का पालन उनके चरित्र की विशिष्टता है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिस्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन सत्ता को अधिकार से पहले जिम्मेदारी मानने का यह नैतिक संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
अखिल भारतीय गोस्वामी महासभा ने देशवासियों से 23 अगस्त को आयोजित गोस्वामी तुलसीदास जयंती महोत्सव एवं भव्य शोभायात्रा में अधिक से अधिक संख्या में सहभागी बनने की अपील की है। महासभा ने कहा कि यह आयोजन महाकवि तुलसीदास के साहित्यिक योगदान के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, लोकपरंपरा, भक्ति और सनातन मूल्यों के प्रति सामूहिक श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है।