क्या शादी के बाद बदलनी चाहिए महिला की धार्मिक पहचान? सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार..महिलाओं की पहचान से जुड़ा बड़ा सवाल...
New Delhi: दूसरे धर्म में विवाह करने के बाद महिलाओं की धार्मिक पहचान से जुड़े एक अहम सवाल पर अब सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए सहमत हो गया है. यह मामला महिलाओं के संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पहचान से जुड़ा हुआ है, जिसे लेकर देशभर में बहस तेज हो सकती है.
याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या विवाह के बाद किसी महिला की धार्मिक पहचान अपने आप बदल जानी चाहिए, या फिर उसे अपनी आस्था और धार्मिक पहचान बनाए रखने का अधिकार है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि शादी के आधार पर किसी महिला की धार्मिक पहचान को खत्म करना निजता और समानता के अधिकार का उल्लंघन है.
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान की शुरुआती दलीलें सुनीं, जिनमें नागपुर पारसी पंचायत के संविधान के नियम 5(2) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है.
सुनवाई के दौरान, दीवान ने कहा कि यह मुद्दा समुदाय के लिए बार-बार होने वाली कानूनी लड़ाई है. वरिष्ठ वकील ने जोर देकर कहा कि मौजूदा याचिका खास तौर पर नागपुर अग्यारी (पारसी मंदिर) को चलाने वाले नियमों को चुनौती देती है. पीठ ने कहा, "हम नोटिस जारी कर रहे हैं. कानून के महत्वपूर्ण सवाल के साथ एक समान याचिका है."
दीना बुधराजा (Dina Budhraja) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, नागपुर पारसी पंचायत, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और चैरिटी कमिश्नर को नोटिस जारी किया.
याचिका में कहा गया कि यह नियम भेदभाव वाला है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और सम्मान का अधिकार), और अनुच्छेद 25 (धर्म की आजादी) का उल्लंघन करता है.
कथित तौर पर यह नियम गैर-पारसी से विवाह करने पर पारसी महिलाओं की धार्मिक पहचान और अग्यारी (अग्नि मंदिर) जैसे धार्मिक संस्थानों में प्रवेश को छीन लेता है. हालांकि, यह नियम उन पारसी पुरुषों पर समान प्रतिबंध लागू नहीं करता है जो समुदाय के बाहर विवाह करते हैं.
संविधान के किन अधिकारों से जुड़ा है मामला
याचिका में विशेष रूप से संविधान के:
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार)
- अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)
- अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता)
का हवाला दिया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि महिला को यह तय करने का पूरा अधिकार होना चाहिए कि वह किस धर्म का पालन करना चाहती है.
कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता जताई है. कोर्ट ने कहा कि यह विषय केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि समाज और कानून से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न है.
सामाजिक और कानूनी महत्व
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में कोर्ट का फैसला:
- अंतरधार्मिक विवाहों
- महिलाओं के अधिकारों
- धार्मिक स्वतंत्रता पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है.
निष्कर्ष:
दूसरे धर्म में शादी के बाद महिलाओं की धार्मिक पहचान का सवाल अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच चुका है. आने वाले समय में इस पर होने वाली सुनवाई और फैसला देशभर में नई कानूनी और सामाजिक दिशा तय कर सकता है.