18 दिन से भूखे हैं सोनम वांगचुक, आखिर क्या है पूरा मामला? सोनम वांगचुक के आंदोलन से लेकर उन अनशनों तक, जिन्होंने सरकार को झुकाया
Sonam Wangchuk: पर्यावरणविद, शिक्षा सुधारक और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में हैं. पिछले 18 दिनों से वे दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं. उनकी बिगड़ती सेहत को लेकर चिंता बढ़ गई है. इस बीच फिल्म, साहित्य और सामाजिक क्षेत्र की कई हस्तियों ने उनके समर्थन में आवाज उठाई है और उनसे स्वास्थ्य को देखते हुए अनशन समाप्त करने की अपील भी की है.
प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता को लेकर जंतर मंतर पर विरोध-प्रदर्शन की शुरुआत कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने की थी और बाद में सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए थे.
कौन हैं सोनम वांगचुक?
सोनम वांगचुक लद्दाख के रहने वाले इंजीनियर, शिक्षा सुधारक, नवप्रवर्तक (Innovator) और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं. उन्होंने SECMOL (Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh) की स्थापना की, जिसने लद्दाख में वैकल्पिक शिक्षा मॉडल को नई पहचान दिलाई। वे आइस स्तूप (Ice Stupa) जैसी अभिनव जल संरक्षण तकनीक विकसित करने के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं.
उन्हें वर्ष 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बॉलीवुड फिल्म '3 Idiots' का चर्चित किरदार 'फुंसुख वांगडू' काफी हद तक उनके व्यक्तित्व और कार्यों से प्रेरित माना जाता है.
इस बार किस मुद्दे पर कर रहे हैं भूख हड़ताल?
इस बार वांगचुक का आंदोलन परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मुद्दे से जुड़ा है. वे जंतर-मंतर पर 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं. उनकी प्रमुख मांगों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही तय करने की मांग शामिल बताई जा रही है.
18 दिन में बिगड़ी सेहत
लगातार 18 दिनों की भूख हड़ताल के कारण उनकी सेहत तेजी से बिगड़ी है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उनका लगभग 8.5 किलोग्राम वजन घट चुका है. डॉक्टरों ने ब्लड शुगर में गिरावट, मांसपेशियों की कमजोरी और अन्य गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों की आशंका जताई है. उनकी स्थिति को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई, जिसके बाद अदालत ने केंद्र और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है.
दिल्ली हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) में मांग की गई है कि सोनम वांगचुक को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया जाए और उनकी जान बचाने के लिए जरूरी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए. याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि जरूरत पड़े तो उन्हें फोर्स-फीडिंग के जरिए तरल आहार, विटामिन और अन्य जरूरी पोषक तत्व दिए जाएं. यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता और वकील राकेश कुमार सैनी ने दाखिल की है. इसमें दावा किया गया है कि लगातार भूख हड़ताल की वजह से वांगचुक की हालत तेजी से बिगड़ रही है और यदि समय रहते इलाज नहीं मिला तो उनकी जान को गंभीर खतरा हो सकता है.
अब इस मामले में सबकी नजर दिल्ली हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर है. केंद्र और दिल्ली सरकार को बुधवार तक अपना पक्ष रखना होगा, जिसके बाद अदालत आगे की कार्रवाई पर फैसला करेगी.
क्या यह वांगुचक की पहली भूख हड़ताल है?
यह पहली बार नहीं है जब वांगचुक ऐसी भूख हड़ताल पर बैठे हैं. इससे पहले भी वह लद्दाख बचाओ आंदोलन के तहत दो बड़े अनशन कर चुके हैं. वांगचुक ने 6 मार्च 2024 से शून्य से नीचे तापमान में 21 दिन का 'क्लाइमेट फास्ट किया था. इसके बाद अक्तूबर 2024 में उन्होंने 16 दिन की एक और भूख हड़ताल की. उनकी प्रमुख मांगें थीं कि लद्दाख को राज्य का दर्जा दिया जाए, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए और क्षेत्र के पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए. हालांकि उनकी मांग पूरी नहीं हुई.
वांगचुक के इस अनशन की तुलना 2011 में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के अनशन से भी हो रही है. तब अन्ना के साथ बॉलीवुड की कई हस्तियों समेत विपक्ष के नेता भी अनशन स्थल पर आते थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है. तब विपक्ष में भारतीय जनता पार्टी थी और केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी.
अब केंद्र में बीजेपी की सरकार है और कई लोग लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से सवाल पूछ रहे हैं कि वह इस अनशन से दूर क्यों हैं?
हाल के हफ़्तों में राहुल गांधी ने नीट परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर बीजेपी सरकार की तीखी आलोचना की है और देश के प्रमुख कोचिंग केंद्र कोटा में छात्रों से भी मुलाक़ात की थी. लेकिन दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन से उनकी तत्काल अनुपस्थिति ने सवाल खड़े किए हैं.
भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कहा कि अगर विपक्षी दल युवा-नेतृत्व वाले इस आंदोलन में शामिल नहीं होते हैं, तो यह उनकी "संकीर्ण सोच" मानी जाएगी.
वांगचुक ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर विपक्ष, जिसमें कांग्रेस भी शामिल है, नीट परीक्षा में अनियमितताओं के ख़िलाफ़ कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से शुरू किए गए इस आंदोलन का समर्थन नहीं करता, तो जनता उन्हें ख़ारिज कर देगी.
भूख हड़ताल का कैसा इतिहास?
भारत में भूख हड़ताल या अनशन को जनआंदोलन के प्रभावी लोकतांत्रिक हथियार के रूप में स्थापित करने का सबसे बड़ा श्रेय महात्मा गांधी को जाता है. गांधी ने आजादी के आंदोलन के दौरान इसे अहिंसक सत्याग्रह का सबसे प्रभावशाली माध्यम बनाया. उन्होंने मजदूरों के अधिकार, सांप्रदायिक सौहार्द, सामाजिक न्याय और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई मुद्दों पर कई बार उपवास किए. गांधी के इन अनशनों ने न केवल ब्रिटिश सरकार पर नैतिक दबाव बनाया, बल्कि देश में भूख हड़ताल को लोकतांत्रिक विरोध के एक प्रभावी और व्यापक रूप से स्वीकार किए गए तरीके के रूप में स्थापित किया. इसके बाद आजादी के बाद भी अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं और आंदोलनों ने अपनी मांगों को लेकर इसी रास्ते को अपनाया.
भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों ने भी 14 जून 1929 को लाहौर और मियांवाली जेल में भूख हड़ताल शुरू की. यह अनशन 116 दिनों तक चला. उनकी मांग थी कि भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ अंग्रेज कैदियों जैसा सम्मानजनक व्यवहार किया जाए. वे बेहतर भोजन, साफ कपड़े, पढ़ने-लिखने की सुविधा और मानवीय व्यवहार की मांग कर रहे थे. आखिरकार 5 अक्तूबर 1929 को उन्होंने अपने पिता और कांग्रेस नेताओं के आग्रह पर अनशन समाप्त किया था.
आजादी के बाद चर्चित भूख हड़तालें कौन सी रहीं?
पोट्टी श्रीरामलू: भारत के इतिहास की सबसे चर्चित भूख हड़तालों में पोट्टी श्रीरामलू का नाम लिया जाता है. उन्होंने 19 अक्तूबर 1952 को तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग आंध्र राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया. 56 दिन बाद 15 दिसंबर 1952 को उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद बड़े पैमाने पर आंदोलन हुआ और केंद्र सरकार ने अलग आंध्र राज्य के गठन की घोषणा की.
मास्टर तारा सिंह (1961)
शिरोमणि अकाली दल के नेता मास्टर तारा सिंह ने पंजाबी भाषी राज्य की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने 48 दिन बाद अनशन समाप्त किया. उनके 'पंजाबी सूबा आंदोलन' के परिणामस्वरूप 1 नवंबर 1966 को पंजाब का पुनर्गठन हुआ.
संत फतेह सिंह (1966)
संत फतेह सिंह ने नवगठित पंजाब में चंडीगढ़ को शामिल करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने 10 दिन में अनशन समाप्त किया. हालांकि चंडीगढ़ आज भी पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी है.
के. चंद्रशेखर राव (2009)
तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर 29 नवंबर 2009 को आमरण अनशन शुरू किया. सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया, लेकिन उन्होंने जेल में भी अनशन जारी रखा. तबीयत बिगड़ने और बढ़ते जनदबाव के बाद केंद्र सरकार ने तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की. इसके बाद उन्होंने 11 दिन में अनशन समाप्त कर दिया.
इरोम शर्मिला (2000-2016)
मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला को आयरन लेडी ऑफ मणिपुर कहा जाता है. उन्होंने नवंबर 2000 में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) को हटाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की. यह विरोध असम राइफल्स द्वारा 10 नागरिकों की हत्या के बाद शुरू हुआ था. उन्होंने 16 वर्षों तक भोजन और पानी नहीं लिया व उन्हें नाक के जरिए जबरन पोषण दिया जाता रहा. 9 अगस्त 2016 को उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया और चुनावी राजनीति के जरिए संघर्ष जारी रखने का फैसला किया. एफएसपीए को पूरी तरह हटाने की उनकी मांग पूरी नहीं हुई.
अन्ना हजारे (2011)
अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल 2011 को जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया. आंदोलन को देशभर में व्यापक समर्थन मिला. बढ़ते जनदबाव के बाद केंद्र सरकार ने नागरिक समाज और सरकारी प्रतिनिधियों की संयुक्त मसौदा समिति बनाने की घोषणा की. इसके बाद 11 दिनों के बाद उन्होंने अनशन समाप्त किया. यह आंदोलन आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में गिना जाता है.
स्वामी निगमानंद सरस्वती (2011)
स्वामी निगमानंद सरस्वती ने हरिद्वार में गंगा किनारे अवैध खनन के विरोध में 19 फरवरी 2011 को भूख हड़ताल शुरू की. उनका अनशन 115 दिन तक चला। 13 जून 2011 को उनकी मृत्यु हो गई. उनका आंदोलन पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सबसे चर्चित अनशनों में गिना जाता है.
मेधा पाटकर (2019)
अगस्त 2019 में मेधा पाटकर और छह अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की. उनकी मांग थी कि सरदार सरोवर बांध के कारण प्रभावित गांवों का पुनर्वास और मुआवजा सुनिश्चित किया जाए. नौवें दिन मध्य प्रदेश सरकार के आश्वासन के बाद उन्होंने अनशन समाप्त किया.
मनोज जरांगे पाटिल (2023-24)
मराठा आरक्षण की मांग को लेकर मनोज जरांगे पाटिल ने 29 अगस्त 2023 को आमरण अनशन शुरू किया. आंदोलन पूरे महाराष्ट्र में फैल गया. जनवरी 2024 में उन्होंने दोबारा भूख हड़ताल की. सरकार द्वारा पात्र मराठाओं को कुनबी प्रमाण पत्र देने के आश्वासन के बाद उन्होंने अनशन समाप्त किया. बाद में महाराष्ट्र सरकार ने इस संबंध में कदम उठाए.
जगजीत सिंह डल्लेवाल (2024-25)
किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने 26 नवंबर 2024 को सभी फसलों पर एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया. करीब 123 दिन बाद 28 मार्च 2025 को उन्होंने पानी पीकर अनशन तोड़ा और बाद में किसान महापंचायत में आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की. यह फैसला केंद्र सरकार के साथ बातचीत आगे बढ़ने और केंद्रीय मंत्रियों की अपील के बाद लिया गया.